राम जाने
रिश्तों के मायने;
सामाजिक ताने-बानें;
जब-तब मिलने;
दिल खोल कर बतियानें;
पुराने दिनों की यादों के
पंख पर बैठ;
स्मृतियों की कोठारी में से,
बहुत कुछ ढूँढ लाने;
फिर;
एक-एक याद पर
घंटों बैठ जुगाली
करने और कराने;
यारों की महफिल में,
यादों की बारात सजाने;
उनके उलझे ताने -बाने सुलझाने;
वक्त बे वक्त कहीं आने व जाने;
अपनों के काम में हाथ बटाने ;
दूसरों के गम को अपना बनाने ;
अब हमें कहाँ जाने ?
अपने ही घर में बैठ,
समय है बिताने;
चाह कर भी
दूसरों के काम,
हमें अब न आनें!
पहले वाले दिन,
अब कब आने ?
राम जाने-राम जाने -2 |
रविशंकर उपाध्याय
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

Nice description of the unprecedented social aloofness resulting from Corona pandemic.
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