Monday, May 18, 2020

कोरोना योद्धाओं को समर्पित

                           योद्धा          


  

महा त्रासदी झेल रहा जग, 
घुटनों  के बल रेंग  रहा जग , 
धूल धूसरित आगे का मग,
पूरी तरह अनिश्चित मग |

हा हा कार मचा है जग में;  
भूख,गरीबी,बेरोजगारी, 
कैसा तांडव मचा है जग  में;
लोग मर रहे तड़प-तड़प कर; 
कैसा दृश्य भयावह जग में !

कोई राह न सूझ रही है;
पूरी दुनिया जूझ रही है;
कोई तो इलाज हो इसका, 
संकट में जीवन है सबका |

बच्चे, बूढ़े आस लगाये; 
बड़ी-बड़ी आखें  फैलाये;
टी.वी. में  ही आँख गड़ाये;
खबरों  के कूड़े  में से
अच्छी खबरें खोज रहे हैं;  
नित दिन आखें  फोड़  रहे हैं | 

अनिश्चय के बादल  के, 
खुद ही हट जाने तक; 
अपनों की परवाह  किये बिन;
अपना जीवन मूल्य  लिए नित;
कर्तव्यों  की डोरी  में  बिध; 
लोगों  के जीवन  के हित; 
अपना जीवन जोखिम  में  बिध; 
गलियों,सड़कों,अस्पताल  में,
असली योद्धा मिल जायें नित | 

इन योद्धा के कारण  ही, 
जीवन में  विश्वास  बचा है; 
इनके त्याग और समर्पण, 
अपनों की  खुशियों  के आगे 
अपना सब कुछ देना अर्पण;
इन्हें अलग कर देता सबसे, 
हमें दिखाता खुद का दर्पण |  

देवदूत बनके आये ये; 
जिससे पाकर अपना जीवन, 
नत मस्तक होकर हम-सब, 
विनम्र भाव से आह्लादित हो 
नित नित शीश झुकायें  हम -२ | 

             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

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