चाँद
मनमोहक,शीतल,शांत तथा
गतिशील तथा अविरामी सदा;
पथगामी तथा निष्कामी रहे,
चलना चलना बस काम सदा|
रात विभावरी बीत रही;
मनभावनी सूरत नित नयी;
धर रूप अनेक प्रभावमयी;
माथे पर टीका काम मयी|
मन प्राण सभी न्योछावर है;
मुख की शोभा मनभावन है;
काम की शोभा लजाय रही;
नित चाँद की शोभा निहारत है!
प्रेयसी मुख देख लजाय रही;
प्रिय से अपने को छुपाय रही;
छुप जाओ कभी तुम अम्बर में;
द्युति देखि तुम्हार लजाय रही!
बढ़ जात कभी,घट जात कभी;
जग सारा चकित भरमात सभी;
तुम रूठ गये सोचत मन में;
मन ही मन में मुस्काय सभी|
नभ की सुन्दरता तुमसे है;
नभ के मस्तक का तिलक तुम्हीं;
तुम हो तो सदा नभ रोशन है;
रात की शोभा तुम्हीं,तुम्हीं|
चित को नित शांत करे शोभा;
जो शोभा तुमसे फैलत है:
एक टक हो के देख रही चकई;
जैसे चकवे को बुलावत है|
मनभावत है यह रूप सदा;
सब ही के दिल बहलावत है;
तारों की शोभा बढ़े तब ही,
जब चाँद सदा उगि आवत है|
रात कभी यदि नींद खुले;
अँगना में उचकि के आवत है;
देख छटा बिखरी अम्बर की;
नयनों से जाम पियावत है|
देखि रहे एकटक अम्बर को;
भूलि गयो अपनी सुधि-बुधि;
मोती के गोटा लगी चुनरी में;
सगरौं नभ में लहरावत है|
मन शीतल होत सदा सबही के;
जब चाँद सदा नभ आवत है;
चाँद बिना नभ की शोभा नहि;
नभ को नभ चाँद बनावत है-2 |
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |

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