किसान
देश की मजबूती का सहारा,
उसकी समृद्धि का खजाना,
उसकी रीढ़ की हड्डी बन कर;
हर विपदा में उसे संभाले,
हर हालत में देखे-भाले,
तरह-तरह की फसल उगाकर,
स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाता,
रात और दिन खेत में नधता,
हाड़ तोड़ परिश्रम करता,
धन-धान्य से देश संवारता,
खुद सूखी रोटी पर पलता,
धोती फटी,झीनी बनियान,
फिर भी चेहरे पर मुसकान!
सुख-दुःख की आँख मिचौली में,
दुःख जिसके पाले में आता;
वह है अपना किसान|
कर्ज के बोझ से नख-शिख डूबा,
ब्याज की रकम भी न दे पाता,
एक टक बस फसलों को तकता,
सूखा,बारिश या फिर कीड़ों से,
यदि फसलें बरबाद हो गयीं;
उसका सारा सपना धुलता,
सारे सपनों के मर जाने पर,
खुद भी फंदे पर झूलता;
पीछे उसके बीबी,बच्चे,
रोटी-रोटी को तरसें,
सरकारें बस रोटी सेंकें!
बड़े-बड़े वादे करके,
उनके अरमानों से खेलें,
इन विपदाओं की आँधी में,
जिन लोगों की नींव हिल गयी;
वह है अपना किसान|
सदियों से वह कर्मवीर है,
मातृभूमि का धर्मधीर है,
लेकिन उसकी दशा बुरी है,
कर्ज के बोझ से दबा हुआ है,
घर में अगर कोई विपदा हो,
बस उसको उधार चाहिए,
सूदखोर के मकड़ जाल में,
फंसने को मजबूर हुआ है;
ब्याज की दर इतनी ज्यादा है,
जिसको भरते दम घुट जाता है;
मूलधन तो पड़ा हुआ है;
फिर खेतों की बारी आती,
जिस पर गिद्ध निगाह गड़ाये,
हर कोई ही डटा हुआ है,
एक-एक कर खेत बिक रहे,
खेतिहर से मजदूर हो रहे,
पराश्रित जीवन जीने को,
अब वे सब अभिशप्त हो रहे;
कोई उनकी खबर न लेता,
सब अपने स्वार्थ में डूबे,
मंडी के दलाल हों या फिर,
बड़ी-बड़ी कृषि कम्पनियाँ;
सब उसका बस खून चूसते,
मुनाफों से जेब ठूसते,
सरकारें अपना हित देखें!
वोट बैंक की राजनीति है,
जान बूझ कर सब चुप बैठें!
कैसे चक्रब्यूह में घिर कर,
अभिमन्यु सा तड़प रहा है,
कोई इसे निकाले इससे,
कोई इसके जान को बख्शे,
आस लगाये,हाथ उठाये,
भीगीं पलकें नम आँखों से,
चहुँ ओर गुहार लगाए,
कोई तो उद्धार कराये -2 |
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |

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