भ्रष्टाचार
भ्रष्ट मंत्री,भ्रष्ट संत्री,
भ्रष्ट लोग बाग हैं|
भ्रष्ट साहब,भ्रष्ट बाबू ,
भ्रष्ट सभी आम हैं|
भ्रष्ट सारी सोच सबकी;
भ्रष्ट सारे काम हैं;
भ्रष्ट गुरु,भ्रष्ट चेला,
भ्रष्ट बड़े नाम हैं;
भ्रष्ट नौकर,भ्रष्ट मालिक,
भ्रष्ट पंडित,भ्रष्ट मुल्ला,
भ्रष्ट नगर और मोहल्ला|
भ्रष्टता चहक रही,चमक रही,
चसक बनी सरक रही;
गाँव,घर बहक रही;
हवा में घुल महक रही;
यहाँ,वहाँ,कहाँ नहीं ?
नजर से अब परे नहीं;
न रात-दिन का फेर अब,
सभी जगह वही वही !
सुधी सभी तड़प रहे,
दीन बन दहक रहे;
ज़मीर जार हो रही;
इधर-उधर भटक रही;
आर्तनाद कर रहा;
गली-गली पसर रहा;
भूख से तड़प रहा,
आज पूरा देश है|
उठो सभी!उठो सभी!
उखाड़ फ़ेंक दें अभी,
भ्रष्ट हों जहाँ कहीं;
न उनको लेने चैन दें;
समाज को जगा दें;
सही लोकपाल दें;
देश को सवाँर दें;
नेक,नियत,सत्यता,
और सच्चे बैन दें;
बच्चे,बूढ़े और सबको;
चैन भरी रैन दें | |-2
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |

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