Friday, May 29, 2020

कोरोना काल के लिए एक गृहिणी की राय

                 गृह स्वामिनी 



अष्टभुजी सी लगी हुई है,
सारे घर के कामों में;
उसके बल की बलिहारी है, 
कभी न थकती है दिन में | 

सबसे पहले सुबह में जागे,
सबसे अंत में सोती है;
अपनों के खातिर दिन भर;
लगी हुई है कामों में | 

झाड़ू,पोछा,साफ,सफाई;
जूठे बर्तन दिन भर धोना;
सब उसके जिम्मे हो आया;
छुड़ा दिया है हमने कब से;
अब न घरों में करने आती,
कोई महरिन या आया | 

समय-समय पर सबको चहिये;
नास्ता,लंच हमेशा है;
यह तो अच्छा है अब घर में,
सारे लोग हमेशा हैं| 

सब मिल-जुल कर कर लेते हैं;
सारे काम निपट जाते हैं;
मिल-जुल खाना बनता है;
सब मिल-जुल कर खाते हैं | 

अच्छा लगता है उसको भी,
सारे लोग समझते हैं;
हाथ बटा लेते हैं सब;
उसको राहत देते हैं | 

सभी निकल जाते थे बाहर,
अपने-अपने कामों के साथ;
वही अकेले रह जाती थी,
बचे हुए कामों के साथ | 

सास-ससुर की सेवा करते;
उनकी देखभाल करते;
सूरज उग कर ढल जाता था;
उनकी फरमाइश के साथ; 
कभी न मिलता आराम उसे,
काम लगे रहते थे साथ |

विपदा की इस कठिन घड़ी में;
कुछ तो अच्छा होता है;
सबको सबकी चिंता रहती,
कितना अच्छा होता है | 

पतिदेव को समय मिल रहा,
साथ में समय बिताने का;
सालों बाद समय फुरसत के,
मिल-जुल कर बतियाने का | 

सालों से एकाकी रहते;
बीत रहा था चक्र समय का;
अब कुछ अच्छे पल आये हैं,
सुख से साथ बिताने का -2 | 
                                  
                      रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

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