Saturday, June 13, 2020

बालश्रम

                                             बालश्रम  







आँख गड़ाये,हाथ चलाते, 
मिल जायेंगे छोटे बच्चे, 
सस्ते श्रम के लालच में, 
इन मासूमों से काम कराते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

अपने घर की मजबूरी में, 
बचपन में मजदूर बन गये; 
मजबूरी का लाभ उठाते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

छोटे-छोटे कमरों में, 
लगातार हैं काम कराते, 
आँख गड़ाये बारह घंटे, 
इनका बचपन बीत रहा है; 
खेल-कूद सब सपना हो गया, 
एक जगह बैठे-बैठे, 
इनका बचपन रीत रहा है; 
श्रम कानूनों का मखौल उड़ाते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

उम्र में पढ़ने-लिखने के, 
इनका बस्ता इनसे छिन गया, 
बधुआ मजदूरों की जमात में, 
इनका जीवन शामिल हो गया, 
इनसे इनका बचपन छीनते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

अमानवीय परिस्थितियों में, 
लगातार रहते-रहते, 
मन से,तन से,
कमजोर हो रहे;
फिर भी उसको तरस न आती; 
शर्म नहीं है उसको आती!

इनको अपना गाँव बुलाता, 
माँ-बाप का ठाँव बुलाता, 
यारों की टोली पुकारती, 
यादों की बारात बुलाती; 
दिन मस्ती में बीत रहे थे, 
माँ के प्यारे आँचल में; 
आर्थिक तंगी ऐसी आयी, 
छोड़ सभी घर-आँगन अपना, 
इस दल-दल में आकर फँस गया, 
पिछला सब कुछ सपना सा हो गया, 
यह यथार्थ ही अपना हो गया, 
मालिक दिनभर काम कराता, 
दिनभर गाली-डांट पिलाता, 
जरा सी गलती अगर हो गई, 
गाली,डण्डे,हाथ चलाता, 
ऐसे-ऐसे करते जुल्म; 
शर्म नहीं है उसको आती!

लगातार मजदूरी करते, 
जीवन उसका नरक हो गया, 
इस दल-दल में फँसा जा रहा, 
नख-शिख डूबा चला जा रहा, 
अंधकार मय दुनिया दिखती, 
सारे सपने भूल चूका है; 
कभी-कभी अवचेतन में, 
माँ आँचल में उसको लेकर, 
लोरी उसको कई सुनाती, 
थपकी दे कर उसे सुलाती, 
नींद से बोझिल आँखे लेकर, 
खड़े-खड़े ही ऊँघ रहा है; 
थप्पड़ से मालिक के उसके, 
सपना उसका टूट चुका है; 
इतना अत्याचार कर रहा; 
शर्म नहीं है उसको आती!

क्या इस जालिम दुनिया में 
कभी कोई ऐसा आयेगा?
बने हुये श्रम-कानूनों को
अमली जामा पहनायेगा,
उसके जैसे लाखों बच्चे 
अपना बचपन फिर पायेंगे 
उनको जी भर जी पायेंगे;
इसी आस में आस लगाये, 
काश! वे अच्छे दिन आ जायें, 
एक-एक दिन काट रहा है, 
अपने दोनों हाथ उठाये, 
ईश्वर से फ़रियाद लगाये, 
उनका रास्ता देख रहा है -2 |
                        
                 रविशंकर उपाध्याय

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |    
  




 





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