योद्धा
महा त्रासदी झेल रहा जग,
घुटनों के बल रेंग रहा जग ,
धूल धूसरित आगे का मग,
पूरी तरह अनिश्चित मग |
हा हा कार मचा है जग में;
भूख,गरीबी,बेरोजगारी,
कैसा तांडव मचा है जग में;
लोग मर रहे तड़प-तड़प कर;
कैसा दृश्य भयावह जग में !
कोई राह न सूझ रही है;
पूरी दुनिया जूझ रही है;
कोई तो इलाज हो इसका,
संकट में जीवन है सबका |
बच्चे, बूढ़े आस लगाये;
बड़ी-बड़ी आखें फैलाये;
टी.वी. में ही आँख गड़ाये;
खबरों के कूड़े में से
अच्छी खबरें खोज रहे हैं;
नित दिन आखें फोड़ रहे हैं |
अनिश्चय के बादल के,
खुद ही हट जाने तक;
अपनों की परवाह किये बिन;
अपना जीवन मूल्य लिए नित;
कर्तव्यों की डोरी में बिध;
लोगों के जीवन के हित;
अपना जीवन जोखिम में बिध;
गलियों,सड़कों,अस्पताल में,
असली योद्धा मिल जायें नित |
इन योद्धा के कारण ही,
जीवन में विश्वास बचा है;
इनके त्याग और समर्पण,
अपनों की खुशियों के आगे
अपना सब कुछ देना अर्पण;
इन्हें अलग कर देता सबसे,
हमें दिखाता खुद का दर्पण |
देवदूत बनके आये ये;
जिससे पाकर अपना जीवन,
नत मस्तक होकर हम-सब,
विनम्र भाव से आह्लादित हो
नित नित शीश झुकायें हम -२ |
रविशंकर उपाध्याय
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

Very heart touching poem
ReplyDeleteThank you mam.
ReplyDeleteGood going kavimahoday.
ReplyDeleteThanks Sadhana.
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