प्रवासी के गम
गहन मंत्रणा जारी है,
हर घर के गलियारे में;कहाँ फँस गया मेरा बेटा?
कैसे होगा?
क्या खायेगा?
रोज रोज की खबरें सुन;
दिल बैठे,
कब आयेगा?
अब तक न बची कमाई होगी;
दर-दर भटक रहा होगा;
रातों में दुःख भारी होगा ;
दुःख में साथ न देता कोई;
अपनों का भी गम होगा ;
बच्चे-बहू साथ में होंगे;
पैदल ही चलना होगा;
छोटे बच्चे का चलते-चलते;
भूख और थकान के कारण,
रोना व जिद जारी होगा |
चलते रहने से,पैरों के छालों में,
टीस उठ रहा भारी होगा;
फूट गये पैरों के छालों से,
कष्ट भयंकर जारी होगा;
राह दूर है अभी बहुत;
फिर भी चलते रहना होगा -२ |
खबरें रोज-रोज की सुन,
दिल बैठे मन भारी हो गये,
ट्रेनों से कट गये;
सड़क पर कुचले;
भूखों मर गये;
प्यास से मर गये;
पुलिस से पिट गये ;
कितनी माँओं के लाल मर गये;
दिल धक् करता सोच-सोच के;
अपने बेटों-बेटी संग,
मेरा बेटा कैसे होगा?
किसी तरह जा पहुँचें,
अपनी माँ के आँचल में;
पिछले सारे गम धो कर;
अपनों के संग हो लेगा;
मिल-जुल कर रह लेगा;
सुख-दुःख में हाथ बटाकर;
आधी-आधी रोटी खा कर;
गाँव में ही रह लेगा वह |
मृगतृष्णा से कोरे सपनों के,
पीछे कभी न भागेगा |
यही सोचकर डग भरता,
लम्बे-लम्बे कदम चल रहा;
लेकिन थोड़ी ही देरी में;
थक जाता है;
थक जाता वह -२|
दूर गाँव में बैठी माँ,
आँचल फैलाये बैठी माँ,
ऊपर देखे बड़े आस से;
कुछ तो कर हे ऊपर वाले;
जिससे आये मेरा लाल;
पलक-पाँवड़े बिछाये मग में;
आस लगाये बैठी माँ,
जल्दी आ जाते तुम बेटे,
मिट जाता सारा ही मलाल -२|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

Bilkul sajeev chitran hai abhi tak jitni bhi khabre aa rahi hai migrant labourers ki
ReplyDeleteThanks Pramod .
DeleteKash aapki bhavnayen ishwar samajh pate.
ReplyDeleteThank you for understanding the feeling.
DeleteA poignant account of the miseries of the sons of the soul.Hats off to your ability.
ReplyDeleteThank you Sadhana.
DeletePrawasi ke...kavita Dil se.real picture of majdoor padyatry by you.good approach.I feel your poem dil se
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