आत्महत्या
ऐसा क्या गम था जीवन में?
जिस गम को लेकर सीने में,
दिल ही दिल में घुटते-घुटते;
तुम चिर निद्रा में चले गये |
रुपया,पैसा,गाड़ी,बंगला,
रुतबा,सम्मान सभी तो था,
तुम तो उगते सूरज थे ;
फिर क्यों ?
सब कुछ छोड़ गये |
पूरा देश तुम्हारा था,
हुनर ही तुम्हारा न्यारा था,
मन की अपनी पीड़ा को
अपनों से कहते तो सही,
फिर चुटकी में हल होता,
खुद में ही गुनते-धुनते
यह लोक छोड़ पर लोक गये|
कब से अवसाद रहा होगा,
मन में कुविचार रहा होगा,
यह दुनिया जीने लायक व
रहने लायक नहीं रही;
यह विचार मन में ले कर,
बस यही विचार दिल में लेकर,
एकाकी होते चले गये;
फिर कदम उठाया वह तुमने,
जो ले जाता है कहीं नहीं;
मरने से पहले जीना था,
तुम जीने से पहले मर ही गये|
ऊँची उड़ान में जीवन के
कितने अपने खो जाते हैं;
कुछ छूट गए,कुछ छोड़ दिया,
उनको पीछे छोड़ कहीं,
तुम बहुत दूर तक निकल गये;
पीछे मुड़ कर देखा होता;
वे मिल जाते वहीं कहीं,
लेकिन तुमने जहमत न किया,
अपनों से अपनी बात कहो;
खुद ही खुद में तिल-तिल मरते
तुम इस दुनिया से चले गये|
मन में मरने के विचार,
जग झूठा लगने का विचार,
सबके जीवन में कभी न कभी
आते हैं ऐसे कुविचार;
ऐसे में कोई अपना हो,
जिससे तुम बाँट सको हर गम;
वह तुमको दिल से ढाँढस दे,
ले आये तुमको फिर निकाल,
उस अंधकार मय जीवन से,
घुट-घुट कर मरते सपनों से,
फिर प्रकाश की किरण उगे,
जीवन के सुन्दर प्रांगण में,
जीवन की बगिया महक उठे,
सुन्दर-सुन्दर फूलों से,
क्या तुमने सब अपने अपनों को
ऊँची उड़ान की भेंट चढ़ा दी ?
जिससे तुमको कोई न मिला,
तुम छोड़ हमें सुर लोक गये -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
Great poem.. highlights problem of depression along with solution
ReplyDeleteThank you Pramod.
DeleteA commendable effort highlighting upon the disastrous effect of a very serious problem that us seldom noticed and looked after.Brought tears to my eyes.
ReplyDeleteThank you very much.
ReplyDeleteVery heart touching & well written... touches the right notes of the problem & suggests solution alongside...
ReplyDeleteThank you very much Ankit.
ReplyDeleteमार्मिक ,, सुन्दर चित्रण ,,,
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
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