समय
बह रहे लय बद्ध धारा
में ही रहता आ रहा है,
अनवरत मद मस्त होकर,
कब से बहता जा रहा है|
अनवरत प्रवाह में,
गति से गति मिलाकर;
अनंत से अनंत को;
कब से बहता जा रहा है|
मंजिल है इस समय रथ की,
शायद ही कोई अभी तक;
बह रहा है, बह रहा है,
कब से बहता जा रहा है |
कब चला था?
क्यों चला था?
किस जगह से वह चला था?
कौन सी मंजिल है पाना?
कब से बहता जा रहा है|
कितना कुछ देखा है इसने,
अपने इस अनजान पथ पर;
कितने बन के मिट गये!
कब से बहता जा रहा है|
सभ्यतायें अनगिनत,
बन के मटियामेट हो गयीं;
कितनी संस्कृतियाँ बहाता;
कब से बहता जा रहा है|
बूँद हैं सागर में हम,
कोई अपनी क्या बिसात!
उसकी गति से गति मिला लो;
कब से बहता जा रहा है|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |

सभ्यताएं अनगिनत ,, बन के मटियामेट हो गई,,
ReplyDeleteक्या खूब,,, क्या खूब ,,, 👌👌👌
बहुत बहुत धन्यवाद अविनाश ।
ReplyDeleteBahot hi badhiya... This is one of your best creation...
ReplyDeleteThanks Ankit.
ReplyDeleteThanks Ankit.
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