Saturday, January 9, 2021

चाँद

               चाँद

मनमोहक,शीतल,शांत तथा 

गतिशील तथा अविरामी सदा; 

पथगामी तथा निष्कामी रहे, 

चलना चलना बस काम सदा|  


रात विभावरी बीत रही; 

मनभावनी सूरत नित नयी;

धर रूप अनेक प्रभावमयी; 

माथे पर टीका काम मयी|  


मन प्राण सभी न्योछावर है; 

मुख की शोभा मनभावन है; 

काम की शोभा लजाय रही; 

नित चाँद की शोभा निहारत है! 


प्रेयसी मुख देख लजाय रही; 

प्रिय से अपने को छुपाय रही; 

छुप जाओ कभी तुम अम्बर में; 

द्युति देखि तुम्हार लजाय रही! 


बढ़ जात कभी,घट जात कभी; 

जग सारा चकित भरमात सभी; 

तुम रूठ गये सोचत मन में; 

मन ही मन में मुस्काय सभी|  


नभ की सुन्दरता तुमसे है; 

नभ के मस्तक का तिलक तुम्हीं;  

तुम हो तो सदा नभ रोशन है; 

रात की शोभा तुम्हीं,तुम्हीं| 


चित को नित शांत करे शोभा; 

जो शोभा तुमसे फैलत है: 

एक टक हो के देख रही चकई; 

जैसे चकवे को बुलावत है| 

 

मनभावत है यह रूप सदा;

सब ही के दिल बहलावत है; 

तारों की शोभा बढ़े तब ही, 

जब चाँद सदा उगि आवत है| 


रात कभी यदि नींद खुले; 

अँगना में उचकि के आवत है; 

देख छटा बिखरी अम्बर की; 

नयनों से जाम पियावत है|  


देखि रहे एकटक अम्बर को; 

भूलि गयो अपनी सुधि-बुधि; 

मोती के गोटा लगी चुनरी में; 

सगरौं नभ में लहरावत है|  


मन शीतल होत सदा सबही के;

जब चाँद सदा नभ आवत है; 

चाँद बिना नभ की शोभा नहि;

नभ को नभ चाँद बनावत है-2 | 


रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |    

 


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