Thursday, December 31, 2020

नया साल

                      नया साल



बीत रहा था साल, 

बहुत ही धीरे-धीरे; 

जैसे कोई साँप सरकता; 

फन काढ़े धीरे-धीरे|  


थोड़े से दिन और बचे हैं; 

उन कठिन दिनों के; 

जैसे थोड़ी सी  पूँछ 

बची हो विषधर की |  


पूूरा साल बहुत कठिन था!

खूब छकाया इसने जन जीवन को; 

पस्त हो गए दुनिया के सारे महिधर; 

बना गया जीवन सबका ही दुष्कर|  


हर कोई हलकान हो गए; 

मारे-मारे सभी फिर रहे; 

किंकर्त्तवविमूढ़ सभी थे; 

हर कोई परेशान हो गए|  


अदृश्य शक्ति से डर कर सारे; 

भाग रहे थे मारे-मारे; 

जग में हा-हा कार मचा था; 

डर कर दुबक गए थे सारे|  


सबकी नौकरियाँ छूट रही थीं; 

सपनों की डोरी टूट रही थी; 

असहाय सा जग था सारा; 

सबकी मंजिल छूट रही थी|  


हर तरफ अफरातफरी थी; 

कोई राह न सूझ रही थी; 

विपदा की इस कठिन घड़ी में; 

सबकी राहें छूट रही थीं|  


नए साल में कुछ ऐसा हो:

जो सबको ही राह दिखाये; 

बीते गम इस ग़मगीन साल के; 

हम सबके चेहरे मुस्कायें | 


इस विपदा से निजात मिले; 

ऐसी कोई राह दिखाए! 

जिससे अपने पिछले गम भागे; 

चहुँ ओर खुशियाँ लहराये|  


नये साल में नई ऊँचाई; 

हर कोई बस पा ही जाएँ; 

बच्चे,बूढ़े हर्षित हों सब; 

घर आँगन में खुशियाँ आये|  


फिर से देश प्रगति पथ पर; 

नित नए झण्डे लहराये: 

खेतों,खलिहानों में खुशहाली हो; 

अन्न आदि से घर भर जाये|  


शिक्षा की गति धीमी है जो; 

वह फिर से पटरी पर आये; 

विश्व गुरु हम थे जो कल; 

फिर से वह स्थान बनायें|  


नया साल खुशियों का घर हो; 

खुशियों का पैगाम दिलाये; 

हर चेहरा खुश हो दुनिया का; 

ऐसा कुछ ये साल ले आये | -2 

                      रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

 

Tuesday, December 29, 2020

मंजिल

               मंजिल








कितना भी कुछ कर लो यारों, 

दिनभर भागो,दिनभर दौड़ो, 

दिन और रात की चैन के बदले,

बिन खाये,बिन पीये कुछ भी, 

चाहे जितना खून बहा लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


इसको मारो,उसको काटो; 

इसका छीनो,उसका ले लो; 

घर में धन का अम्बार लगा लो; 

सोना खाओ!चाँदी पहनो! 

आलीशान महल बना लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


भौतिकता की लहर में बहकर, 

मानव मूल्य सभी भुला दो; 

नख-शिख स्वार्थ में डूबे रह कर; 

परमार्थ का मूल्य गिरा दो! 

बस खुद का ही हित साधो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


शिक्षित न बन साक्षर बन लो; 

शिक्षा का तुम अर्थ भुला दो; 

गौरव शाली अतीत भुलाकर; 

पश्चिम को आदर्श बना लो; 

खुद कमा कर,खुद ही खा लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


अपने सारे संस्कार भूल कर, 

नारी का सम्मान गिरा कर, 

सरे आम तुम लम्पट बन कर, 

चाहे जितना मूल्य गिरा लो; 

सब कुकृत्य चाहे अपना लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


बड़े बुजुर्ग असहाय भले हों; 

सबकुछ त्याग दिया भले हों; 

उनके इस कठिन घड़ी में; 

उनको हम सबकी हो जरूरत; 

फिर भी हम सब दूर खड़े हों! 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


क्या लाये थे?

क्या ले जायेंगे?

कहाँ से आये?

क्या है मंजिल?

सब कुछ यहीं धरा रह जाता! 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


सारे सपने,सारी यादें, 

सारा जीवन आँखों के आगे; 

चलचित्र सा तेजी से भागे; 

अपना किया धरा सब पीछे; 

धूँ-धूँ कर जल रहे चिता पर!

मंजिल है बस धुँआ-धुआँ!-2    


रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|| 

Sunday, December 20, 2020

समय नहीं है

                              समय नहीं है  






समय नहीं है,

कि; 

रात में चाँद और तारों की 

शीतलता और सुंदरता;

रातरानी की मादकता;

जुगुनुओं की टिम-टिम;

उल्लुओं की चमकती आँखों;

झींगुरों की अनवरत 

ध्वनि तरंगों की लयबद्धता;

और,

सन्नाटे को चीरती 

पत्तों की सरसराहट के 

बीत राग को महसूस करें| 


भूत के गम,

भविष्य की चिंता;

सुबह से शाम,

बस काम ही काम;

दाल-रोटी की मशक्क़त में,

आदमी खो गया है!

