Sunday, September 13, 2020

माँ





                 माँ














मैंने माँ को रात-रात भर, 

अपनों के खातिर,

जगते देखा है;

मैंने माँ को बात-बात पर, 

अपनों के दुःख में रोते देखा है | 


मैंने माँ को अपनों के सुख में, 

अपना सुख रचते देखा है; 

मैंने माँ को अपनों के सुख के खातिर, 

अपना सुख खोते देखा है|  


मैंने माँ को घर के कामों से, 

कभी न रुकते,थकते देखा है; 

मैंने माँ को दिनभर, 

कोल्हू के बैलों सा नधते देखा है! 


मैंने माँ को बच्चों के हित में, 

अपना सुख तजते देखा है; 

मैंने माँ को नींद से बोझिल होते भी, 

कभी न पल भर भी रुकते देखा है|  


मैंने माँ को रात और दिन, 

पति सेवा में रमते देखा है; 

मैंने माँ को दुःख में भी, 

शांत चित्त रहते देखा है|  


मैंने माँ को सारी चिंता, 

अपने सिर मढ़ते देखा है; 

मैंने माँ को त्याग और समर्पण की, 

प्रतिमूर्ति में ढलते देखा है|  


मैंने माँ को सबके हित में, 

कुछ न कुछ करते देखा है; 

मैंने माँ को जीवन भर, 

बस अन्यों को देते देखा है|  


मैंने माँ को अपनों के सुख में, 

अपना सुख पाते देखा है; 

 मैंने माँ को जीवन भर, 

निःस्वार्थ कर्म करते देखा है|  


मैंने माँ को कभी-कभी, 

गीता,रामायण पढ़ते देखा है; 

 और गीता के उपदेशों को, 

जीवन भर जीते देखा है|  


मैंने माँ को घर के सारे जंजाल, 

उठाते देखा है;

चेहरे पर  उनके न शिकन कोई, 

मंद-मंद उनको दिन भर मुस्काते देखा है| 


मैंने माँ को औरों के दुःख में, 

अपना हाथ बढ़ाते देखा है; 

मैंने माँ को विपत्ति काल में, 

सबको शांत कराते देखा है|  


मैंने माँ को जीवन भर, 

तीज और त्योहारों पर, 

खूब मजे से गाना गाते 

और पकवान बनाते देखा है|  


मैंने माँ को कठिन घड़ी में भी, 

धैर्य नहीं खोते देखा है; 

स्थिर मन से बड़ी समस्या भी, 

उनको सुलझाते देखा है| 


मैंने  माँ को कभी न जीवन में, 

लड़ते और झगड़ते देखा है; 

सामने वाले के गुस्सा होने पर, 

चुप हो उसे समझते देखा है|  


मैंने माँ को जनहित में, 

ईश्वर से रिरियाते देखा है; 

अपने लिए कभी न जीवन भर, 

चाह के भी करते देखा है|  


मैंने माँ को अंत समय तक, 

बस करते-धरते देखा है; 

मैंने माँ को देवी बनते, 

पल-पल उनमें ढलते देखा है|  

                   रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|  



4 comments:

  1. मातृहीन बालक संसार का सबसे करुणाजनक प्राणी है। दीन से दीन प्राणियों को भी ईश्वर का आधार होता है जो उनके हृदय को सहलाता रहता है। मातृहीन बालक इस आधार से वंचित होता है। माता ही उसके जीवन का एकमात्र आधार होती है। माता के बिना वह पंखहीन पक्षी है। "मुंशी प्रेमचंद " ( गृहदाह )

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  2. मातृहीन बालक संसार का सबसे करुणाजनक प्राणी है। दीन से दीन प्राणियों को भी ईश्वर का आधार होता है जो उनके हृदय को सहलाता रहता है। मातृहीन बालक इस आधार से वंचित होता है। माता ही उसके जीवन का एकमात्र आधार होती है। माता के बिना वह पंखहीन पक्षी है। "मुंशी प्रेमचंद " ( गृहदाह )

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