Tuesday, December 29, 2020

मंजिल

               मंजिल








कितना भी कुछ कर लो यारों, 

दिनभर भागो,दिनभर दौड़ो, 

दिन और रात की चैन के बदले,

बिन खाये,बिन पीये कुछ भी, 

चाहे जितना खून बहा लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


इसको मारो,उसको काटो; 

इसका छीनो,उसका ले लो; 

घर में धन का अम्बार लगा लो; 

सोना खाओ!चाँदी पहनो! 

आलीशान महल बना लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


भौतिकता की लहर में बहकर, 

मानव मूल्य सभी भुला दो; 

नख-शिख स्वार्थ में डूबे रह कर; 

परमार्थ का मूल्य गिरा दो! 

बस खुद का ही हित साधो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


शिक्षित न बन साक्षर बन लो; 

शिक्षा का तुम अर्थ भुला दो; 

गौरव शाली अतीत भुलाकर; 

पश्चिम को आदर्श बना लो; 

खुद कमा कर,खुद ही खा लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


अपने सारे संस्कार भूल कर, 

नारी का सम्मान गिरा कर, 

सरे आम तुम लम्पट बन कर, 

चाहे जितना मूल्य गिरा लो; 

सब कुकृत्य चाहे अपना लो; 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


बड़े बुजुर्ग असहाय भले हों; 

सबकुछ त्याग दिया भले हों; 

उनके इस कठिन घड़ी में; 

उनको हम सबकी हो जरूरत; 

फिर भी हम सब दूर खड़े हों! 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


क्या लाये थे?

क्या ले जायेंगे?

कहाँ से आये?

क्या है मंजिल?

सब कुछ यहीं धरा रह जाता! 

पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ! 


सारे सपने,सारी यादें, 

सारा जीवन आँखों के आगे; 

चलचित्र सा तेजी से भागे; 

अपना किया धरा सब पीछे; 

धूँ-धूँ कर जल रहे चिता पर!

मंजिल है बस धुँआ-धुआँ!-2    


रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|| 

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