Wednesday, December 31, 2025

                                                             स्वागतम् नववर्ष!  





                                                               स्वागतम् नववर्ष!   

भर गयी है ख़ुशी हर तरफ;

आगमन आपका,

स्वागतम् आपका| 

हम खड़े थे  यहाँ,कब से यह सोचते;

कब पड़ेगा यहाँ ,यह कदम आपका;

आगमन आपका,

 स्वागतम् आपका | 

था बड़ा ही मधुर वो सपना मेरा; 

हम बिछा देंगे अपना पलक पावँड़ा,

पुष्प वर्षा करेंगे सभी प्यार से 

जब हमें होगा दर्शन कभी आपका; 

आगमन आपका,

स्वागतम् आपका|  

देगी प्रकृति हमें साथ हर पल यहाँ, 

भर के खुशबू सुहावन मनोरम तथा 

मेघ काले छटेंगे बड़े प्यार से, 

देख स्वप्निल मनोरम प्यारा समाँ: 

वायु शीतल बहेगी मंदम् गती, 

पाँव जब भी पड़ेगा अभी आपका,

आगमन आपका, 

स्वागतम् आपका|  

भाव विह्वल से हो गए हैं सभी 

पा के नववर्ष का यह प्यारा समाँ!

बार शत्-शत् नमन हैं करते सभी: 

कर गया धन्य है, 

आगमन आपका; 

स्वागतम् आपका-2 || 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |  







Wednesday, December 24, 2025

                                     कविता 




                                 कविता 

कविता;

कवि  मन की सरिता;

मन की संवेदनशीलता का सार;

दिल की विह्वलता का रजतहार ;

स्वर्गिक सुंदरता का स्वर्णधार;

कोयल के कलरव का कंठहार; 

उगते सूरज का स्वर्णसार;

गोधूलि बेला की गरिमा का सार;

युवजन के कोमल सपनों का 

स्वर्णिम संसार; 

पर्वत और समंदर की हरितक्रांति की 

संगीतमयी सुंदरता का आभास;

मानव जीवन  के 

सुख -दुःख में 

समभाव बने रहने का भाव;

कविता;

कवि  मन की सरिता ...|| -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |  

Tuesday, December 23, 2025

                                         बच्चे 





                                  बच्चे 

मुक्त पवन से,

कल-कल बहती 

नदियों के स्वर से;

कलरव करती 

चिड़ियों के दल से;

खिल उठते चेहरे उनके 

रवि किरणों के खिलने से | 

मन से निश्छल, 

निर्विकार गंगा के जल से; 

कल की चिंता से परे बहुत; 

अपने में मगन ;

चहकते दिन भर, 

फूलों से 

खिले-खिले हरदम

करते अपने मन की दिनभर;

बच्चे प्रतिरूप 

परम ईश्वर के |

  

आज खो गया 

निश्छल मन,

अनुशासन ,अपनापन ;

मूल्य और चहकपन !

वैमनस्य और अभिमान;

दीख पड़ते हैं पॉँव 

पूत के पालने से ही!


उनको उनका बचपन 

आज उन्हें लौटाना है,

उनको यदि 

अच्छा इंसान बनाना है, 

तो;

खुद को पहले 

इंसान बनाना है || -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय | 

 


Saturday, December 20, 2025

                                बरगद 



      बरगद 

जड़ से उजड़ गया 

बरगद का वह पेड़ ;

जिसने जीवन भर 

थके-हारे राहगीरों ,

चिड़ियों ,उनके बच्चों ,

और ,

न जाने कितने लोगों को 

आगे बढ़ने ,उड़ान भरने

और, 

जीवन  में सपने देखने को 

प्रेरित किया | 

धूप ,शीत और वर्षा 

खुद सहता रहा 

और ,

औरों को सहारा 

देता रहा | 

दूर देश से आया अजनबी हो 

या, 

पास का कोई राहगीर ;

कोई प्रवासी पक्षी हो 

या ,

अपने शाख  पर बनाये 

घोसले में रहती चिड़िया 

या ,

उसका बच्चा; 

सबको अपनी शीतल छांव में 

अपनेपन का एहसास 

कराता रहा ;

और ,

जाने से पहले 

इतने नन्हे-नन्हे बीज 

जमीन को दे गया 

कि,

आने वाला समय 

उसकी परम्परा के नाम होगा 

और,

किसी थके राहगीर ,चिड़िया 

या, 

कोई भी हो!