प्रकृति का सानिध्य,

अपनापन और माधुर्य,

प्यार,दुलार और मनुहार जैसे शब्द 

कहीं नहीं हैं!

क्योंकि;

आदमी के पास,

इनके लिए समय नही है!-2 

            रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   



Sunday, December 13, 2020

भ्रष्टाचार

                         भ्रष्टाचार







भ्रष्ट मंत्री,भ्रष्ट संत्री, 

भ्रष्ट लोग बाग हैं|  

भ्रष्ट साहब,भ्रष्ट बाबू ,

भ्रष्ट सभी आम हैं|  

भ्रष्ट सारी सोच सबकी; 

भ्रष्ट सारे काम हैं; 

भ्रष्ट गुरु,भ्रष्ट चेला, 

भ्रष्ट बड़े नाम हैं; 

भ्रष्ट नौकर,भ्रष्ट मालिक, 

भ्रष्ट पंडित,भ्रष्ट मुल्ला, 

भ्रष्ट नगर और मोहल्ला|  


भ्रष्टता चहक रही,चमक रही, 

चसक बनी सरक रही; 

गाँव,घर बहक रही; 

हवा में घुल महक रही; 

यहाँ,वहाँ,कहाँ नहीं ?

नजर से अब परे नहीं; 

न रात-दिन का फेर अब, 

सभी जगह वही वही !


सुधी सभी तड़प रहे, 

दीन बन दहक रहे; 

ज़मीर जार हो रही; 

इधर-उधर भटक रही; 

आर्तनाद कर रहा; 

गली-गली पसर रहा; 

भूख से तड़प रहा, 

आज पूरा देश है|  


उठो सभी!उठो सभी! 

उखाड़ फ़ेंक दें अभी, 

भ्रष्ट हों जहाँ कहीं; 

न उनको लेने चैन दें; 

समाज को जगा दें; 

सही लोकपाल दें; 

देश को सवाँर दें; 

नेक,नियत,सत्यता, 

और सच्चे बैन दें; 

बच्चे,बूढ़े और सबको; 

चैन भरी रैन दें | |-2 

             रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

Sunday, December 6, 2020

घर

                   घर  








थक-हार कर कहीं से आओ, 

दिनभर भागम-भाग से आओ, 

दिल दिमाग को राहत दे जो; 

वह होता है घर | 

दिनभर बाहर कहीं रहो,

काम काज में फंसे रहो, 

माँ जैसे जो आहट पाये; 

वह होता है घर | 

आलीशान महल जैसा हो, 

घास-फूस का छप्पर या हो, 

दिल को जो सुकून पहुंचाए;

वह होता है घर | 

शरीर हमारा कहीं भी भटके, 

इधर-उधर के लटके-झटके, 

आत्मा जहाँ सदा रहती हो;

वह होता है घर | 

खुशुबू मीठे सम्बन्धों की, 

अपनेपन की, आत्मीयता की, 

हर दम ही जिस जगह से आये; 

वह होता है घर | 

माँ जिस जगह से बाट जोहती, 

बच्चे,पत्नी सब बेसब्री से, 

अपनों के आने की राह देखती; 

वह होता है घर | 

ईंटों से बनता मकान है, 

आपस के सम्बन्धों से भिनकर, 

गीतों की धुन जहाँ से बजती; 

वह होता है घर | 

अब तो सबकुछ बदल गया है, 

घर आँगन सब खाली-खाली है,

पहले जैसा नहीं रहा अब ; 

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


परिवार सब टूट चुके हैं, 

आपस में सब रूठ चुके हैं, 

दिलों में सबके पड़ी दरार अब! 

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


रोजी-रोटी के चक्कर में, 

हर कोई अब भाग रहा है, 

सम्बन्धों की डोरी टूटी !

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


नयी सदी के उदार वाद ने,

गाँव,शहर के बाजारवाद ने, 

सब कुछ तहस-नहस कर डाला!

 घर जैसा अब नहीं रहा घर | 

 

चलो चलें फिर से हम अपना, 

प्यारा सा संसार बसाएं, 

जो केवल मकान न होकर;

अपना सपनों सा घर हो! 


जिसमें सम्बन्धों की मिठास हो, 

अपनेपन का आभास हो, 

रूठे बिछड़े सभी साथ हों; 

तब होगा वह अपना घर !-2 

            रवि शंकर उपाध्याय 

   मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Sunday, October 11, 2020

आज का युवा

                                             आज का युवा  


कोरे सपनों के बाहु पाश में, 

हर दम जकड़ा; 

मादक द्रव्यों के दल-दल में, 

नख शिख डूबा; 

आज का युवा|  

अंधकार में भटक रहा है, 

देश का सपना चटक रहा है, 

गांजा,चरस की लत में डूबा; 

आज का युवा |   

देश की रीढ़ की हड्डी खिसकी, 

अर्थ व्यवस्था की हालत सरकी, 

दारू की बोतल में डूबा; 

आज का युवा |  

माँ-बापू का सपना टूटा, 

बुढ़ापे का डण्डा छूटा, 

उनका भावी पंक में डूबा; 

आज का युवा |   

बड़े-बड़ेअभिनेत्री,अभिनेता, 

नशे की लत में डूब रहे हैं, 

मूल्यों का गुब्बारा फूटा; 

आज का युवा |   

बेरोजगार उपेक्षित सब हैं, 

भ्रष्टाचार के नरक में फँसकर, 

गम व अवसादों में डूबा; 

आज का युवा |   

बड़ी-बड़ी बातों का हौआ, 

मन की बातों का काला कौआ, 

बेमन ढोनें को मजबूर हुआ; 

आज का युवा |   

उम्र के साथ जिम्मेदारी बढ़ती, 

उसका बोझ उठाना मुश्किल, 

ऐसे कितने गम में डूबा; 

आज का युवा |   

लाखों की नौकरियाँ छूटी, 

कोरोना की विपदा टूटी, 

इस विपदा  से हलकान हुआ; 

आज का युवा |   

अंधकारमय भविष्य देखकर, 

गम से किंकर्त्तब्यविमूढ़ हुआ, 

तरह-तरह के नशे में डूबा, 

आज का युवा |   

 गम,दुःख आदि की आँधी आयी, 

उसमें सारा देश ही डूबा, 

मादक द्रव्यों की शरण में पहुँचा;

आज का युवा |  

मन से  टूटा, तन से टूटा,

 सम्बन्धों से नाता छूटा, 

कोरे सपनों की लाश को ढोता! 

आज का युवा |   

मैंने दिवा स्वप्न देखा! 

नशे की लत से निजात मिली; 

हृष्ट-पुष्ट खुशहाल हुआ! 

आज का युवा |   

अब सपना साकार हो सका,

 अवसादों से त्राण मिला, 

अंधकार से प्रकाश में लौटा, 

आज का युवा |   

प्रगति की पटरी टूट गयी थी, 

टूटी पटरी फिर से सुधरी! 

मुख्य धारा में खुश हो लौटा! 

आज का युवा-2 | 

                रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   





Friday, October 2, 2020

असुरक्षित बेटियाँ

                      असुरक्षित बेटियाँ






बिटिया सयानी थी, 

पूरे घर की रानी थी, 

दिन-रात चहकती थी, 

आँगन में फुदकती थी, 

सबकी दुलारी थी; 

अकस्मात एक दिन, 

दरिंदों ने दबोच उसे, 

नोच डाले पंख सारे, 

लहूलुहान कर उसे, 

अधमरा कर दिया; 

तार-तार कर दिया, 

उसकी अस्मिता को,

उसकी सुचिता व् , 

उसकी पवित्रता को; 

फिर फ़ेंक कर सड़क पर, 

निर्द्व्न्द हो के चल दिये, 

वह बेचारी तड़प रही, 

रो रही,कलप रही, 

मदद को पुकारती, 

कष्ट से चिल्हक रही, 

लेकिन कोई कृष्ण बन कर, 

उसकी गुहार सुन कर, 

दौड़ता न आ सका !


बल्कि उसकी बात को, 

अनसूना कर दिया; 

आठ दिन बेहोश थी, 

दर्द से कराहती, 

अपनों को पुकारती, 

पीड़ा को सह रही, 

जिंदगी की जंग को, 

वीरता से लड़ रही; 

अपनी जीजिविषा से, 

फिर से संज्ञान लेकर; 

आपबीती सब कही, 

जीभ उसकी काट दी थी, 

गर्दन व् रीढ़ की

 हड्डियाँ भी तोड़ दी थी, 

कराहती, चीत्कारती, 

बचाव को पुकारती, 

लगातार वह रही थी, 

लेकिन उन दरिंदों ने 

उसकी एक न सुनी, 

सहन करते दर्द भारी,

वह बेहोश हो गयी; 

फिर भी उसने जारी रखा, 

मौत से संघर्ष को;

लेकिन, 

तन,मन लहूलुहान थे, 

साथ उसका न दे सके, 

वह न फिर से उठ सकी!

चली गयी,चली गयी, 

समाज को दुत्कारती, 

 वितृष्णा से निहारती !


कैसा ये समाज है?

कैसी ये व्यवस्था है?

लोग कैसे हो गए हैं?

क्यों ऐसे लोग हो गए हैं?

जहाँ न सुरक्षित अब 

अपनी बहू,बेटियाँ! 

चील,गिद्धों की निगाह से, 

निहारते बहू, बेटियाँ! 

न घर में,न समाज में, 

सुरक्षित हैं बेटियाँ! 

कहाँ गए मूल्य सारे? 

कहाँ गयी संवेदना? 

कहाँ गये संस्कार सारे? 

कहाँ गयी सद्भावना? 

सब कुछ हमने त्याग आज, 

जानवर से हो गये हैं; 

सम्वृद्धि के मदांध हो< 

मूल्य सारे खो दिए हैं; 

चरित्र आज मृतप्राय! 

मानवता लहूलुहान है! 

त्याग,सत्य,न्याय,मूल्य, 

आज सारे संज्ञा शून्य! 

विकास की अंधी गली में, 

आज सारे खो गए हैं: 

व्यवस्था भी काठ हो, 

आज कहीं पर खड़ी है; 

क्या ऐसे ही समाज की

हमने की थी कल्पना!

आज हमें सोचना है, 

सोचना है,सोचना है...  

