यादें
दिनभर ध्यान बँटा रहता है,
रातें लम्बी हो जाती हैं;
पहर-पहर पर नींद खुल रही;
यादें ताजी हो जाती हैं|
क्या भूलूँ ?क्या याद करूँ?
यादों के झूले पर झूलूँ;
पेगें मार रही यादें;
यादें ताजी हो जाती हैं|
सालों बीत गये वो दिन;
जब वो पहली बार मिले;
जैसे कल की बात हो वह!
यादें ताजी हो जाती हैं|
पहली बार नजर भर देखा;
नज़रें झुकीं हुई थीं उनकी;
नज़रों के आगे वो मंज़र!
यादें ताजी हो जाती हैं|
झील सी उनकी आंखें थीं;
उनमें डूब गया था मैं;
जब भी मैं उतराना चाहूँ;
यादें ताजी हो जाती हैं|
काली-काली भौहें थीं;
पलकों पर काजल की शोभा;
जब भी मैं चाहूँ भूलूँ;
यादें ताजी हो जाती हैं|
नज़रों की कमान से बिध कर,
मैं बेसुध हो गया तभी था!
जब भी मैं चाहूँ सुध हो;
यादें ताजी हो जाती हैं|
मुख की शोभा बिल्लोरी आँखें;
उन आँखों से घायल मैं;
जब भी चाहूँ घाव भरे!
यादें ताजी हो जाती हैं|
आँखों का गुलाम बन कर,
अपना जीवन काट रहा हूँ;
जब जंज़ीर तोड़ना चाहूँ;
यादें ताजी हो जाती हैं|
आँखों ने आँखों की भाषा जानी,
मैं आँखों में डूब गया;
जब भी मैं उतराना चाहूँ;
यादें ताजी हो जाती हैं|
यादों की बारात सजाये,
मैं फिरता हूँ मारा-मारा;
जब मैं होश में आना चाहूँ;
यादें ताजी हो जाती हैं|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

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