घर
थक-हार कर कहीं से आओ,
दिनभर भागम-भाग से आओ,
दिल दिमाग को राहत दे जो;
वह होता है घर |
दिनभर बाहर कहीं रहो,
काम काज में फंसे रहो,
माँ जैसे जो आहट पाये;
वह होता है घर |
आलीशान महल जैसा हो,
घास-फूस का छप्पर या हो,
दिल को जो सुकून पहुंचाए;
वह होता है घर |
शरीर हमारा कहीं भी भटके,
इधर-उधर के लटके-झटके,
आत्मा जहाँ सदा रहती हो;
वह होता है घर |
खुशुबू मीठे सम्बन्धों की,
अपनेपन की, आत्मीयता की,
हर दम ही जिस जगह से आये;
वह होता है घर |
माँ जिस जगह से बाट जोहती,
बच्चे,पत्नी सब बेसब्री से,
अपनों के आने की राह देखती;
वह होता है घर |
ईंटों से बनता मकान है,
आपस के सम्बन्धों से भिनकर,
गीतों की धुन जहाँ से बजती;
वह होता है घर |
अब तो सबकुछ बदल गया है,
घर आँगन सब खाली-खाली है,
पहले जैसा नहीं रहा अब ;
घर जैसा अब नहीं रहा घर |
परिवार सब टूट चुके हैं,
आपस में सब रूठ चुके हैं,
दिलों में सबके पड़ी दरार अब!
घर जैसा अब नहीं रहा घर |
रोजी-रोटी के चक्कर में,
हर कोई अब भाग रहा है,
सम्बन्धों की डोरी टूटी !
घर जैसा अब नहीं रहा घर |
नयी सदी के उदार वाद ने,
गाँव,शहर के बाजारवाद ने,
सब कुछ तहस-नहस कर डाला!
घर जैसा अब नहीं रहा घर |
चलो चलें फिर से हम अपना,
प्यारा सा संसार बसाएं,
जो केवल मकान न होकर;
अपना सपनों सा घर हो!
जिसमें सम्बन्धों की मिठास हो,
अपनेपन का आभास हो,
रूठे बिछड़े सभी साथ हों;
तब होगा वह अपना घर !-2
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित |

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