नई सुबह
आज सुबह जब नींद खुली,
सपनों की असली पोल खुली;
मैं रीता सा आँगन में आया,
पीछे बीत गए बरस की
खट्टे-मीठे यादों की,
कुछ खोने,कुछ पाने की,
कुछ गम की,
कुछ सुखमय यादों की;
सब अपना अधिकार ज़माने,
मेरे पीछे सीना ताने,
चले आ रहे!
मैंने आँगन में
खिड़की से आती
खिली धूप की इठलाती, इतराती,
किरणों को देखा;
प्रातःकाल की बेला में
पीली सरसों के फूलों सी,
बचपन की निश्छल बेबाक़ हँसी सी,
अपने में ही मिलजुल कर
खेल रही थीं,
चहक रही थीं,
उछल-कूद कर,
सारा आँगन घेर रही थीं|
मैंने अपना सिर झटका;
बीते बरस की
यादों की गठरी को
ज्युँ पटका;
मैं भी नई सुबह की किरणों संग,
चिड़ियों संग,
उनके बच्चों संग,
फूलों संग हो लिया,
और;
सूरज की किरणों संग
पिछला सारा गम धो लिया-2|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

👍
ReplyDelete