Saturday, February 6, 2021

चिड़िया

                            चिड़िया  



अपने को सयानी समझ, 


चिड़िया उड़ चली; 

अपनों से दूर, 

बाप के स्नेह; 

माँ के प्यार; 

बहनों के आपसी नोक-झोंक

को छोड़; 

अपना घर बसाने!


उसे नहीं पता कि, 

जमाना कितना जालिम है!

खुले अध-खुले पंख; 

नैसर्गिक लावण्य; 

और निश्छल मन; 

कभी भी तोड़ सकता है; 

अपने श्वार्थ,कपट 

और कुटिल चालों से 

उसे अपनों से दूरकर, 

सामाजिक बहिष्कार का दंश दे, 

कहीं का भी नहीं छोड़ेगा! 

और,

स्वर्ग जैसे घोसले को उजाड़; 

उसके पंख उखाड़; 

माँ ,बाप,बहनों 

और अपनों की 

नज़रों से गिरा!

उसे उसकी ही

 नज़रों से गिरा देगा! 

और,

नदी के बहते जल सा, 

उसके सपने बहा देगा-2| 

          रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 

 

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