                 रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 



     

Saturday, September 26, 2020

किसान

                      किसान  




देश की मजबूती का सहारा, 

उसकी समृद्धि का खजाना, 

उसकी रीढ़ की हड्डी बन कर; 

हर विपदा में उसे संभाले, 

हर हालत में देखे-भाले, 

तरह-तरह की फसल उगाकर, 

स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाता, 

रात और दिन खेत में नधता, 

हाड़ तोड़ परिश्रम करता, 

धन-धान्य से देश संवारता, 

खुद सूखी रोटी पर पलता, 

धोती फटी,झीनी बनियान, 

फिर भी चेहरे पर मुसकान! 

सुख-दुःख की आँख मिचौली में, 

दुःख जिसके पाले में आता; 

वह है अपना किसान|  


कर्ज के बोझ से नख-शिख डूबा, 

ब्याज की रकम भी न दे पाता,   

एक टक बस फसलों को तकता, 

सूखा,बारिश या फिर कीड़ों से, 

यदि फसलें बरबाद हो गयीं; 

उसका सारा सपना धुलता, 

सारे सपनों के मर जाने पर, 

खुद भी फंदे पर झूलता;

पीछे उसके बीबी,बच्चे,

रोटी-रोटी को तरसें, 

सरकारें बस रोटी सेंकें! 

बड़े-बड़े वादे करके, 

उनके अरमानों से खेलें,

इन विपदाओं की आँधी में, 

जिन लोगों की नींव हिल गयी; 

वह है अपना किसान|  


सदियों से वह कर्मवीर है, 

मातृभूमि का धर्मधीर है, 

लेकिन उसकी दशा बुरी है, 

कर्ज के बोझ से दबा हुआ है, 

घर में अगर कोई विपदा हो, 

बस उसको उधार चाहिए, 

सूदखोर के मकड़ जाल में, 

फंसने को मजबूर हुआ है; 

ब्याज की दर इतनी ज्यादा है,

जिसको भरते दम घुट जाता है; 

मूलधन तो पड़ा हुआ है; 

फिर खेतों की बारी आती, 

जिस पर गिद्ध निगाह गड़ाये, 

हर कोई ही डटा हुआ है, 

एक-एक कर खेत बिक रहे, 

खेतिहर से मजदूर हो रहे, 

पराश्रित जीवन जीने को, 

अब वे सब अभिशप्त हो रहे; 

कोई उनकी खबर न लेता, 

सब अपने स्वार्थ में डूबे, 

मंडी के दलाल हों या फिर, 

बड़ी-बड़ी कृषि कम्पनियाँ; 

सब उसका बस खून चूसते, 

मुनाफों से जेब ठूसते, 

सरकारें अपना हित देखें! 

वोट बैंक की राजनीति है,

जान बूझ कर सब चुप बैठें! 

कैसे चक्रब्यूह में घिर कर, 

अभिमन्यु सा तड़प रहा है, 

कोई इसे निकाले इससे, 

कोई इसके जान को बख्शे, 

आस लगाये,हाथ उठाये, 

भीगीं पलकें नम आँखों से, 

चहुँ ओर गुहार लगाए, 

कोई तो उद्धार कराये -2 | 

                       रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

Saturday, September 19, 2020

वृद्ध

                          वृद्ध




गली,मोहल्ला,शहर,गाँव में, 

हर कोई साँसत में है; 

सबकोअपनी जान बचानी, 

हर कोई आफत में पड़ा हैं,

ऐसे में क्या सबसे ज्यादा 

चिंता उनकी है सबको 

हर घर में जो वृद्ध,बड़े हैं?


 किसी तरह जीवन चलता था, 

संयम और नियम पलता था, 

योग और प्राणायाम थे करते, 

रोगों से वे थे बचते, 

लेकिन इस गंदे वायरस ने, 

सबकी ही है कमर तोड़ दी, 

सब हैं प्रभावित इससे लेकिन, 

वृद्ध जनों की कब्र खोद दी; 

एक बार यदि इसने जकड़ा, 

आक्टोपस सा इसने पकड़ा, 

बहुत ही मुश्किल जान बचाना, 

लाख समस्या बढ़ जाती है, 

कुर्सी पर ही पड़े-पड़े, 

हर घर में जो वृद्ध,बड़े हैं|  


पहले भी जीवन में उनके, 

समस्याओं की कमी नहीं थी, 

बेटा उनका बेटा न था!

बहू भी उनकी बहू नहीं थी! 

किसी तरह घर में रहते थे, 

 फिर भी जीवन बीत रहा था, 

एकाएक भूचाल आ गया, 

हर तरफ ही अफरातफरी, 

छोटे पौधे या कि टहनियाँ, 

एक-एक कर उजड़ रहे हैं, 

मजबूत तने बचे रह गए, 

बूढ़े पेड़ों पर आफत ज्यादा, 

सब जड़ से ही उखड़ रहे हैं, 

कोई उनकी तरफ न देखे! 

सबको उनकी अब क्या जरुरत? 

सबको छोटे पौधों का या कि, 

अपनी-अपनी ही पड़ी है, 

हर कोई संकट में घिरे हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


अस्पताल में भीड़ बड़ी है, 

रोगी ज्यादा बिस्तर कम हैं!

