बन्द
मन्दिर-मस्जिद जानेवाले;
आपस में मिल-जुल रहनेवाले;
सुख-दुःख में हाथ बटाने वाले;
रोज़ कमाकर खानेवाले;
ठेलिया,खोमचा,सब्जीवाले
अपने घर में बंद |
बचा-खुचा घर का राशन
चार दिनों में खर्च;
अब क्या खायें ?
घर के बच्चे,
घर के बूढ़े,
काम-धाम सब ठप्प |
रोज़ सोचते घर से निकले;
थोड़ा बहुत कमाकर लौटे;
जिससे घर का खरचा सरके,
रोती बिटिया रोटी खाके
हो जाये हप्प !
लेकिन जैसे गली में पहुँचा;
गली में बैठा डण्डाधारी,
डण्डा लेकर उसपे दौड़ा;
ठेलिया छोड़ गली में ही;
जोर लगाकर घर में भागा;
फिर से घर में बन्द;
अपने घर में बन्द |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

Very good poem uncle can I use it in my competition
ReplyDeleteThanks beta .You can use my poem .
ReplyDeleteThanks for giving me permission. Pranam
ReplyDeleteExcellent poem on current situation ��
ReplyDeleteThank you Pramod .
ReplyDeleteBahut badhiya. Ek dam sajeev chitran vertaman paristhitiyon ka🙏🙏
ReplyDeleteThanks.
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