Tuesday, May 19, 2020

प्रवासी मजदूरों की व्यथा

                          प्रवासी के गम           

                           

गहन मंत्रणा जारी  है,
हर घर के गलियारे में;
कहाँ फँस गया मेरा बेटा?
कैसे होगा? 
क्या खायेगा?
रोज रोज की खबरें सुन;
दिल बैठे,
कब आयेगा?


अब तक न बची कमाई होगी; 
दर-दर भटक रहा होगा;
रातों में दुःख भारी होगा ;
दुःख में साथ न देता कोई;
अपनों का भी गम होगा ;
बच्चे-बहू साथ में होंगे;
पैदल ही चलना  होगा;
छोटे बच्चे का चलते-चलते;
भूख और थकान के कारण, 
रोना व जिद जारी होगा |  
चलते रहने से,पैरों के छालों में,
टीस उठ रहा भारी होगा;
फूट गये पैरों के छालों से,
कष्ट भयंकर जारी होगा;
राह दूर है अभी बहुत;
फिर भी चलते रहना होगा -२ |  


खबरें रोज-रोज की सुन,
दिल बैठे मन भारी हो गये,
ट्रेनों से कट गये; 
सड़क पर कुचले;
भूखों मर गये;
प्यास से मर गये;
पुलिस से पिट गये ;
कितनी माँओं के लाल मर गये;
दिल धक् करता सोच-सोच के;
अपने बेटों-बेटी संग,
मेरा बेटा कैसे होगा?


किसी तरह जा पहुँचें,
अपनी माँ के आँचल में; 
पिछले सारे गम धो कर;
अपनों के संग हो लेगा;
मिल-जुल कर रह लेगा;
सुख-दुःख में हाथ बटाकर;
आधी-आधी  रोटी खा कर;
गाँव में ही रह लेगा वह | 
मृगतृष्णा से कोरे सपनों के,
पीछे कभी न भागेगा | 
यही सोचकर डग भरता,
लम्बे-लम्बे कदम चल रहा;
लेकिन थोड़ी ही देरी में;
थक जाता है;
थक जाता वह -२| 


दूर गाँव में बैठी माँ, 
आँचल फैलाये बैठी माँ, 
ऊपर देखे बड़े आस से;
कुछ तो कर हे ऊपर वाले;
जिससे आये मेरा लाल;
पलक-पाँवड़े बिछाये मग में;
आस लगाये बैठी माँ,
जल्दी आ जाते तुम बेटे,
मिट जाता सारा ही मलाल -२|

           रविशंकर उपाध्याय  

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |  

7 comments:

  1. Bilkul sajeev chitran hai abhi tak jitni bhi khabre aa rahi hai migrant labourers ki

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  2. Kash aapki bhavnayen ishwar samajh pate.

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  3. A poignant account of the miseries of the sons of the soul.Hats off to your ability.

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  4. Prawasi ke...kavita Dil se.real picture of majdoor padyatry by you.good approach.I feel your poem dil se

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