अर्थव्यवस्था धसक गई है,
नौकरियों पर मार पड़ी है,
लाखों लोग बेरोजगार हो रहे;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
कम्पनियाँ आफत में हैं,
कैसे वेतन दें सबका,
ऐसी संकट की घड़ी है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
एक-एक कर छाँट रहे हैं,
कुछ भी नहीं सूझ रहा है,
किंकर्तव्यविमूढ़ कर्मचारी!
कैसी विपदा आन पड़ी है!
घरऔर गाड़ी के बचे कर्ज,
अब कैसे वह भरेगा ?
यही सोचते थक जाता है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
घर के खरचे कहाँ से लाये?
आटा,दाल कहाँ से पाये?
सारी बचत झर्र हो गई है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
और न कोई रास्ता सूझे,
दिन भर बैठ पहेली बूझे,
कैसे सबका पेट भरे?
कैसी विपदा आन पड़ी है!
लॉक डाउन घर में बीता,
सारा पैसा इसमें रीता,
कोई पूँजी नहीं बची है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
सारे व्यापार ठप्प पड़े हैं,
हर जगह बेरोजगार बढ़े हैं,
सबकी कमाई रुक ही गई है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
कब तक ऐसे ही सरकेगा?
जीवन पटरी से उतर गया है,
सारी व्यवस्था बिगड़ गई है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
हर कोई परेशान यहाँ है,
दुःख से सब लाचार यहाँ हैं,
दोस्त-यार सब सांसत में हैं;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
किसके आगे हाथ पसारे,
हर कोई दुःख से निढ़ाल है,
कैसी ये संकट की घड़ी है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!
कोई तो रास्ता हो आगे,
जिससे अपना दुःख ये भागे,
हर कोई है ताक लगाये;
विपदा के दिन जल्दी जाये |
शायद भविष्य में कुछ अच्छा हो,
हर कोई है आस लगाये,
ऊपर वाले को याद कर रहे;
विपदा के दिन जल्दी जाये -2 |
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक कृति एवं
सर्वाधिकार सुरक्षित |
Apt description of the plight of a common man...
ReplyDeleteThanks Ankit.
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