उत्परिवर्तन
समय चक्र ने करवट ली है,
उलट-पुलट मचा है भारी;
सब कुछ देखो बदल रहा है,
उत्परिवर्तन है जारी |
सालों से संचित निधियाँ,
दुनियाँ भर की संस्कृतियाँ;
विकासवाद भी झूठा हो गया,
उत्परिवर्तन है जारी |
स्मृतियों में अंकित नियम,
धर्म की सब परिभाषा;
देखते-देखते बदल रहे हैं;
उत्परिवर्तन है जारी |
मंदिर-मस्जिद बंद पड़े हैं;
अब खुद में मंदिर-मस्जिद;
अपने अंदर झाँको घर में;
उत्परिवर्तन है जारी |
शादी के सब ताम-झाम,
अब सपनों में ही होगा;
दिल से दिल मिल जाना शादी ;
उत्परिवर्तन है जारी |
त्योहारों में मिलना-जुलना,
बीती बात पुरानी है;
बना-बना खुद व्यंजन खाना,
उत्परिवर्तन है जारी |
अगर कभी सड़कों पर मिल गये;
आपस में अब गले न मिलना;
हाथ जोड़ कर रस्म निभाना,
उत्परिवर्तन है जारी |
बच्चों की शिक्षा भी दूर से;
पास बैठकर शिक्षा पाना;
दिवा-स्वप्न बन गया आज कल;
उत्परिवर्तन है जारी |
रोज-रोज आफिस को जाना;
यह दस्तूर पुराना है,
घर ही से अब काम है करना;
उत्परिवर्तन है जारी |
बात-बात पर मार्केट जाना;
अब पड़ जायेगा भारी;
कभी-कभी बाजार में जाना;
उत्परिवर्तन है जारी |
नदियों में जाकर के नहाना;
तीज और त्योहारों पर;
ना-ना ऐसा अब मत करना;
उत्परिवर्तन है जारी |
बच्चों को अब मत ले जाना;
पार्क और मैदानों में;
उनको घर में खेल खिलाना;
उत्परिवर्तन है जारी |
अंत काल में साथ निभाने,
मुक्तिधाम तक मत जाना;
दूर ही से शीश झुकाना;
उत्परिवर्तन है जारी-2 |
रविशंकर उपाध्याय
उलट-पुलट मचा है भारी;
सब कुछ देखो बदल रहा है,
उत्परिवर्तन है जारी |
सालों से संचित निधियाँ,
दुनियाँ भर की संस्कृतियाँ;
विकासवाद भी झूठा हो गया,
उत्परिवर्तन है जारी |
स्मृतियों में अंकित नियम,
धर्म की सब परिभाषा;
देखते-देखते बदल रहे हैं;
उत्परिवर्तन है जारी |
मंदिर-मस्जिद बंद पड़े हैं;
अब खुद में मंदिर-मस्जिद;
अपने अंदर झाँको घर में;
उत्परिवर्तन है जारी |
शादी के सब ताम-झाम,
अब सपनों में ही होगा;
दिल से दिल मिल जाना शादी ;
उत्परिवर्तन है जारी |
त्योहारों में मिलना-जुलना,
बीती बात पुरानी है;
बना-बना खुद व्यंजन खाना,
उत्परिवर्तन है जारी |
अगर कभी सड़कों पर मिल गये;
आपस में अब गले न मिलना;
हाथ जोड़ कर रस्म निभाना,
उत्परिवर्तन है जारी |
बच्चों की शिक्षा भी दूर से;
पास बैठकर शिक्षा पाना;
दिवा-स्वप्न बन गया आज कल;
उत्परिवर्तन है जारी |
रोज-रोज आफिस को जाना;
यह दस्तूर पुराना है,
घर ही से अब काम है करना;
उत्परिवर्तन है जारी |
बात-बात पर मार्केट जाना;
अब पड़ जायेगा भारी;
कभी-कभी बाजार में जाना;
उत्परिवर्तन है जारी |
नदियों में जाकर के नहाना;
तीज और त्योहारों पर;
ना-ना ऐसा अब मत करना;
उत्परिवर्तन है जारी |
बच्चों को अब मत ले जाना;
पार्क और मैदानों में;
उनको घर में खेल खिलाना;
उत्परिवर्तन है जारी |
अंत काल में साथ निभाने,
मुक्तिधाम तक मत जाना;
दूर ही से शीश झुकाना;
उत्परिवर्तन है जारी-2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |

अति उत्तम रचना कवि महोदय ।कोरोना काल से होने वाले परिवर्तनों के प्रति आशावादी दृष्टिकोण ।
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteBahut sundar. Vyaktitwa & yogyata ke anuroop nirmit rachna.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सर ।आपके इस उत्साहवर्धन के लिए ।
ReplyDeleteBahut hi sunder sir. Kam shabdon me utparivartan ka samagra chitran. Bahut khoob.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
DeleteGreat jija ji really
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सतीश ।
DeleteGreat jija ji really
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