ऐसे में अस्पताल के आगे 

भारी मुश्किल आन पड़ी है; 

किसको पहले बिस्तर पर लें? 

बहुत  सोच कर अस्पताल ने, 

उनको ही बिस्तर पर लिया है, 

जिनकी ज्यादा उम्र पड़ी है; 

अलग-थलग फिर वृद्ध पड़े हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


अपनी पूरी कोशिश करते,

दिन भर संयम से ही रहते, 

बार-बार हैं हाथ को धोते, 

सबसे दूरी बना के रखते, 

पहले भी तो दूरी ही थी! 

अब तो एकदम दूर ही रहते, 

फिर भी खाँसी उभर ही आती, 

लाख बचाने  पर भी उनके, 

गले से खाँसी निकल ही आती;

आस पास सब चौकन्ने हो, 

आशंकित व् भय विह्वल हो, 

बड़े ध्यान से उन्हें देखते, 

वे  खुद भय से सिमट ही जाते, 

अंधकार मय भविष्य देखकर, 

आँखों ही आँखों में जगते, 

अब क्या बिपदा उनपर आनी? 

सोच में पड़ कर जाग रहे हैं, 

बिस्तर में ही पड़े हुए हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


मरते दम इस कठिन घड़ी में, 

कोई साथ न देगा उनका, 

मुक्ति धाम तक भी उनके, 

कोई साथ नहीं जायेगा; 

सारे अपनी जान बचाने की, 

युक्ति रोज ही खोज रहे हैं,

भाग रहे हैं,दौड़ रहे हैं

लेकिन कोई युक्ति न मिलती, 

ऐसे में कोई उनकी क्यों सोचे? 

हर घर में जो वृद्ध बड़े हैं|  


लेकिन हमको नहीं चाहिए, 

जीवन में यह बात भूलनी, 

हम भी एक दिन बूढ़े होंगें, 

ऐसे ही हम ताकतवर, 

जीवनभर नहीं रहेंगे; 

 हम सब भी वृद्ध बनेंगे, 

ये जीवन में कभी न भूले, 

जो कुछ हैं हम आज यहाँ, 

सब कुछ इनके कारण हैं; 

हमें कृतघ्न नहीं बनना है, 

पितृ-ऋण हमको ही भरना है, 

जैसे हमको इन्होंने पाला, 

जीवन भर देखा-भाला; 

अब हम सबकी बारी है,

इनकी पूरी सेवा करनी, 

देखभाल इनकी अब करनी, 

 हम इनके प्रति कृतज्ञ बनें, 

हम सब अपना धर्म निभायें, 

हम संवेदन शील तथा,

पितृ भक्त इंसान कहायें -2 |  

              

                 रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 


  

 

 

Monday, September 14, 2020

हिन्दी



                    हिन्दी







राष्ट्र-प्रेम की अलख जगाती, 

जन-जन की वाणी बन जाती, 

अपनेपन का भान कराती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


सारे जग में कल-कल बहती, 

झरनों की भाषा बन जाती, 

आपस में सद्भाव जगाती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


हरिश्चन्द्र ,दिनकर ,नीरज के, 

भाव लोक में विचरण करती, 

उनके सद्विचार को गढ़ती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


छन्दों ,कविता और कहानी, 

उपन्यास व् सभी विधा को, 

सरल ,सुगम भाषा में गूँथती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


दुनिया भर की भाषाओं में, 

अपनी अच्छी पैठ बनाती, 

हम सबका सिर ऊँचा करती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


विघटन की इस कठिन घड़ी में, 

जब पूरा जग बिखर रहा हो; 

सबको एक सूत्र में बिधती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


सुमधुर ,सुसज्जित ,सरल  तथा 

अपने कर्ण प्रिय  स्वर ,व्यंजन से 

सबके दिल दिमाग में छाती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


कार्यालय व् विद्यालय में, 

सबकी अपनी प्यारी भाषा; 

सबके बोलचाल में घुलती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


अवधी ,ब्रज और मैथिल, 

सब हैं इसकी अपनी बहनें; 

बहनों संग घुलमिल रहती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


पूरब से पश्चिम तक फैली, 

उत्तर में कुछ ,दक्षिण में कुछ, 

एक राष्ट्र का भान कराती; 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


मूल्य और संवेदना आदि को, 

मेघ-राशि और बसन्त काल को, 

सरल ,सुगम शब्दों में रचती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


स्मृतियों के कोठारे में, 

अगणित ग्रन्थों की पुष्पांजलियाँ हैं; 

उनको पुष्पित ,गुम्फित करती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी |

 

उर्दू इसकी भगनी भाषा, 

हिन्दू-मुस्लिम को साथ मिलाती; 

एक राष्ट्र में हमें पिरोती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी | 


विश्व गुरु हम फिर बन जाएँ, 

हिन्दी दिवस की पावन बेला में,

हम सबको संकल्प दिलाती, 

हम सब की प्यारी हिन्दी-२|  

                     रवि शंकर उपाध्याय 

     मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Sunday, September 13, 2020

माँ





                 माँ














मैंने माँ को रात-रात भर, 

अपनों के खातिर,

जगते देखा है;

मैंने माँ को बात-बात पर, 

अपनों के दुःख में रोते देखा है | 


मैंने माँ को अपनों के सुख में, 

अपना सुख रचते देखा है; 

मैंने माँ को अपनों के सुख के खातिर, 

अपना सुख खोते देखा है|  


मैंने माँ को घर के कामों से, 

कभी न रुकते,थकते देखा है; 

मैंने माँ को दिनभर, 

कोल्हू के बैलों सा नधते देखा है! 