को अपने शीतल छाँव में लेकर 

वही चिर-परिचित अपनेपन का 

एहसास दिलाएगा 

और,

बरगद के बूढ़े वृक्ष की आँखों में 

तैरते सपनों को साकार बनायेगा || -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय | 


Thursday, December 18, 2025

                               वृद्धाश्रम से  पिता 


  वृद्धाश्र से पिता

अभी अभी गया है बेटा 

बाप से मिल कर ,

वृद्धाश्रम से !

आँखें फिर से गड़ाये रखेगा 

इन्तजार में !

जाने कब फिर आएगा वह 

बाप से मिलने ,

समय निकाल कर,

बीबी-बच्चों से बचकर |   

क्योंकि ,

उन्हें कभी  समझ नहीं आता 

बूढ़े के लिए बेटे  का प्यार !

बाप ने जो किया, 

उसकी जिम्मेदारी थी; 

फिर इसमें नया क्या किया ?

पैदा किया था, 

तो पालना ही था ;

अच्छी शिक्षा , सारी सुख -सुविधा 

देना ही था ;

भले ही खुद हमेशा 

परेशानियों  में जिया ;

इसमें नया क्या किया ?

ऊँगली पकड़ चलना सिखाया ,

बेटे  को अच्छा मिले ,

के लिए ;

वह अपने सपने लिए ;

ताउम्र तरसता रहा 

जीने के लिए !

बेटे का सप्ताह से महीने ,

और बरस में 

आते रहने का क्रम 

कभी भी टूट सकता है | 

क्योंकि ,

बाप- बेटे को जोड़ता यह भ्रम 

कभी भी टूट सकता है || -2  

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय  



Tuesday, December 16, 2025

                                  चिड़िया  


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                               चिड़िया 

अपने को सयानी समझ 

चिड़िया उड़ चली !

अपनों से दूर ,

बाप के स्नेह ,

माँ के प्यार, 

भाई -बहनों के आपसी 

नोंक -झोंक  को छोड़,

अपना घर बसाने !

उसे नहीं पता 

कि ,

जमाना कितना ज़ालिम  है !

खुले-अधखुले पंख, 

नैसर्गिक लावण्य ,

निश्छल मन 

कभी भी तोड़ सकता है | 

अपने स्वार्थ, कपट

और कुटिल चालों से 

उसे अपनों से दूर कर ,

सामाजिक बहिष्कार का दंश दे ,

कहीं का नहीं रखेगा !

और ,

स्वर्ग जैसे घोंसले  को उजाड़ ,

उसके पंख उखाड़ ,

माँ ,बाप और अपनों की 

नज़रों से गिरा !

उसे उसकी ही नज़रों से

 गिरा देगा | 

और ,

नदी के बहते जल सा 

उसके सारे  सपने बहा देगा || -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |     


Monday, December 15, 2025

                                                                       मेरा  मन 





     मेरा मन 


परिस्थितियों के भंवर से 

निकालने को 

अपने सपने को ,

छटपटाता मेरा मन | 

अपने ही व्यूह  में फँस जाने का 

सारे अरमानों को 

उनसे सुलझाने को 

अकुलाता मेरा मन| 

मैं चला था ,

राह एक सीधी पकड़कर !

पर उसी राह पर 

लडख़ड़ाते कदमों को 

सम्हाल न पाने की विवशता से 

झुझलाता  मेरा मन | 

मैं को मैं की मुकाम 

न दे पाने की तड़प ,

अपने दायित्यों को 

न निभा पाने की तड़प ,

और अपने कन्धों पर 

बढ़ते बोझ को 

न उठा पाने की तड़प !

मुझे मेरे ही नज़रों में 

गिरा देने से पहले ,

अपने मुकाम को 

पा  लेने को ठाने मेरा मन ||-2  

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय।