Saturday, May 30, 2020

कोरोना काल की ज्योति


                       ज्योति 




ज्योति की अलख लिए;
दिल में दृढ़ प्रतिज्ञ हो;
आत्म विश्वास से भरी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

लक्ष्य बहुत दूर था,
अगम्य व दुरूह था;
मगर तुम डिगी नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

संसाधन का अभाव था;
धन भी न ज्यादा साथ था;
फिर भी साईकिल पर चढ़ी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी | 

पिता चोट-ग्रस्त थे;
चलने में असमर्थ थे;
उनको साईकिल पर लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

सुबह चाहे शाम हो,
या अँधेरी रात हो;
फिर भी लक्ष्य भेदती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

पिता के प्रति धर्म ले के;
पहाड़ सा संकल्प ले के;
सिंहनी सी सड़क पर;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

भूल पैरों की थकान;
भूख,प्यास जब्त करके;
रात-दिन चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

सात दिन की यात्रा;
रात-दिन की यात्रा;
अनवरत चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |


तुमने फिर से सिद्ध कर दी,
नारी शक्ति की श्रेष्ठता;
शक्ति की मशाल लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |


नारी ही नारायणी है;
सर्व शक्ति शालिनी है;
आज सिद्ध करते हुये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

असंभव जैसा शब्द कोई;
इस जहाँ में है नहीं;
यही बात सिद्ध करती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

पुरुषों की श्रेष्ठता;
तार-तार हो गयी;
नारियाँ भी कम नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

गंतव्य तक पहुँच पिता को,
बेटिओं पर गर्व होगा;
अब न कोई बेटा-बेटी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |

अब न कोई कर्म ऐसा,
जो बेटियाँ न कर सकें;
सिद्ध अपने कर्म से;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |


दिल में भर उत्साह आदि;
बेटियाँ अब चल सकेंगी;
यही मन में चाह लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |


संवेदना व् त्याग की,
प्रतिमूर्ति होती बेटियाँ;
यही पताका साथ ले;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |


हर जगह सम्मान सारे,
अब हमें समान मिले;
ज्योति की अलख लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी-2 | 

                             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Friday, May 29, 2020

कोरोना काल के लिए एक गृहिणी की राय

                 गृह स्वामिनी 



अष्टभुजी सी लगी हुई है,
सारे घर के कामों में;
उसके बल की बलिहारी है, 
कभी न थकती है दिन में | 

सबसे पहले सुबह में जागे,
सबसे अंत में सोती है;
अपनों के खातिर दिन भर;
लगी हुई है कामों में | 

झाड़ू,पोछा,साफ,सफाई;
जूठे बर्तन दिन भर धोना;
सब उसके जिम्मे हो आया;
छुड़ा दिया है हमने कब से;
अब न घरों में करने आती,
कोई महरिन या आया | 

समय-समय पर सबको चहिये;
नास्ता,लंच हमेशा है;
यह तो अच्छा है अब घर में,
सारे लोग हमेशा हैं| 

सब मिल-जुल कर कर लेते हैं;
सारे काम निपट जाते हैं;
मिल-जुल खाना बनता है;
सब मिल-जुल कर खाते हैं | 

अच्छा लगता है उसको भी,
सारे लोग समझते हैं;
हाथ बटा लेते हैं सब;
उसको राहत देते हैं | 

सभी निकल जाते थे बाहर,
अपने-अपने कामों के साथ;
वही अकेले रह जाती थी,
बचे हुए कामों के साथ | 

सास-ससुर की सेवा करते;
उनकी देखभाल करते;
सूरज उग कर ढल जाता था;
उनकी फरमाइश के साथ; 
कभी न मिलता आराम उसे,
काम लगे रहते थे साथ |

विपदा की इस कठिन घड़ी में;
कुछ तो अच्छा होता है;
सबको सबकी चिंता रहती,
कितना अच्छा होता है | 

पतिदेव को समय मिल रहा,
साथ में समय बिताने का;
सालों बाद समय फुरसत के,
मिल-जुल कर बतियाने का | 

सालों से एकाकी रहते;
बीत रहा था चक्र समय का;
अब कुछ अच्छे पल आये हैं,
सुख से साथ बिताने का -2 | 
                                  
