Saturday, January 2, 2021

मैं देखूँगा


               मैं देखूँगा 






मैं देखूँगा;

बहती नदियाँ,बहते झरने,

फूलों की सुगंध से वासित, 

मधुरिम फुलवारियाँ;

शांत चित्त,गंभीर मना, 

वृहद हृदय युत सागर की 

अगणित छवियाँ|  

मैं देखूँगा; 

वृहद वितान से फैले, 

आसमान की सब रंगरलियाँ; 

लाखों ग्रह और लाखों तारे, 

प्रति क्षण,प्रति पल टिम-टिम करते;

उनकी बदल रही मन भावन गतियाँ|  

मैं देखूँगा; 

हिम शिखरों को, 

उन पर झंकृत वृहद ललाट से, 

अनुपम नदियों के बहते जल को; 

उस पहाड़ की कमनीय छटा को, 

जिससे सुख पाती, 

नज़रों की पुलकावलियाँ|  

मैं देखूँगा; 

जंगल अपने, 

जो फैले हैं दूर क्षितिज तक; 

जंगल के रहवासी बन कर, 

चिड़ियों की आपस की भाषा; 

उनकी कलरव ध्वनियाँ; 

जंगल के राजा की गर्जन; 

जिससे गुंजायमान हो जाती 

सारे जंगल की गलियाँ| 

मैं देखूँगा; 

मानव को भी! 

और उनके कंक्रीट के जंगल!

उनकी लिप्सा!उनकी लालच! 

जिसने तहस-नहस कर डाला, 

नदियों,जंगलऔर पहाड़ को;

और उनकी नैसर्गिक छवियाँ-2 | 

                     रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवंसर्वाधिकार सुरक्षित|    

 

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