Wednesday, May 20, 2020

कोरोना काल में प्रकृति का कायाकल्प

  

                              प्रकृति 




प्रकृति आज नौयौवना बनी,

नित नये कलेवर धर के;
नव फूलों से शोभित केशू,
मह- मह,मह-मह महके |  

स्वच्छ नीर भर के आँचल में;
नागिन सी बल खा के;
नदियाँ अपने स्वच्छ कलेवर में,
नूपुर पहने चहके |

चहुँ ओर हरीतिमा फैली जग में,
नयनों के दिन बहुरे;
दिव्य छटा पर्वत माला की,
देख जिया निज बहके |

वृक्षों पर कूके कोयल,
चिड़ियाँ चह-चह चहके;
पवन मनोरम बहता ऐसे;
जैसे मलयानिल बहके |

शेर,बाघ सब सड़क पर घूमें,
कंगारू सड़कों पर कूदें;
नभ में घूमें चिड़ियों का दल, 
मन हरषे, तन पुलके |

हम सब घर में बंद पड़े;
मन मसोस कर रहते;
हम यदि खिलवाड़ न करते;
तो प्रकृति के साथ में रहते |

हम उतना ही दोहन करते,
जितना हमको करना;
तो यह दशा न होती अपनी;
हम भी घुलमिल रहते |

नदियाँ यूँ न दूषित होती;
हिमगिरि यूँ न खिसकते;
ग्लोबल वार्मिंग यूँ न डराता;
यूँ न भुखमरी पसरती;
रोज न नये विषाणु पनपते;
रोज न यूँ हम मरते;
पूरी दुनियाँ काँप न जाती,
कोरोना के डर से |

अब तो हमें सोचना होगा;
सबको मिल-ज़ुल कर ही;
जिससे यह विषाणु ख़त्म हो,
लौटे अपनी खुशहाली |

फिर से लौटे जीवन में सुख,
भूल जाएँ सरे ही गम;
बंद घरों से हम भी निकालें,
देखें छटा मनोरम -2 |  
                       
                       रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

5 comments:

  1. Felicitous expression of optimism about Corona Pandemic.

    ReplyDelete
  2. अत्यन्त सार्थक व सकारात्मक प्रयास।काव्य जगत में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास जारी रखें।हार्दिक शुभकामनाएं।।

    ReplyDelete
  3. बहुत बहुत धन्यवाद ।

    ReplyDelete