Sunday, December 6, 2020

घर

                   घर  








थक-हार कर कहीं से आओ, 

दिनभर भागम-भाग से आओ, 

दिल दिमाग को राहत दे जो; 

वह होता है घर | 

दिनभर बाहर कहीं रहो,

काम काज में फंसे रहो, 

माँ जैसे जो आहट पाये; 

वह होता है घर | 

आलीशान महल जैसा हो, 

घास-फूस का छप्पर या हो, 

दिल को जो सुकून पहुंचाए;

वह होता है घर | 

शरीर हमारा कहीं भी भटके, 

इधर-उधर के लटके-झटके, 

आत्मा जहाँ सदा रहती हो;

वह होता है घर | 

खुशुबू मीठे सम्बन्धों की, 

अपनेपन की, आत्मीयता की, 

हर दम ही जिस जगह से आये; 

वह होता है घर | 

माँ जिस जगह से बाट जोहती, 

बच्चे,पत्नी सब बेसब्री से, 

अपनों के आने की राह देखती; 

वह होता है घर | 

ईंटों से बनता मकान है, 

आपस के सम्बन्धों से भिनकर, 

गीतों की धुन जहाँ से बजती; 

वह होता है घर | 

अब तो सबकुछ बदल गया है, 

घर आँगन सब खाली-खाली है,

पहले जैसा नहीं रहा अब ; 

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


परिवार सब टूट चुके हैं, 

आपस में सब रूठ चुके हैं, 

दिलों में सबके पड़ी दरार अब! 

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


रोजी-रोटी के चक्कर में, 

हर कोई अब भाग रहा है, 

सम्बन्धों की डोरी टूटी !

घर जैसा अब नहीं रहा घर | 


नयी सदी के उदार वाद ने,

गाँव,शहर के बाजारवाद ने, 

सब कुछ तहस-नहस कर डाला!

 घर जैसा अब नहीं रहा घर | 

 

चलो चलें फिर से हम अपना, 

प्यारा सा संसार बसाएं, 

जो केवल मकान न होकर;

अपना सपनों सा घर हो! 


जिसमें सम्बन्धों की मिठास हो, 

अपनेपन का आभास हो, 

रूठे बिछड़े सभी साथ हों; 

तब होगा वह अपना घर !-2 

            रवि शंकर उपाध्याय 

   मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित | 

No comments:

Post a Comment