मैं देखूँगा
मैं देखूँगा;
बहती नदियाँ,बहते झरने,
फूलों की सुगंध से वासित,
मधुरिम फुलवारियाँ;
शांत चित्त,गंभीर मना,
वृहद हृदय युत सागर की
अगणित छवियाँ|
मैं देखूँगा;
वृहद वितान से फैले,
आसमान की सब रंगरलियाँ;
लाखों ग्रह और लाखों तारे,
प्रति क्षण,प्रति पल टिम-टिम करते;
उनकी बदल रही मन भावन गतियाँ|
मैं देखूँगा;
हिम शिखरों को,
उन पर झंकृत वृहद ललाट से,
अनुपम नदियों के बहते जल को;
उस पहाड़ की कमनीय छटा को,
जिससे सुख पाती,
नज़रों की पुलकावलियाँ|
मैं देखूँगा;
जंगल अपने,
जो फैले हैं दूर क्षितिज तक;
जंगल के रहवासी बन कर,
चिड़ियों की आपस की भाषा;
उनकी कलरव ध्वनियाँ;
जंगल के राजा की गर्जन;
जिससे गुंजायमान हो जाती
सारे जंगल की गलियाँ|
मैं देखूँगा;
मानव को भी!
और उनके कंक्रीट के जंगल!
उनकी लिप्सा!उनकी लालच!
जिसने तहस-नहस कर डाला,
नदियों,जंगलऔर पहाड़ को;
और उनकी नैसर्गिक छवियाँ-2 |
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवंसर्वाधिकार सुरक्षित|

Very beautiful, hoping for a future as beautiful as depicted in this poem🙏
ReplyDeleteThanks Archana.
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