                      रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Tuesday, May 26, 2020

कोरोना काल के उत्परिवर्तन

               उत्परिवर्तन







समय चक्र ने करवट ली है, 
उलट-पुलट मचा है भारी;
सब कुछ देखो बदल रहा है,
उत्परिवर्तन है जारी | 

सालों से संचित निधियाँ, 
दुनियाँ भर की संस्कृतियाँ; 
विकासवाद भी झूठा हो गया,
उत्परिवर्तन है जारी | 

स्मृतियों में अंकित नियम,
धर्म की सब परिभाषा; 
देखते-देखते बदल रहे हैं;
उत्परिवर्तन है जारी | 

मंदिर-मस्जिद बंद पड़े हैं;
अब खुद में मंदिर-मस्जिद;
अपने अंदर झाँको घर में;
उत्परिवर्तन है जारी |

शादी के सब ताम-झाम,
अब सपनों में ही होगा;
दिल से दिल मिल जाना शादी ;
उत्परिवर्तन है जारी | 

त्योहारों में मिलना-जुलना,
बीती बात पुरानी है;
बना-बना खुद व्यंजन खाना,
उत्परिवर्तन है जारी | 

अगर कभी सड़कों पर मिल गये;
आपस में अब गले न मिलना;
हाथ जोड़ कर रस्म निभाना,
उत्परिवर्तन है जारी | 

बच्चों की शिक्षा भी दूर से;
पास बैठकर शिक्षा पाना;
दिवा-स्वप्न बन गया आज कल;
उत्परिवर्तन है जारी | 

रोज-रोज आफिस को जाना;
यह दस्तूर पुराना है,
घर ही से अब काम है करना;
उत्परिवर्तन है जारी | 

बात-बात पर मार्केट जाना;
अब पड़ जायेगा भारी;
कभी-कभी बाजार में जाना;
उत्परिवर्तन है जारी | 

नदियों में जाकर के नहाना;
तीज और त्योहारों पर;
ना-ना ऐसा अब मत करना;
उत्परिवर्तन है जारी | 
                                                                                  
बच्चों को अब मत ले जाना;
पार्क और मैदानों में; 
उनको घर में खेल खिलाना;
उत्परिवर्तन है जारी | 

अंत काल में साथ निभाने,
मुक्तिधाम तक मत जाना;
दूर ही से शीश झुकाना;
उत्परिवर्तन है जारी-2 | 

             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 






Sunday, May 24, 2020

कोरोना काल में गाँवों की दुर्दशा


                            गाँव
     



सदियों से गाँवों में अपने 
हर तरफ खुशहाली थी; 
पशुधन थे उत्तम कुल के 
हर तरफ हरियाली थी| 

मिलजुल कर रहते थे सब; 
शादी ,तीज तथा पर्वों में
हाथ बटाते ,साथ मनाते ,
सबकी भागीदारी थी | 

उदारवाद की चकाचौंध ने 
गाँवों को उजाड़ कर दिया; 
गाँवों की खुद पर निर्भरता; 
बढ़ई,दर्जी,मोची,नाई ,
केवट,खटिक,धोबी,हलवाई; 
सबकी अपनी रोजी छिन गई ;
थाली से उनके रोटी छिन गई;
छोटे खेतिहर मजदूर बन गये; 
मजदूरों की क्या कहनें ?
मजदूरी गाँवों में न मिल रही ;
पेट पालने परिवारों का; 
भूख गरीबी से बचने का ;
एकमेव रास्ता था पलायन; 
जिससे वे शहरों में जाने को, 
एकदम ही मजबूर हो गये; 
अपना प्यारा गाँव छोड़कर; 
माँ बाप की छाँव छोड़कर; 
शहरों की आपा-धापी में 
रहने को मजबूर हो गये | 

वैश्विक महामारी ऐसी आयी; 
हर तरफ बेचैनी छायी;
तड़प-तड़प कर लोग मर रहे; 
कोई किसी की मदद न कर रहे; 
सब अपने ही गम से भारी; 
आन पड़ी है बिपदा भारी; 
अब क्या खायें ?
अब क्या पहने ?
कैसे अपना जीवन काटें ?
अब तो सारे व्यापार बंद हैं ,
रोज कमा कर खाने वाले 
कैसे जीयें ?