मैंने माँ को बच्चों के हित में, 

अपना सुख तजते देखा है; 

मैंने माँ को नींद से बोझिल होते भी, 

कभी न पल भर भी रुकते देखा है|  


मैंने माँ को रात और दिन, 

पति सेवा में रमते देखा है; 

मैंने माँ को दुःख में भी, 

शांत चित्त रहते देखा है|  


मैंने माँ को सारी चिंता, 

अपने सिर मढ़ते देखा है; 

मैंने माँ को त्याग और समर्पण की, 

प्रतिमूर्ति में ढलते देखा है|  


मैंने माँ को सबके हित में, 

कुछ न कुछ करते देखा है; 

मैंने माँ को जीवन भर, 

बस अन्यों को देते देखा है|  


मैंने माँ को अपनों के सुख में, 

अपना सुख पाते देखा है; 

 मैंने माँ को जीवन भर, 

निःस्वार्थ कर्म करते देखा है|  


मैंने माँ को कभी-कभी, 

गीता,रामायण पढ़ते देखा है; 

 और गीता के उपदेशों को, 

जीवन भर जीते देखा है|  


मैंने माँ को घर के सारे जंजाल, 

उठाते देखा है;

चेहरे पर  उनके न शिकन कोई, 

मंद-मंद उनको दिन भर मुस्काते देखा है| 


मैंने माँ को औरों के दुःख में, 

अपना हाथ बढ़ाते देखा है; 

मैंने माँ को विपत्ति काल में, 

सबको शांत कराते देखा है|  


मैंने माँ को जीवन भर, 

तीज और त्योहारों पर, 

खूब मजे से गाना गाते 

और पकवान बनाते देखा है|  


मैंने माँ को कठिन घड़ी में भी, 

धैर्य नहीं खोते देखा है; 

स्थिर मन से बड़ी समस्या भी, 

उनको सुलझाते देखा है| 


मैंने  माँ को कभी न जीवन में, 

लड़ते और झगड़ते देखा है; 

सामने वाले के गुस्सा होने पर, 

चुप हो उसे समझते देखा है|  


मैंने माँ को जनहित में, 

ईश्वर से रिरियाते देखा है; 

अपने लिए कभी न जीवन भर, 

चाह के भी करते देखा है|  


मैंने माँ को अंत समय तक, 

बस करते-धरते देखा है; 

मैंने माँ को देवी बनते, 

पल-पल उनमें ढलते देखा है|  

                   रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|  



Friday, September 4, 2020

शिक्षक

                          शिक्षक 








क्या सोचा था? क्या कर देंगे?

जीवन अपना धन्य करेंगे, 

बच्चों में जीवन मूल्य भरेंगे, 

राष्ट्र-प्रेम की चाह भरेंगे, 

अपने जीवन का दृष्टान्त बता, 

उनमें अच्छे गुण भर देंगे; 

कथनी-करनी की दीवार गिरा, 

उनको सतपथ पर कर देंगे; 

जाति ,वर्ण तथा धर्म की, 

सच्ची परिभाषा देकर, 

उनको सच्चा इंसान बना कर, 

अपना नैतिक कर्म करेंगे; 

अपनी तथा देश का अपने 

आन,मान और शान बढ़ा कर, 

विश्व पटल पर छा जायें, 

ऐसी उनको शिक्षा देंगे; 

अपने खून पसीने से अर्जित, 

पदवी,रुतबा,ऊँचे सपने, 

सब उनकी नन्ही आँखों में भर देंगे|  


भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ गया, 

अब तक का अपना सपना, 

न वैसा परिवेश मिल रहा, 

और नहीं वैसा सब कुछ, 

अभिभावक को मतलब है, 

 बस भोजन,कपड़े,पैसे कुछ; 

नाम लिखा देंगे बच्चे का 

विद्यालय में ,फिर 

क्या करता है? क्या पढ़ता है ?

कभी नहीं उनको मतलब !

अधिकारी को गुणवत्ता से,

प्रतिनिधियों को अव्यवस्था से, 

गुरुजन को आपस की खींचातानी से, 

मतलब है बस इतना ही है मतलब !


