Thursday, January 21, 2021

जीवन

                  जीवन  







अतीत के किसी कृत्य पर 

पश्चाताप से तड़पता,झुलसता; 

मरुभूमि में दूर तक दिखते 

बालू के ढूहों पर, 

छटपटाने को विवश, 

असहाय सा पड़ा, 

सांत्वना के एक बूँद को तरसता 

जीवन!

या फिर,

भविष्य की मृगमरीचिका में 

ताने-बाने बुनता,गुनता,धुनता, 

कहीं खोया रहता, 

जीवन!

अतीत के चलचित्रों; 

भविष्य के दिवास्वप्नों 

में कहीं उलझा!

असहाय सा फँसा; 

इन ताने-बानों को 

सुलझाने के प्रयास में 

और बुरी तरह उलझा; 

इनसे बच कर,  

 वर्तमान में आने को 

संकल्पबद्ध,कटिबद्ध,प्रयासरत 

जीवन-2| 

            रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 


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