जीवन
अतीत के किसी कृत्य पर
पश्चाताप से तड़पता,झुलसता;
मरुभूमि में दूर तक दिखते
बालू के ढूहों पर,
छटपटाने को विवश,
असहाय सा पड़ा,
सांत्वना के एक बूँद को तरसता
जीवन!
या फिर,
भविष्य की मृगमरीचिका में
ताने-बाने बुनता,गुनता,धुनता,
कहीं खोया रहता,
जीवन!
अतीत के चलचित्रों;
भविष्य के दिवास्वप्नों
में कहीं उलझा!
असहाय सा फँसा;
इन ताने-बानों को
सुलझाने के प्रयास में
और बुरी तरह उलझा;
इनसे बच कर,
वर्तमान में आने को
संकल्पबद्ध,कटिबद्ध,प्रयासरत
जीवन-2|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

bohot sundar
ReplyDeleteThanks.
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