बहुतों को तो देर हो चुकी, 

हम तो अब जागें यारों; 

अपने सपनें खोने से पहले, 

उनको पा लें यारों; 

अंत-काल आने से पहले, 

पिछला कुछ अच्छा सोचें, 

ऐसी सुखमय,कर्तव्यनिष्ठ,

गौरवदायी,राष्ट्रोन्नति वाली,

शिक्षण की स्मृतियों की, 

निधि पा लें यारों -2 | 

                       रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |  

Sunday, August 30, 2020

बाढ़

                    बाढ़










गिरते-पड़ते किसी तरह से, 

घर-आँगन में खुशियाँ आतीं, 

उन खुशियों पर ग्रहण लगाने; 

आ जाती है बाढ़ | 


खेतों में लहरायें फसलें, 

उनको देख के सपनें बुनते,

उन सपनों को जीते जी; 

खा जाती है बाढ़|  


सब कुछ तहस-नहस हो जाता, 

घर-गृहस्थी पूरी चौपट, 

आँगन की तुलसी मईया को; 

कुम्हलाती है बाढ़| 


कोठारी में सारा राशन, 

पूरे साल का पक्का साधन, 

फूल-फूल कर बह जाता है; 

जब आती है बाढ़ | 


फसलें सब बरबाद हो गईं, 

झटके खूटा मवेशी भी, 

ह्रदय बिदारक दृश्य दिखाती; 

यह निर्मोही बाढ़| 


अपना घर अब उसे छोड़ना, 

क्या रख ले ?और क्या छोड़े ?

द्वन्द्व भयंकर मचा दिलों में; 

सब करवाती बाढ़ | 


छोटी सी पोटली बाँधे, 

बच्चे को गोदी में साधे, 

ऊँचे स्थानों पर रुकने को; 

विवश कराती बाढ़ | 


भूख से बच्चे तड़प रहे हैं, 

रो-रो कर हलकान हो रहे, 

कोई भीअब युक्ति न सूझे!  

कैसे  दिन दिखलाती बाढ़!


ऊँचे स्थानों या शिविरों में,

बैठे-बैठे बाट जोहते, 

भिखारी सी हालत हो गई; 

ये भी करवाती बाढ़|  


सरकारी अनुदानों पर, 

बन्दर बाँट मची है भारी, 

नीचे दुखियों तक शायद पहुँचे!

क्यों आती है बाढ़ ?


लाशों पर रोटी सेंकें, 

दुखियों की आहें लेते, 

ह्रदय नहीं विदीर्ण हो रहा! 

ये क्या करवाती बाढ़! 


अच्छी सी योजना बने, 

वह अमली जामा पहने, 

जन-जन की भागीदारी हो; 

तब जाएगी बाढ़ | 


जिससे जीवन पटरी पकड़े, 

खानाबदोश का जीवन छूटे, 

हर घर में तुलसी पनपे; 

डर न लगाये बाढ़| -2 

                     रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

 


  

  

Sunday, August 23, 2020

हवा

                       हवा












 जग में हाहाकार मचा है,

 हर प्राणी हलकान यहाँ है,

 सबको सुख-शांति पहुँचाने; 

   हवा तुम जल्दी आना |  


मग में तेरे उपवन होंगे, 

फूलों की सुंदरता से, 

सारे जग को हरसाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


हरश्रृंगार ,चमेली,बेला, 

इन फूलों से खुशबू लेना, 

जग को मह-मह महकाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


खुद का कर श्रृंगार इन्हीं से, 

हरियाली का वसन लपेटे, 

बल खाती  सी मद माती सी; 

हवा तुम जल्दी आना |  


देख तुम्हारे रूप राशि को, 

पीपल के पत्तों सा हिलता, 

मन का कोमल भाव सलोना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


तेरे आने की आहट लें, 

संकेतों से तुम बतलाना, 

पत्ते,डाली खूब हिलाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


नदियाँ,ताल,पोखरे तक, 

लहरा-लहरा कर हमें बतायें, 

उनकी भाषा में समझाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


दिल के भाव उमंगों में भर, 

मन ही मन मुस्कायें, 

ऐसी कोई बूटी लाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


भावों में संवेदना बचे, 

रूखे रिश्तों के घाव भरे, 

ऐसी कोई सूरत लाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


जग सूना है,प्राण हीन है, 

सारे प्राणी भाव हीन हैं, 

इनको प्राण-वायु दे जाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


विपदाओं से परेशान सब,

पड़ जायें बिस्तर पर जब, 

तुम इनको चँवर डुलाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


देर न करना हे सुन्दरी !

जग प्रसन्न हो जाये सारा, 

ऐसी खुशहाली फैलाना; 

हवा तुम जल्दी आना -2 | 

                      रविशंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

  

Monday, August 17, 2020

समय

                                 समय

बह रहे लय बद्ध धारा 

 में ही रहता आ रहा है, 

अनवरत मद मस्त होकर, 

कब से बहता जा रहा है|  


अनवरत प्रवाह में,

गति से गति मिलाकर; 

अनंत से अनंत को; 

कब से बहता जा रहा है|  


मंजिल है इस समय रथ की, 

शायद ही कोई अभी तक;

बह रहा है, बह रहा है, 

कब से बहता जा रहा है | 


कब चला था?

क्यों चला था?

किस जगह से वह चला था? 

कौन सी मंजिल है पाना? 

कब से बहता जा रहा है|  



कितना कुछ देखा है इसने, 

अपने इस अनजान पथ पर; 

कितने बन के मिट गये!  

कब से बहता जा रहा है|  


सभ्यतायें अनगिनत,

बन के मटियामेट हो गयीं; 

कितनी संस्कृतियाँ बहाता;

 कब से बहता जा रहा है|  


बूँद हैं सागर में हम,

कोई अपनी क्या बिसात! 

