ज्योति
ज्योति की अलख लिए;
दिल में दृढ़ प्रतिज्ञ हो;
आत्म विश्वास से भरी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
लक्ष्य बहुत दूर था,
अगम्य व दुरूह था;
मगर तुम डिगी नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
संसाधन का अभाव था;
धन भी न ज्यादा साथ था;
फिर भी साईकिल पर चढ़ी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पिता चोट-ग्रस्त थे;
चलने में असमर्थ थे;
उनको साईकिल पर लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
सुबह चाहे शाम हो,
या अँधेरी रात हो;
फिर भी लक्ष्य भेदती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पिता के प्रति धर्म ले के;
पहाड़ सा संकल्प ले के;
सिंहनी सी सड़क पर;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
भूल पैरों की थकान;
भूख,प्यास जब्त करके;
रात-दिन चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
सात दिन की यात्रा;
रात-दिन की यात्रा;
अनवरत चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
तुमने फिर से सिद्ध कर दी,
नारी शक्ति की श्रेष्ठता;
शक्ति की मशाल लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
नारी ही नारायणी है;
सर्व शक्ति शालिनी है;
आज सिद्ध करते हुये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
असंभव जैसा शब्द कोई;
इस जहाँ में है नहीं;
यही बात सिद्ध करती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पुरुषों की श्रेष्ठता;
तार-तार हो गयी;
नारियाँ भी कम नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
गंतव्य तक पहुँच पिता को,
बेटिओं पर गर्व होगा;
अब न कोई बेटा-बेटी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
अब न कोई कर्म ऐसा,
जो बेटियाँ न कर सकें;
सिद्ध अपने कर्म से;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
दिल में भर उत्साह आदि;
बेटियाँ अब चल सकेंगी;
यही मन में चाह लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
संवेदना व् त्याग की,
प्रतिमूर्ति होती बेटियाँ;
यही पताका साथ ले;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
हर जगह सम्मान सारे,
अब हमें समान मिले;
ज्योति की अलख लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी-2 |
रविशंकर उपाध्याय
दिल में दृढ़ प्रतिज्ञ हो;
आत्म विश्वास से भरी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
लक्ष्य बहुत दूर था,
अगम्य व दुरूह था;
मगर तुम डिगी नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
संसाधन का अभाव था;
धन भी न ज्यादा साथ था;
फिर भी साईकिल पर चढ़ी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पिता चोट-ग्रस्त थे;
चलने में असमर्थ थे;
उनको साईकिल पर लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
सुबह चाहे शाम हो,
या अँधेरी रात हो;
फिर भी लक्ष्य भेदती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पिता के प्रति धर्म ले के;
पहाड़ सा संकल्प ले के;
सिंहनी सी सड़क पर;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
भूल पैरों की थकान;
भूख,प्यास जब्त करके;
रात-दिन चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
सात दिन की यात्रा;
रात-दिन की यात्रा;
अनवरत चलती रही;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
तुमने फिर से सिद्ध कर दी,
नारी शक्ति की श्रेष्ठता;
शक्ति की मशाल लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
नारी ही नारायणी है;
सर्व शक्ति शालिनी है;
आज सिद्ध करते हुये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
असंभव जैसा शब्द कोई;
इस जहाँ में है नहीं;
यही बात सिद्ध करती;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
पुरुषों की श्रेष्ठता;
तार-तार हो गयी;
नारियाँ भी कम नहीं;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
गंतव्य तक पहुँच पिता को,
बेटिओं पर गर्व होगा;
अब न कोई बेटा-बेटी;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
अब न कोई कर्म ऐसा,
जो बेटियाँ न कर सकें;
सिद्ध अपने कर्म से;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
दिल में भर उत्साह आदि;
बेटियाँ अब चल सकेंगी;
यही मन में चाह लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
संवेदना व् त्याग की,
प्रतिमूर्ति होती बेटियाँ;
यही पताका साथ ले;
ज्योति तुम आगे बढ़ी |
हर जगह सम्मान सारे,
अब हमें समान मिले;
ज्योति की अलख लिये;
ज्योति तुम आगे बढ़ी-2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |








