गाँव
सदियों से गाँवों में अपने
हर तरफ खुशहाली थी;
पशुधन थे उत्तम कुल के
हर तरफ हरियाली थी|
मिलजुल कर रहते थे सब;
शादी ,तीज तथा पर्वों में
हाथ बटाते ,साथ मनाते ,
सबकी भागीदारी थी |
उदारवाद की चकाचौंध ने
गाँवों को उजाड़ कर दिया;
गाँवों की खुद पर निर्भरता;
बढ़ई,दर्जी,मोची,नाई ,
केवट,खटिक,धोबी,हलवाई;
सबकी अपनी रोजी छिन गई ;
थाली से उनके रोटी छिन गई;
छोटे खेतिहर मजदूर बन गये;
मजदूरों की क्या कहनें ?
मजदूरी गाँवों में न मिल रही ;
पेट पालने परिवारों का;
भूख गरीबी से बचने का ;
एकमेव रास्ता था पलायन;
जिससे वे शहरों में जाने को,
एकदम ही मजबूर हो गये;
अपना प्यारा गाँव छोड़कर;
माँ बाप की छाँव छोड़कर;
शहरों की आपा-धापी में
रहने को मजबूर हो गये |
वैश्विक महामारी ऐसी आयी;
हर तरफ बेचैनी छायी;
तड़प-तड़प कर लोग मर रहे;
कोई किसी की मदद न कर रहे;
सब अपने ही गम से भारी;
आन पड़ी है बिपदा भारी;
अब क्या खायें ?
अब क्या पहने ?
कैसे अपना जीवन काटें ?
अब तो सारे व्यापार बंद हैं ,
रोज कमा कर खाने वाले
कैसे जीयें ?
फिर से गाँव याद हो आया;
छोड़ शहर की ठगनी माया;
अपने गाँव चले हैं सब;
अपने ठाँव चले हैं सब |
लेकिन अब न बचा वह गाँव;
धूल-धूसरित अपना गाँव;
अब न बचा सौहार्द्र गाँव में;
अपनेपन का न भाव गाँव में;
सब अपने ही गम से बोझिल;
कोई किसी का नहीं गाँव में|
सभी गाँव में चले आ रहे;
बस व ट्रेन में चढ़े आ रहे;
इतनी बड़ी भीड़ कन्धों पर,
कैसे गाँव सम्हालेगा!
सोच-सोच कर थक जाता जब;
पड़ जाता है बिस्तर पर तब ;
नयी किरण उम्मीदों की
आँखों में आ जाती है|
मिलजुल कर अपने को
फिर से स्वायत्त बनायेंगे;
सरकारों से सहयोग प्राप्त कर ,
गृह उद्योग चलायेंगे;
स्वदेशी अपनायेंगे;
गाँव में ही रोजगार सृजन कर,
खुशहाली फिर लायेंगे -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
हर तरफ खुशहाली थी;
पशुधन थे उत्तम कुल के
हर तरफ हरियाली थी|
मिलजुल कर रहते थे सब;
शादी ,तीज तथा पर्वों में
हाथ बटाते ,साथ मनाते ,
सबकी भागीदारी थी |
उदारवाद की चकाचौंध ने
गाँवों को उजाड़ कर दिया;
गाँवों की खुद पर निर्भरता;
बढ़ई,दर्जी,मोची,नाई ,
केवट,खटिक,धोबी,हलवाई;
सबकी अपनी रोजी छिन गई ;
थाली से उनके रोटी छिन गई;
छोटे खेतिहर मजदूर बन गये;
मजदूरों की क्या कहनें ?
मजदूरी गाँवों में न मिल रही ;
पेट पालने परिवारों का;
भूख गरीबी से बचने का ;
एकमेव रास्ता था पलायन;
जिससे वे शहरों में जाने को,
एकदम ही मजबूर हो गये;
अपना प्यारा गाँव छोड़कर;
माँ बाप की छाँव छोड़कर;
शहरों की आपा-धापी में
रहने को मजबूर हो गये |
वैश्विक महामारी ऐसी आयी;
हर तरफ बेचैनी छायी;
तड़प-तड़प कर लोग मर रहे;
कोई किसी की मदद न कर रहे;
सब अपने ही गम से भारी;
आन पड़ी है बिपदा भारी;
अब क्या खायें ?
अब क्या पहने ?
कैसे अपना जीवन काटें ?
अब तो सारे व्यापार बंद हैं ,
रोज कमा कर खाने वाले
कैसे जीयें ?
फिर से गाँव याद हो आया;
छोड़ शहर की ठगनी माया;
अपने गाँव चले हैं सब;
अपने ठाँव चले हैं सब |
लेकिन अब न बचा वह गाँव;
धूल-धूसरित अपना गाँव;
अब न बचा सौहार्द्र गाँव में;
अपनेपन का न भाव गाँव में;
सब अपने ही गम से बोझिल;
कोई किसी का नहीं गाँव में|
सभी गाँव में चले आ रहे;
बस व ट्रेन में चढ़े आ रहे;
इतनी बड़ी भीड़ कन्धों पर,
कैसे गाँव सम्हालेगा!
सोच-सोच कर थक जाता जब;
पड़ जाता है बिस्तर पर तब ;
नयी किरण उम्मीदों की
आँखों में आ जाती है|
मिलजुल कर अपने को
फिर से स्वायत्त बनायेंगे;
सरकारों से सहयोग प्राप्त कर ,
गृह उद्योग चलायेंगे;
स्वदेशी अपनायेंगे;
गाँव में ही रोजगार सृजन कर,
खुशहाली फिर लायेंगे -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

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