लिंचिंग
सुबक-सुबक कर रो रही;
मानवता लहूलुहान हो;
आज सड़क पर पड़ी!
यह कैसा समय आ गया,
दे कुत्सित यंत्रणा!
मिलकर सभी मारते;
जबतक नहीं वह मरी!
यह कौन सी है सभ्यता?
कहाँ के ग्रन्थ में लिखा?
कि करके सभी हदें पार;
करके मूल्य तार-तार
दानवों से जूझते!
मन में ले कुत्सित विचार!
न कोई पूँछता किसी से,
कि माजरा असल में क्या?
दिखा रहे मर्दांगिनी,
लठ्ठ-डण्डे से सभी|
किंकर्तव्य हो गई है;
बुद्धि सारी खो गई है;
लगे हुए हैं मारने में;
जानवरों से सभी!
विकास की अंधी गली में,
हम कहीं खो गए हैं,
संस्कृति के मंत्र सारे;
अपने पन के यत्न सारे;
वर्ण,जाति,धर्म आदि
पुरखों के सत्कर्म सारे;
पीछे कहीं छोड़ कर,
अंधों जैसे हम चले हैं !
नहीं तो कैसे हो सका!
कि सभी अपने कर्म भूल;
चील,कौओं की तरह;
एक पर भिड़े हुए,
भूल सभी मूल्य अपने,
सिर्फ उसको पीटते,
लगातार जा रहे हैं!
भारत माँ भी रो रही;
खून के आँसू लिए,
अपने को ही कोसती;
देखते न बन रहा!
छत-विछत लाश को;
आँखों को भिगो रही;
विक्षिप्त सी हो रही,
क्या हि अपना देश था!
संस्कृति व सभ्यता;
सत्य,न्याय,मूल्य आदि;
हम सभी की शान थी;
देश की पहचान थी;
संवेदना,सच्चरित्रता व
सांत्वना की बाढ़ थी;
सहनशीलता की इन्तहां,
सभी जन में आम थी;
परहित हि केवल धर्म था;
परोपकार कर्म था;
न आपस में कभी बैर था;
सम्बृद्ध सा समाज था!
दिवास्वप्न हो गये,
आज सारे मूल्य ही;
देख दृश्य ये घृणित,
वितृष्णा सी हो रही;
आज के समाज से;
घुट रही है जान जैसे,
साँस मुश्किल में पड़ी|
क्या कोई न्याय होगा,
इस जघन्य अपराध का?
क्या कभी नदी बहेगी,
गंगा जमुनी न्याय की?
क्या कभी फिर देश अपना
न्याय धर्म आदि का,
विश्व में सिरमौर होगा;
है बड़ा ही कठिन प्रश्न,
हम सभी के समक्ष,
भविष्य के गर्त में
कहीं पड़ा जवाब होगा!
न्याय की अलख लिए
हर तरफ ही भागना है;
जिससे फिर से पा सकें;
फिर वही समाज अपना
जहाँ न विवाद कोई;
वर्ण,जाति,धर्म का
और ख़त्म हो सभी
घृणित कुत्सित कर्म ही-2|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

aap ki Kavita atyant marmahat karne Vali hai .Sundar shabdon ka chayan..
ReplyDeleteparantu ek shabd ganga jamuni nyay ya sabhyata..ye shabd bas hinduon ke upar hi thopa Gaya hai..Baki is shabd ka koi arth nahi dusre dharmo ke lie .. itihas .. aour vartaman kaal iska sakshi hai..
Thanks Avinash.
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