Friday, October 2, 2020

असुरक्षित बेटियाँ

                      असुरक्षित बेटियाँ






बिटिया सयानी थी, 

पूरे घर की रानी थी, 

दिन-रात चहकती थी, 

आँगन में फुदकती थी, 

सबकी दुलारी थी; 

अकस्मात एक दिन, 

दरिंदों ने दबोच उसे, 

नोच डाले पंख सारे, 

लहूलुहान कर उसे, 

अधमरा कर दिया; 

तार-तार कर दिया, 

उसकी अस्मिता को,

उसकी सुचिता व् , 

उसकी पवित्रता को; 

फिर फ़ेंक कर सड़क पर, 

निर्द्व्न्द हो के चल दिये, 

वह बेचारी तड़प रही, 

रो रही,कलप रही, 

मदद को पुकारती, 

कष्ट से चिल्हक रही, 

लेकिन कोई कृष्ण बन कर, 

उसकी गुहार सुन कर, 

दौड़ता न आ सका !


बल्कि उसकी बात को, 

अनसूना कर दिया; 

आठ दिन बेहोश थी, 

दर्द से कराहती, 

अपनों को पुकारती, 

पीड़ा को सह रही, 

जिंदगी की जंग को, 

वीरता से लड़ रही; 

अपनी जीजिविषा से, 

फिर से संज्ञान लेकर; 

आपबीती सब कही, 

जीभ उसकी काट दी थी, 

गर्दन व् रीढ़ की

 हड्डियाँ भी तोड़ दी थी, 

कराहती, चीत्कारती, 

बचाव को पुकारती, 

लगातार वह रही थी, 

लेकिन उन दरिंदों ने 

उसकी एक न सुनी, 

सहन करते दर्द भारी,

वह बेहोश हो गयी; 

फिर भी उसने जारी रखा, 

मौत से संघर्ष को;

लेकिन, 

तन,मन लहूलुहान थे, 

साथ उसका न दे सके, 

वह न फिर से उठ सकी!

चली गयी,चली गयी, 

समाज को दुत्कारती, 

 वितृष्णा से निहारती !


कैसा ये समाज है?

कैसी ये व्यवस्था है?

लोग कैसे हो गए हैं?

क्यों ऐसे लोग हो गए हैं?

जहाँ न सुरक्षित अब 

अपनी बहू,बेटियाँ! 

चील,गिद्धों की निगाह से, 

निहारते बहू, बेटियाँ! 

न घर में,न समाज में, 

सुरक्षित हैं बेटियाँ! 

कहाँ गए मूल्य सारे? 

कहाँ गयी संवेदना? 

कहाँ गये संस्कार सारे? 

कहाँ गयी सद्भावना? 

सब कुछ हमने त्याग आज, 

जानवर से हो गये हैं; 

सम्वृद्धि के मदांध हो< 

मूल्य सारे खो दिए हैं; 

चरित्र आज मृतप्राय! 

मानवता लहूलुहान है! 

त्याग,सत्य,न्याय,मूल्य, 

आज सारे संज्ञा शून्य! 

विकास की अंधी गली में, 

आज सारे खो गए हैं: 

व्यवस्था भी काठ हो, 

आज कहीं पर खड़ी है; 

क्या ऐसे ही समाज की

हमने की थी कल्पना!

आज हमें सोचना है, 

सोचना है,सोचना है...  

                 रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 



     

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