फिर से गाँव याद हो आया; 
छोड़ शहर की ठगनी माया; 
अपने गाँव चले हैं सब; 
अपने ठाँव चले हैं सब | 

लेकिन अब न बचा वह गाँव; 
धूल-धूसरित अपना गाँव; 
अब न बचा सौहार्द्र गाँव में; 
अपनेपन का न भाव गाँव में;
सब अपने ही गम से बोझिल; 
कोई किसी का नहीं गाँव में| 

सभी गाँव में चले आ रहे; 
बस व ट्रेन में चढ़े आ रहे; 
इतनी बड़ी भीड़ कन्धों पर, 
कैसे गाँव सम्हालेगा! 

सोच-सोच कर थक जाता जब; 
पड़ जाता है बिस्तर पर तब ;
नयी किरण उम्मीदों की 
आँखों में आ जाती है|  

मिलजुल कर अपने को 
फिर से स्वायत्त बनायेंगे; 
सरकारों से सहयोग प्राप्त कर ,
गृह उद्योग चलायेंगे; 
स्वदेशी अपनायेंगे; 
गाँव में ही रोजगार सृजन कर, 
खुशहाली फिर लायेंगे -2 |  

                  रविशंकर उपाध्याय 
  
मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |   

Friday, May 22, 2020

कोरोना काल पर छोटी बच्ची का दृष्टिकोण



           रानी बिटिया 


पूरे घर में कूद रही है,

खुश होकर रानी बिटिया;
सब घुल-मिल कर साथ रह रहे,
कितने अच्छे दिन आये| 

पापा-मम्मी,दादा-दादी,
भइया,दीदी सब मिल कर,
खेल रहे हैं,कैरम,लूडो; 
कितने अच्छे दिन आये |

बता रहे हैं पापा अपने 
बचपन की सब शैतानी;
डाँट पड़ी है पापा को भी  
करते थे जब शैतानी;
मम्मी भी बचपन में अपने 
करती थी खूब शैतानी;

पूरे घर में कूदा करती, 
मम्मी भी बचपन में अपने ;
कान खींच कर चपत पड़ी है 
नानी को जब दिक् करती |

सब बैठे हैं आँगन में मिल, 
साथ में समय बिताते हैं;
कोई उनके साथ बैठ कर, 
बात नहीं करता जब-तब; 
दादा की अब गयी शिकायत; 
हर दम खुश ही रहते हैं |

सबकी अपनी स्मृतियाँ हैं, 
सबकी अपनी ही दुनिया; 
सब अपनी यादों में खो कर, 
अपनी बातें बता रहे हैं; 
बात-बात पर हँसते हैं सब; 
कितने अच्छे दिन आये |

दादी ने सब पोल खोल दी;
कैसे थे मेरे पापा! 
बचपन में करते थे शरारत ,
कैसी-कैसी मेरे पापा !
पापा मुँह पर उँगली रख,
चुप कराते दादी को;
लेकिन दादी कहे जा रही,
सारी करनी पापा की |

रोज डांटते पापा मुझको 
यह न कर;
वह न कर रानी बिटिया; 
अब जब भी डांटेंगे मुझको; 
मैं पूँछूगी पापा से ;
दादी ने सब राज दे दिये; 
पापा के करतूतों की;
खूब मजा आता है निश -दिन; 
कितने अच्छे दिन आये|

दिन भर गरमा-गर्मी रहती; 
रातें बीते खूब मजे से;
सबके मन के व्यंजन बनते;
साथ में खाते खूब मजे से;
सब-कुछ कितना अच्छा लगता;
कितने अच्छे दिन आये -2 |  
                                   