उसकी गति से गति मिला लो;

 कब से बहता जा रहा है|  


                       रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Saturday, August 1, 2020

बहन

बहन

                                 












माँ जैसी ख्याल है रखती, 
उम्र से अपने बड़ी है लगती, 
बचपन में ही बड़ी हो गयी, 
भाई को दिन भर देखे, 
अपने हिस्से का दे दे,
अपना ध्यान कभी न रखती, 
हम सबकी प्यारी बहना|  

माँ के सुख-दुःख को समझे, 
सबसे पहले पढ़ लेती है, 
माँ के मन के भावों को; 
दिन भर माँ का हाथ बटाये, 
उनके जिम्मे का काम घटाये, 
घर में माँ को राहत देती;
हम सबकी प्यारी बहना|  

भाई दिन भर मस्ती करता, 
फिर भी सबका प्यारा बेटा, 
वह जब भी मस्ती करती, 
माँ की घुट्टी ,पिता की डांट,
हर दम उसका पीछा करते, 
फिर से, 
कछुई सी अपने खोल में जा, 
खो देती अपना बचपन; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

माँ-बाप की चिन्ता बढ़ती, 
उसकी बढ़ती उम्र के साथ, 
रोज-रोज ही सोच रहे हैं, 
कैसे उतरेगा यह भार?
भार नहीं वह कभी रही है, 
और न आगे ही रहेगी, 
पढ़-लिख कर वह सिद्ध करेगी, 
अपने पैरों पर खड़ी रहेगी;
हम सबकी प्यारी बहना|  

जिस दिन उसकी डोली जायेगी, 
माँ बाप का आँगन खो कर,
 प्रिय के घर आ जायेगी,
लेकिन नैहर का नेह न छूटे, 
पल-पल सबको याद करेगी; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

जीवन भर वह सिद्ध करेगी, 
माँ-बापू का ख्याल रखेगी, 
दूजे घर वह भले गयी, 
लेकिन उसका प्यारा घर, 
माँ-बापू का न्यारा घर, 
उसके दिल से कभी न भूले, 
आँगन में अपनों का साथ,  
बात-बात पर नैहर जाने की, 
क्या ? कैसे तरकीब बने ?
जिससे अपने नैहर पहुँचे, 
सब लोगों से जल्दी मिल ले, 
सखी-सहेली,घर-आँगन, 
सब उसकी हैं बाट जोहते, 
दिल ही दिल में सोच रही है; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

कब तक नेह की डोर रहेगी? 
अपने पन की छोह रहेगी! 
उम्र हो रही माँ-बापू की, 
उनके आगे अब क्या होगा? 
क्या भाई अब बुलवाएगा? 
भाभी की बातों में पड़कर, 
क्या वह सब कुछ भूल जायेगा?
कभी-कभी रातों में जगते, 
पूरी रात निकल जाती है, 
सोच-सोच कर थक जाती है, 
फिर माँ की यादों में खोकर, 
पता नहीं कब सो जाती है; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

कभी न कुछ नैहर से चाह, 
धन-दौलत या रुपये-पैसे,  
सब कुछ उसने न्योछावर कर दी, 
प्यार और दुलार में जैसे; 
बस मीठे दो बोल चाहिए, 
अपने पन की ठौर चाहिए, 
दिल में कुछ सम्मान चाहिए,
दिल से कभी न भूले उसको, 
आखों में वह भान चाहिए, 
कुछ भी हो घर में हो अच्छा, 
शादी ब्याह या कि राखी, 
उसको भी सब याद करें, 
फिर से वह अपने घर आये, 
चाचा-चाची,दादा-दादी, 
सखी-सहेली सबसे मिल कर, 
दिन-दिन भर उनसे बतियाये, 
बचपन की यादों को मथ कर, 
उसमें से माखन उतराये, 
माखन के स्वाद में खोकर, 
अपना सबकुछ भूल ही जाये, 
यादों की बारात लिए, 
गली-मोहल्ले में हो आये, 
बीते बचपन की गलियों में, 
फिर से वह सखियों संग जाये, 
खो जाये वह उन गलियों में, 
फिर से आने को कहना; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

उम्र हो रही अब उसकी, 
आना-जाना नहीं है संभव, 
ताक रही है आस लगाए, 
कोई तो नैहर से आये, 
फिर से वह एक बार पहुँच कर, 
जी ले अपना प्यारा बचपन, 
जीवन भर वह दूर रही पर, 
भूल न पायी अपना नैहर, 
उसकी गलियां या बचपन; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

अंत समय में भी उसको, 
साँस उखड़ जाते-जाते,
स्मृतियों में चली गयी है; 
माँ-बापू,चाचा-चाची, 
सखी-सहेली,भाई-बहना, 
सब उसको अब याद आ रहे, 
आँगन में बैठे सब हैं, 
सब उसको याद कर रहे, 
वह भी उनको देख रही है,
जीवन भर वह रही कहीं भी, 
उसकी आत्मा यहीं रही है, 
यही सोचते यादों में, 
सासों की डोर छूट रही है, 
चली गयी इहलोक से वह, 
पहने यादों का गहना; 
हम सबकी प्यारी बहना-2|   

                 रविशंकर उपाध्याय 
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|