Sunday, May 24, 2020

कोरोना काल में गाँवों की दुर्दशा


                            गाँव
     



सदियों से गाँवों में अपने 
हर तरफ खुशहाली थी; 
पशुधन थे उत्तम कुल के 
हर तरफ हरियाली थी| 

मिलजुल कर रहते थे सब; 
शादी ,तीज तथा पर्वों में
हाथ बटाते ,साथ मनाते ,
सबकी भागीदारी थी | 

उदारवाद की चकाचौंध ने 
गाँवों को उजाड़ कर दिया; 
गाँवों की खुद पर निर्भरता; 
बढ़ई,दर्जी,मोची,नाई ,
केवट,खटिक,धोबी,हलवाई; 
सबकी अपनी रोजी छिन गई ;
थाली से उनके रोटी छिन गई;
छोटे खेतिहर मजदूर बन गये; 
मजदूरों की क्या कहनें ?
मजदूरी गाँवों में न मिल रही ;
पेट पालने परिवारों का; 
भूख गरीबी से बचने का ;
एकमेव रास्ता था पलायन; 
जिससे वे शहरों में जाने को, 
एकदम ही मजबूर हो गये; 
अपना प्यारा गाँव छोड़कर; 
माँ बाप की छाँव छोड़कर; 
शहरों की आपा-धापी में 
रहने को मजबूर हो गये | 

वैश्विक महामारी ऐसी आयी; 
हर तरफ बेचैनी छायी;
तड़प-तड़प कर लोग मर रहे; 
कोई किसी की मदद न कर रहे; 
सब अपने ही गम से भारी; 
आन पड़ी है बिपदा भारी; 
अब क्या खायें ?
अब क्या पहने ?
कैसे अपना जीवन काटें ?
अब तो सारे व्यापार बंद हैं ,
रोज कमा कर खाने वाले 
कैसे जीयें ?

फिर से गाँव याद हो आया; 
छोड़ शहर की ठगनी माया; 
अपने गाँव चले हैं सब; 
अपने ठाँव चले हैं सब | 

लेकिन अब न बचा वह गाँव; 
धूल-धूसरित अपना गाँव; 
अब न बचा सौहार्द्र गाँव में; 
अपनेपन का न भाव गाँव में;
सब अपने ही गम से बोझिल; 
कोई किसी का नहीं गाँव में| 

सभी गाँव में चले आ रहे; 
बस व ट्रेन में चढ़े आ रहे; 
इतनी बड़ी भीड़ कन्धों पर, 
कैसे गाँव सम्हालेगा! 

सोच-सोच कर थक जाता जब; 
पड़ जाता है बिस्तर पर तब ;
नयी किरण उम्मीदों की 
आँखों में आ जाती है|  

मिलजुल कर अपने को 
फिर से स्वायत्त बनायेंगे; 
सरकारों से सहयोग प्राप्त कर ,
गृह उद्योग चलायेंगे; 
स्वदेशी अपनायेंगे; 
गाँव में ही रोजगार सृजन कर, 
खुशहाली फिर लायेंगे -2 |  

                  रविशंकर उपाध्याय 
  
मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |   

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