Friday, January 8, 2021

यादें

                     यादें



  





दिनभर ध्यान बँटा रहता है, 

रातें लम्बी हो जाती हैं; 

पहर-पहर पर नींद खुल रही; 

यादें ताजी हो जाती हैं|

 

क्या भूलूँ ?क्या याद करूँ?

यादों के झूले पर झूलूँ;

पेगें मार रही यादें; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


सालों बीत गये वो दिन; 

जब वो पहली बार मिले;

जैसे कल की बात हो वह! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


पहली बार नजर भर देखा; 

नज़रें झुकीं हुई थीं उनकी; 

नज़रों के आगे वो मंज़र! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


झील सी उनकी आंखें थीं;

उनमें डूब गया था मैं; 

जब भी मैं उतराना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


काली-काली भौहें थीं; 

पलकों पर काजल की शोभा; 

जब भी मैं चाहूँ भूलूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


नज़रों की कमान से बिध कर, 

मैं बेसुध हो गया तभी था! 

जब भी मैं चाहूँ सुध हो; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


मुख की शोभा बिल्लोरी आँखें; 

उन आँखों से घायल मैं; 

जब भी चाहूँ घाव भरे! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


आँखों का गुलाम बन कर, 

अपना जीवन काट रहा हूँ; 

जब जंज़ीर तोड़ना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


आँखों ने आँखों की भाषा जानी, 

मैं आँखों में डूब गया; 

जब भी मैं उतराना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


यादों की बारात सजाये, 

मैं फिरता हूँ मारा-मारा; 

जब मैं होश में आना चाहूँ;  

 यादें ताजी हो जाती हैं| 

                 रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 

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