मंजिल
कितना भी कुछ कर लो यारों,
दिनभर भागो,दिनभर दौड़ो,
दिन और रात की चैन के बदले,
बिन खाये,बिन पीये कुछ भी,
चाहे जितना खून बहा लो;
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
इसको मारो,उसको काटो;
इसका छीनो,उसका ले लो;
घर में धन का अम्बार लगा लो;
सोना खाओ!चाँदी पहनो!
आलीशान महल बना लो;
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
भौतिकता की लहर में बहकर,
मानव मूल्य सभी भुला दो;
नख-शिख स्वार्थ में डूबे रह कर;
परमार्थ का मूल्य गिरा दो!
बस खुद का ही हित साधो;
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
शिक्षित न बन साक्षर बन लो;
शिक्षा का तुम अर्थ भुला दो;
गौरव शाली अतीत भुलाकर;
पश्चिम को आदर्श बना लो;
खुद कमा कर,खुद ही खा लो;
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
अपने सारे संस्कार भूल कर,
नारी का सम्मान गिरा कर,
सरे आम तुम लम्पट बन कर,
चाहे जितना मूल्य गिरा लो;
सब कुकृत्य चाहे अपना लो;
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
बड़े बुजुर्ग असहाय भले हों;
सबकुछ त्याग दिया भले हों;
उनके इस कठिन घड़ी में;
उनको हम सबकी हो जरूरत;
फिर भी हम सब दूर खड़े हों!
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
क्या लाये थे?
क्या ले जायेंगे?
कहाँ से आये?
क्या है मंजिल?
सब कुछ यहीं धरा रह जाता!
पर मंजिल बस धुआँ-धुआँ!
सारे सपने,सारी यादें,
सारा जीवन आँखों के आगे;
चलचित्र सा तेजी से भागे;
अपना किया धरा सब पीछे;
धूँ-धूँ कर जल रहे चिता पर!
मंजिल है बस धुँआ-धुआँ!-2
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित||

अतिउत्तम 👍
ReplyDeleteThanks.
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