Thursday, December 31, 2020

नया साल

                      नया साल



बीत रहा था साल, 

बहुत ही धीरे-धीरे; 

जैसे कोई साँप सरकता; 

फन काढ़े धीरे-धीरे|  


थोड़े से दिन और बचे हैं; 

उन कठिन दिनों के; 

जैसे थोड़ी सी  पूँछ 

बची हो विषधर की |  


पूूरा साल बहुत कठिन था!

खूब छकाया इसने जन जीवन को; 

पस्त हो गए दुनिया के सारे महिधर; 

बना गया जीवन सबका ही दुष्कर|  


हर कोई हलकान हो गए; 

मारे-मारे सभी फिर रहे; 

किंकर्त्तवविमूढ़ सभी थे; 

हर कोई परेशान हो गए|  


अदृश्य शक्ति से डर कर सारे; 

भाग रहे थे मारे-मारे; 

जग में हा-हा कार मचा था; 

डर कर दुबक गए थे सारे|  


सबकी नौकरियाँ छूट रही थीं; 

सपनों की डोरी टूट रही थी; 

असहाय सा जग था सारा; 

सबकी मंजिल छूट रही थी|  


हर तरफ अफरातफरी थी; 

कोई राह न सूझ रही थी; 

विपदा की इस कठिन घड़ी में; 

सबकी राहें छूट रही थीं|  


नए साल में कुछ ऐसा हो:

जो सबको ही राह दिखाये; 

बीते गम इस ग़मगीन साल के; 

हम सबके चेहरे मुस्कायें | 


इस विपदा से निजात मिले; 

ऐसी कोई राह दिखाए! 

जिससे अपने पिछले गम भागे; 

चहुँ ओर खुशियाँ लहराये|  


नये साल में नई ऊँचाई; 

हर कोई बस पा ही जाएँ; 

बच्चे,बूढ़े हर्षित हों सब; 

घर आँगन में खुशियाँ आये|  


फिर से देश प्रगति पथ पर; 

नित नए झण्डे लहराये: 

खेतों,खलिहानों में खुशहाली हो; 

अन्न आदि से घर भर जाये|  


शिक्षा की गति धीमी है जो; 

वह फिर से पटरी पर आये; 

विश्व गुरु हम थे जो कल; 

फिर से वह स्थान बनायें|  


नया साल खुशियों का घर हो; 

खुशियों का पैगाम दिलाये; 

हर चेहरा खुश हो दुनिया का; 

ऐसा कुछ ये साल ले आये | -2 

                      रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

 

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