Friday, May 15, 2020

कोरोना के परिणाम का एक भावनात्मक विस्तार |



      बन्द 




मन्दिर-मस्जिद जानेवाले; 
आपस में मिल-जुल रहनेवाले;
सुख-दुःख में हाथ बटाने वाले; 
रोज़ कमाकर खानेवाले; 
ठेलिया,खोमचा,सब्जीवाले 
अपने घर में बंद |


बचा-खुचा घर का राशन 
चार दिनों में खर्च;
अब क्या खायें ?
घर के बच्चे,
घर के बूढ़े,
काम-धाम सब ठप्प  |

                

रोज़ सोचते घर से निकले;
थोड़ा बहुत कमाकर लौटे;
जिससे घर का खरचा सरके, 
रोती बिटिया रोटी खाके 
हो जाये हप्प !


         

लेकिन जैसे गली में पहुँचा;
गली में बैठा डण्डाधारी,
डण्डा लेकर उसपे दौड़ा; 
ठेलिया छोड़ गली में ही;
जोर लगाकर घर में भागा;       
फिर से घर में बन्द;
अपने घर में बन्द |  
            


रविशंकर उपाध्याय  

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 


7 comments: