Monday, January 25, 2021

नई सुबह

                  नई सुबह  







आज सुबह जब नींद खुली, 

सपनों की असली पोल खुली; 

मैं रीता सा आँगन में आया, 

पीछे बीत गए बरस की 

खट्टे-मीठे  यादों की, 

कुछ खोने,कुछ पाने की, 

कुछ गम की, 

कुछ सुखमय यादों की;  

सब अपना अधिकार ज़माने, 

मेरे पीछे सीना ताने, 

चले आ रहे!


मैंने आँगन में 

खिड़की से आती 

खिली धूप की इठलाती, इतराती, 

किरणों को देखा; 

प्रातःकाल की बेला में 

पीली सरसों के फूलों सी, 

बचपन की निश्छल बेबाक़ हँसी सी, 

अपने में ही मिलजुल कर 

खेल रही थीं, 

चहक रही थीं, 

उछल-कूद कर, 

सारा आँगन घेर रही थीं|  


मैंने अपना सिर झटका; 

बीते बरस की 

यादों की गठरी को 

ज्युँ पटका; 

मैं भी नई सुबह की किरणों संग, 

चिड़ियों संग, 

उनके बच्चों संग, 

फूलों संग हो लिया,

और; 

सूरज की किरणों संग 

पिछला सारा गम धो लिया-2| 

                रवि शंकर उपाध्याय 

         मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|   


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