                        रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Wednesday, May 20, 2020

कोरोना काल के सामाजिक सरोकार

                         राम जाने 



रिश्तों के मायने; 
सामाजिक ताने-बानें;        
जब-तब मिलने;
दिल खोल कर बतियानें;
पुराने दिनों की यादों के 
पंख पर बैठ; 
स्मृतियों की कोठारी में से,
बहुत कुछ ढूँढ लाने;
फिर;
एक-एक याद पर  
घंटों बैठ जुगाली 
करने और कराने;
यारों की महफिल में,
यादों की बारात सजाने;
उनके उलझे ताने -बाने सुलझाने;
वक्त बे वक्त कहीं आने व जाने;
अपनों के काम में हाथ बटाने ;
दूसरों के गम को अपना बनाने ;
अब हमें कहाँ जाने ?
अपने ही घर में बैठ, 
समय है बिताने;
चाह कर भी 
दूसरों के काम,
हमें अब न आनें!
पहले वाले दिन,
अब कब आने ?
राम जाने-राम जाने -2 | 
              
            रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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कोरोना काल में प्रकृति का कायाकल्प

  

                              प्रकृति 




प्रकृति आज नौयौवना बनी,

नित नये कलेवर धर के;
नव फूलों से शोभित केशू,
मह- मह,मह-मह महके |  

स्वच्छ नीर भर के आँचल में;
नागिन सी बल खा के;
नदियाँ अपने स्वच्छ कलेवर में,
नूपुर पहने चहके |

चहुँ ओर हरीतिमा फैली जग में,
नयनों के दिन बहुरे;
दिव्य छटा पर्वत माला की,
देख जिया निज बहके |

वृक्षों पर कूके कोयल,
चिड़ियाँ चह-चह चहके;
पवन मनोरम बहता ऐसे;
जैसे मलयानिल बहके |

शेर,बाघ सब सड़क पर घूमें,
कंगारू सड़कों पर कूदें;
नभ में घूमें चिड़ियों का दल, 
मन हरषे, तन पुलके |

हम सब घर में बंद पड़े;
मन मसोस कर रहते;
हम यदि खिलवाड़ न करते;
तो प्रकृति के साथ में रहते |

हम उतना ही दोहन करते,
जितना हमको करना;
तो यह दशा न होती अपनी;
हम भी घुलमिल रहते |

नदियाँ यूँ न दूषित होती;
हिमगिरि यूँ न खिसकते;
ग्लोबल वार्मिंग यूँ न डराता;
यूँ न भुखमरी पसरती;
रोज न नये विषाणु पनपते;
रोज न यूँ हम मरते;
पूरी दुनियाँ काँप न जाती,
कोरोना के डर से |

अब तो हमें सोचना होगा;
सबको मिल-ज़ुल कर ही;
जिससे यह विषाणु ख़त्म हो,
लौटे अपनी खुशहाली |

फिर से लौटे जीवन में सुख,
भूल जाएँ सरे ही गम;
बंद घरों से हम भी निकालें,
देखें छटा मनोरम -2 |  
                       
                       रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Tuesday, May 19, 2020

प्रवासी मजदूरों की व्यथा

                          प्रवासी के गम           

                           

गहन मंत्रणा जारी  है,
हर घर के गलियारे में;
कहाँ फँस गया मेरा बेटा?
कैसे होगा? 
क्या खायेगा?
रोज रोज की खबरें सुन;
दिल बैठे,
कब आयेगा?


अब तक न बची कमाई होगी; 
दर-दर भटक रहा होगा;
रातों में दुःख भारी होगा ;
दुःख में साथ न देता कोई;
अपनों का भी गम होगा ;
बच्चे-बहू साथ में होंगे;
पैदल ही चलना  होगा;
छोटे बच्चे का चलते-चलते;
भूख और थकान के कारण, 
रोना व जिद जारी होगा |  
चलते रहने से,पैरों के छालों में,
टीस उठ रहा भारी होगा;
फूट गये पैरों के छालों से,
कष्ट भयंकर जारी होगा;
राह दूर है अभी बहुत;
फिर भी चलते रहना होगा -२ |  


खबरें रोज-रोज की सुन,
दिल बैठे मन भारी हो गये,
ट्रेनों से कट गये; 
सड़क पर कुचले;
भूखों मर गये;
प्यास से मर गये;
पुलिस से पिट गये ;
कितनी माँओं के लाल मर गये;
दिल धक् करता सोच-सोच के;
अपने बेटों-बेटी संग,
मेरा बेटा कैसे होगा?


किसी तरह जा पहुँचें,
अपनी माँ के आँचल में; 
पिछले सारे गम धो कर;
अपनों के संग हो लेगा;
मिल-जुल कर रह लेगा;
सुख-दुःख में हाथ बटाकर;
आधी-आधी  रोटी खा कर;
गाँव में ही रह लेगा वह | 
मृगतृष्णा से कोरे सपनों के,
पीछे कभी न भागेगा | 
यही सोचकर डग भरता,
लम्बे-लम्बे कदम चल रहा;
लेकिन थोड़ी ही देरी में;
थक जाता है;
थक जाता वह -२| 


दूर गाँव में बैठी माँ, 
आँचल फैलाये बैठी माँ, 
ऊपर देखे बड़े आस से;
कुछ तो कर हे ऊपर वाले;
जिससे आये मेरा लाल;
पलक-पाँवड़े बिछाये मग में;
आस लगाये बैठी माँ,
जल्दी आ जाते तुम बेटे,
मिट जाता सारा ही मलाल -२|

           रविशंकर उपाध्याय  

मौलिक कृति एवं 
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Monday, May 18, 2020

कोरोना योद्धाओं को समर्पित

                           योद्धा          


  

महा त्रासदी झेल रहा जग, 
घुटनों  के बल रेंग  रहा जग , 
धूल धूसरित आगे का मग,
पूरी तरह अनिश्चित मग |

हा हा कार मचा है जग में;  
भूख,गरीबी,बेरोजगारी, 
कैसा तांडव मचा है जग  में;
लोग मर रहे तड़प-तड़प कर; 
कैसा दृश्य भयावह जग में !

कोई राह न सूझ रही है;
पूरी दुनिया जूझ रही है;
कोई तो इलाज हो इसका, 
संकट में जीवन है सबका |

बच्चे, बूढ़े आस लगाये; 
बड़ी-बड़ी आखें  फैलाये;
टी.वी. में  ही आँख गड़ाये;
खबरों  के कूड़े  में से
अच्छी खबरें खोज रहे हैं;  
नित दिन आखें  फोड़  रहे हैं | 

अनिश्चय के बादल  के, 
खुद ही हट जाने तक; 
अपनों की परवाह  किये बिन;
अपना जीवन मूल्य  लिए नित;
कर्तव्यों  की डोरी  में  बिध; 
लोगों  के जीवन  के हित; 
अपना जीवन जोखिम  में  बिध; 
गलियों,सड़कों,अस्पताल  में,
असली योद्धा मिल जायें नित | 

इन योद्धा के कारण  ही, 
जीवन में  विश्वास  बचा है; 
इनके त्याग और समर्पण, 
अपनों की  खुशियों  के आगे 
अपना सब कुछ देना अर्पण;
इन्हें अलग कर देता सबसे, 
हमें दिखाता खुद का दर्पण |  

देवदूत बनके आये ये; 
जिससे पाकर अपना जीवन, 
नत मस्तक होकर हम-सब, 
विनम्र भाव से आह्लादित हो 
नित नित शीश झुकायें  हम -२ | 

             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Friday, May 15, 2020

कोरोना के परिणाम का एक भावनात्मक विस्तार |



      बन्द 




मन्दिर-मस्जिद जानेवाले; 
आपस में मिल-जुल रहनेवाले;
सुख-दुःख में हाथ बटाने वाले; 
रोज़ कमाकर खानेवाले; 
ठेलिया,खोमचा,सब्जीवाले 
अपने घर में बंद |


बचा-खुचा घर का राशन 
चार दिनों में खर्च;
अब क्या खायें ?
घर के बच्चे,
घर के बूढ़े,
काम-धाम सब ठप्प  |

                

रोज़ सोचते घर से निकले;
थोड़ा बहुत कमाकर लौटे;
जिससे घर का खरचा सरके, 
रोती बिटिया रोटी खाके 
हो जाये हप्प !


         

लेकिन जैसे गली में पहुँचा;
गली में बैठा डण्डाधारी,
डण्डा लेकर उसपे दौड़ा; 
ठेलिया छोड़ गली में ही;
जोर लगाकर घर में भागा;       
फिर से घर में बन्द;
अपने घर में बन्द |  
            


रविशंकर उपाध्याय  

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |