प्रकृति
नित नये कलेवर धर के;
नव फूलों से शोभित केशू,
मह- मह,मह-मह महके |
स्वच्छ नीर भर के आँचल में;
नागिन सी बल खा के;
नदियाँ अपने स्वच्छ कलेवर में,
नूपुर पहने चहके |
चहुँ ओर हरीतिमा फैली जग में,
नयनों के दिन बहुरे;
दिव्य छटा पर्वत माला की,
देख जिया निज बहके |
वृक्षों पर कूके कोयल,
चिड़ियाँ चह-चह चहके;
पवन मनोरम बहता ऐसे;
जैसे मलयानिल बहके |
शेर,बाघ सब सड़क पर घूमें,
कंगारू सड़कों पर कूदें;
नभ में घूमें चिड़ियों का दल,
मन हरषे, तन पुलके |
हम सब घर में बंद पड़े;
मन मसोस कर रहते;
हम यदि खिलवाड़ न करते;
तो प्रकृति के साथ में रहते |
हम उतना ही दोहन करते,
जितना हमको करना;
तो यह दशा न होती अपनी;
हम भी घुलमिल रहते |
नदियाँ यूँ न दूषित होती;
हिमगिरि यूँ न खिसकते;
ग्लोबल वार्मिंग यूँ न डराता;
यूँ न भुखमरी पसरती;
रोज न नये विषाणु पनपते;
रोज न यूँ हम मरते;
पूरी दुनियाँ काँप न जाती,
कोरोना के डर से |
अब तो हमें सोचना होगा;
सबको मिल-ज़ुल कर ही;
जिससे यह विषाणु ख़त्म हो,
लौटे अपनी खुशहाली |
फिर से लौटे जीवन में सुख,
भूल जाएँ सरे ही गम;
बंद घरों से हम भी निकालें,
देखें छटा मनोरम -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

Thanks Pramod.
ReplyDeleteFelicitous expression of optimism about Corona Pandemic.
ReplyDeleteThanks.
ReplyDeleteअत्यन्त सार्थक व सकारात्मक प्रयास।काव्य जगत में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास जारी रखें।हार्दिक शुभकामनाएं।।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
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