पर्यावरण
बाग हमारे उजड़ रहे सब,
चरागाह सब ख़त्म हुये,
तालाबों को सुखा-सुखा,
हमने सब उजाड़ किया,
कंक्रीटों के जंगल खातिर,
खेतों को भी साफ किया;
ये हमने क्या काम किया ?
बागों में हरियाली थी,
चिड़ियाँ भी रहवासी थी,
तरह-तरह की चिड़ियों की,
तरह -तरह की आवाजें थी;
सारा बाग महक जाता था,
तरह-तरह के फूल,फलों से;
सबको अच्छे फल मिलते थे;
जालन की लकड़ी मिलती थी;
खटिया-मचिया के खातिर,
अच्छी-अच्छी लकड़ी मिलती थी;
रोज-रोज पेड़ों को काटा,
कभी न पेड़ लगाये उतने,
जितने पेड़ों को हमने काटा,
यहीं संतुलन बिगड़ गया;
ये हमने क्या काम किया?
चरागाह थे बड़े-बड़े,
दिन भर पशु चरते उसमें,
हमनें बढ़ते परिवार के खातिर,
जनसंख्या विस्फोट के खातिर,
उनके लिए अन्न के खातिर,
चरागाह सब नष्ट किये,
खेतों में फिर बदल दिये,
परिवारों के बढ़ने से,
छोटे-छोटे खेत हो गये,
बछवा-बछिया,पड़वा-पड़िया,
गाय-बैल और बकरी-बकरा,
भैंसा-भैंस आदि सभी,
धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे;
ट्रैक्टर-थ्रेशर से काम हो रहा,
केचुआ-केचुई ख़त्म हो रहे,
कृषकों के ये मित्र कभी थे,
जैविक खेती इनसे होती,
यूरिया-पोटाश की कोई जरुरत
अपने खेतों में कभी नहीं थी,
अब इनके हम पराधीन हैं;
ये हमने क्या काम किया?
गावों में तालाब बड़े थे,
तरह-तरह के जीवन उसमें,
खर-पतवार व जीव बड़े थे,
कछुआ,मछली,मेढक,साँप,
सबका आपस में था साथ;
पर्यावरण सुरक्षित रहता;
हमने सारे तालाब सुखा कर,
अपने घर और खेत बना कर,
जल के स्रोतों को सुखा दिया;
ये हमने क्या काम किया?
शहरों का विस्तार हो रहा,
कस्बे भी अब पसर रहे हैं,
नागिन जैसे जीभ निकाले ,
गाँव की ओर नजर गड़ाये,
धीरे-धीरे रेंग रहे हैं;
पर्यावरण की सारी व्यवस्था,
सबकी आपस में निर्भरता,
सबकी आपस में कड़ी बनी थी,
नीचे से ऊपर तक सारे,
एक के ऊपर एक खड़े थे,
शंकु जैसे सभी सधे थे;
हमनें बीच की कड़ियाँ तोड़ी,
सारी व्यवस्था धसक गयी,
सारा संतुलन बिगड़ गया;
ये हमने क्या काम किया?
अब हमको ही है फिर से
पर्यावरण को स्वच्छ बनाना,
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना,
जल संरक्षण के यन्त्र लगाना,
जैविक खेती के उपयोग बढ़ाना,
जब तक बहुत जरुरी न हो,
प्रकृति को न नुकसान पहुँचाना;
जीव-जंतु पर दया दिखाना;
तब ही हम फिर से पायेंगे,
पर्यावरण संतुलित पुराना -2 |
रविशंकर उपाध्याय
तालाबों को सुखा-सुखा,
हमने सब उजाड़ किया,
कंक्रीटों के जंगल खातिर,
खेतों को भी साफ किया;
ये हमने क्या काम किया ?
बागों में हरियाली थी,
चिड़ियाँ भी रहवासी थी,
तरह-तरह की चिड़ियों की,
तरह -तरह की आवाजें थी;
सारा बाग महक जाता था,
तरह-तरह के फूल,फलों से;
सबको अच्छे फल मिलते थे;
जालन की लकड़ी मिलती थी;
खटिया-मचिया के खातिर,
अच्छी-अच्छी लकड़ी मिलती थी;
रोज-रोज पेड़ों को काटा,
कभी न पेड़ लगाये उतने,
जितने पेड़ों को हमने काटा,
यहीं संतुलन बिगड़ गया;
ये हमने क्या काम किया?
चरागाह थे बड़े-बड़े,
दिन भर पशु चरते उसमें,
हमनें बढ़ते परिवार के खातिर,
जनसंख्या विस्फोट के खातिर,
उनके लिए अन्न के खातिर,
चरागाह सब नष्ट किये,
खेतों में फिर बदल दिये,
परिवारों के बढ़ने से,
छोटे-छोटे खेत हो गये,
बछवा-बछिया,पड़वा-पड़िया,
गाय-बैल और बकरी-बकरा,
भैंसा-भैंस आदि सभी,
धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे;
ट्रैक्टर-थ्रेशर से काम हो रहा,
केचुआ-केचुई ख़त्म हो रहे,
कृषकों के ये मित्र कभी थे,
जैविक खेती इनसे होती,
यूरिया-पोटाश की कोई जरुरत
अपने खेतों में कभी नहीं थी,
अब इनके हम पराधीन हैं;
ये हमने क्या काम किया?
गावों में तालाब बड़े थे,
तरह-तरह के जीवन उसमें,
खर-पतवार व जीव बड़े थे,
कछुआ,मछली,मेढक,साँप,
सबका आपस में था साथ;
पर्यावरण सुरक्षित रहता;
हमने सारे तालाब सुखा कर,
अपने घर और खेत बना कर,
जल के स्रोतों को सुखा दिया;
ये हमने क्या काम किया?
कस्बे भी अब पसर रहे हैं,
नागिन जैसे जीभ निकाले ,
गाँव की ओर नजर गड़ाये,
धीरे-धीरे रेंग रहे हैं;
पर्यावरण की सारी व्यवस्था,
सबकी आपस में निर्भरता,
सबकी आपस में कड़ी बनी थी,
नीचे से ऊपर तक सारे,
एक के ऊपर एक खड़े थे,
शंकु जैसे सभी सधे थे;
हमनें बीच की कड़ियाँ तोड़ी,
सारी व्यवस्था धसक गयी,
सारा संतुलन बिगड़ गया;
ये हमने क्या काम किया?
अब हमको ही है फिर से
पर्यावरण को स्वच्छ बनाना,
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना,
जल संरक्षण के यन्त्र लगाना,
जैविक खेती के उपयोग बढ़ाना,
जब तक बहुत जरुरी न हो,
प्रकृति को न नुकसान पहुँचाना;
जीव-जंतु पर दया दिखाना;
तब ही हम फिर से पायेंगे,
पर्यावरण संतुलित पुराना -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
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