काले बादल घिर-घिर आये,
सारे आसमान में छाये,
अच्छा बहुत किया तुमने;
ऊब चुके थे गर्मी से हम,
हम सबके चेहरे मुस्काये|
काले-काले झुण्ड बना तुम,
बिन मतलब नभ में मडराये;
बनती-बिगड़ती सुन्दर छवियाँ
सब लोगों के मन हरसाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
कोई तुममें दानव देखे,
कोई भीमकाय मानव,
कोई अपने देश का नक्शा,
कोई प्रीतम की छवि देख लजाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
ठंडी-ठंडी पवन राशि,
सभी दिशाओं में लहराये,
ऐसे भाग रहे हैं जैसे,
नठखटपन पर सब दौड़ाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
रिमझिम-रिमझिम बरस रही,
बूंदों की संगीतमयी रागों में,
स्वर इतने मिल रहे आज हैं,
जैसे सबने मिल साज लगाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
सोंधी-सोंधी गंध धरा की,
मन के कोनों में छा जाये,
चित चकोर बेसुध होकर,
अपनी चकई की आस लगाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
जल का ही विस्तार दिख रहा,
नज़रों के विस्तार पटल तक;
बीते दिन अब तीखी गर्मी के,
वर्षा के मनभावन दिन आये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
बीजों से नव अंकुर फूटे,
चीर धरा का अंतस्थल;
हरियाली हर तरफ दिख रही,
मन मयूर अब नृत्य दिखाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
प्रकृति हरीतिमा के वसन ओढ़,
गज गामिनी सी बल खाये;
झूम रही है आनंदमयी हो,
चहुँ ओर खुशियाँ बिखराये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
तेरे आने से हे बादल,
जैसे धरती का कण-कण मुस्काये;
वैसे हम भी इस वायरस से
जल्दी से छुटकारा पायें;
हम सबके चेहरे मुस्काये|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
monsoon ka bahot hi badhiya viviran... it is very detailed... you have noticed very small things and given them words...Kudos...
ReplyDeleteThanks Ankit for this +ve reinforcement .
ReplyDeleteWow sir .....bahut hi khoobsurat poem h👌👌👌
ReplyDeleteLazavaab
ReplyDeleteThank you very much Avinash.
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