गृह स्वामिनी
अष्टभुजी सी लगी हुई है,
सारे घर के कामों में;
उसके बल की बलिहारी है,
कभी न थकती है दिन में |
सबसे पहले सुबह में जागे,
सबसे अंत में सोती है;
अपनों के खातिर दिन भर;
लगी हुई है कामों में |
झाड़ू,पोछा,साफ,सफाई;
जूठे बर्तन दिन भर धोना;
सब उसके जिम्मे हो आया;
छुड़ा दिया है हमने कब से;
अब न घरों में करने आती,
कोई महरिन या आया |
समय-समय पर सबको चहिये;
नास्ता,लंच हमेशा है;
यह तो अच्छा है अब घर में,
सारे लोग हमेशा हैं|
सब मिल-जुल कर कर लेते हैं;
सारे काम निपट जाते हैं;
मिल-जुल खाना बनता है;
सब मिल-जुल कर खाते हैं |
अच्छा लगता है उसको भी,
सारे लोग समझते हैं;
हाथ बटा लेते हैं सब;
उसको राहत देते हैं |
सभी निकल जाते थे बाहर,
अपने-अपने कामों के साथ;
वही अकेले रह जाती थी,
बचे हुए कामों के साथ |
सास-ससुर की सेवा करते;
उनकी देखभाल करते;
सूरज उग कर ढल जाता था;
उनकी फरमाइश के साथ;
कभी न मिलता आराम उसे,
काम लगे रहते थे साथ |
विपदा की इस कठिन घड़ी में;
कुछ तो अच्छा होता है;
सबको सबकी चिंता रहती,
कितना अच्छा होता है |
पतिदेव को समय मिल रहा,
साथ में समय बिताने का;
सालों बाद समय फुरसत के,
मिल-जुल कर बतियाने का |
सालों से एकाकी रहते;
बीत रहा था चक्र समय का;
अब कुछ अच्छे पल आये हैं,
सुख से साथ बिताने का -2 |
रविशंकर उपाध्याय
उसके बल की बलिहारी है,
कभी न थकती है दिन में |
सबसे पहले सुबह में जागे,
सबसे अंत में सोती है;
अपनों के खातिर दिन भर;
लगी हुई है कामों में |
झाड़ू,पोछा,साफ,सफाई;
जूठे बर्तन दिन भर धोना;
सब उसके जिम्मे हो आया;
छुड़ा दिया है हमने कब से;
अब न घरों में करने आती,
कोई महरिन या आया |
समय-समय पर सबको चहिये;
नास्ता,लंच हमेशा है;
यह तो अच्छा है अब घर में,
सारे लोग हमेशा हैं|
सब मिल-जुल कर कर लेते हैं;
सारे काम निपट जाते हैं;
मिल-जुल खाना बनता है;
सब मिल-जुल कर खाते हैं |
अच्छा लगता है उसको भी,
सारे लोग समझते हैं;
हाथ बटा लेते हैं सब;
उसको राहत देते हैं |
सभी निकल जाते थे बाहर,
अपने-अपने कामों के साथ;
वही अकेले रह जाती थी,
बचे हुए कामों के साथ |
सास-ससुर की सेवा करते;
उनकी देखभाल करते;
सूरज उग कर ढल जाता था;
उनकी फरमाइश के साथ;
कभी न मिलता आराम उसे,
काम लगे रहते थे साथ |
विपदा की इस कठिन घड़ी में;
कुछ तो अच्छा होता है;
सबको सबकी चिंता रहती,
कितना अच्छा होता है |
पतिदेव को समय मिल रहा,
साथ में समय बिताने का;
सालों बाद समय फुरसत के,
मिल-जुल कर बतियाने का |
सालों से एकाकी रहते;
बीत रहा था चक्र समय का;
अब कुछ अच्छे पल आये हैं,
सुख से साथ बिताने का -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
Thanks madam.
ReplyDeleteBahut badhiya. Wonderful Dedication to Mrs. Upadhyay 🙏
ReplyDeleteThanks.
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