आँख गड़ाये,हाथ चलाते,
मिल जायेंगे छोटे बच्चे,
सस्ते श्रम के लालच में,
इन मासूमों से काम कराते;
शर्म नहीं है उसको आती!
अपने घर की मजबूरी में,
बचपन में मजदूर बन गये;
मजबूरी का लाभ उठाते;
शर्म नहीं है उसको आती!
छोटे-छोटे कमरों में,
लगातार हैं काम कराते,
आँख गड़ाये बारह घंटे,
इनका बचपन बीत रहा है;
खेल-कूद सब सपना हो गया,
एक जगह बैठे-बैठे,
इनका बचपन रीत रहा है;
श्रम कानूनों का मखौल उड़ाते;
शर्म नहीं है उसको आती!
उम्र में पढ़ने-लिखने के,
इनका बस्ता इनसे छिन गया,
बधुआ मजदूरों की जमात में,
इनका जीवन शामिल हो गया,
इनसे इनका बचपन छीनते;
शर्म नहीं है उसको आती!
अमानवीय परिस्थितियों में,
लगातार रहते-रहते,
मन से,तन से,
कमजोर हो रहे;
फिर भी उसको तरस न आती;
शर्म नहीं है उसको आती!
इनको अपना गाँव बुलाता,
माँ-बाप का ठाँव बुलाता,
यारों की टोली पुकारती,
यादों की बारात बुलाती;
दिन मस्ती में बीत रहे थे,
माँ के प्यारे आँचल में;
आर्थिक तंगी ऐसी आयी,
छोड़ सभी घर-आँगन अपना,
इस दल-दल में आकर फँस गया,
पिछला सब कुछ सपना सा हो गया,
यह यथार्थ ही अपना हो गया,
मालिक दिनभर काम कराता,
दिनभर गाली-डांट पिलाता,
जरा सी गलती अगर हो गई,
गाली,डण्डे,हाथ चलाता,
ऐसे-ऐसे करते जुल्म;
शर्म नहीं है उसको आती!
लगातार मजदूरी करते,
जीवन उसका नरक हो गया,
इस दल-दल में फँसा जा रहा,
नख-शिख डूबा चला जा रहा,
अंधकार मय दुनिया दिखती,
सारे सपने भूल चूका है;
कभी-कभी अवचेतन में,
माँ आँचल में उसको लेकर,
लोरी उसको कई सुनाती,
थपकी दे कर उसे सुलाती,
नींद से बोझिल आँखे लेकर,
खड़े-खड़े ही ऊँघ रहा है;
थप्पड़ से मालिक के उसके,
सपना उसका टूट चुका है;
इतना अत्याचार कर रहा;
शर्म नहीं है उसको आती!
क्या इस जालिम दुनिया में
कभी कोई ऐसा आयेगा?
बने हुये श्रम-कानूनों को
अमली जामा पहनायेगा,
उसके जैसे लाखों बच्चे
अपना बचपन फिर पायेंगे
उनको जी भर जी पायेंगे;
इसी आस में आस लगाये,
काश! वे अच्छे दिन आ जायें,
एक-एक दिन काट रहा है,
अपने दोनों हाथ उठाये,
ईश्वर से फ़रियाद लगाये,
उनका रास्ता देख रहा है -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
No comments:
Post a Comment