बच्चे
बच्चे
मुक्त पवन से,
कल-कल बहती
नदियों के स्वर से;
कलरव करती
चिड़ियों के दल से;
खिल उठते चेहरे उनके
रवि किरणों के खिलने से |
मन से निश्छल,
निर्विकार गंगा के जल से;
कल की चिंता से परे बहुत;
अपने में मगन ;
चहकते दिन भर,
फूलों से
खिले-खिले हरदम
करते अपने मन की दिनभर;
बच्चे प्रतिरूप
परम ईश्वर के |
आज खो गया
निश्छल मन,
अनुशासन ,अपनापन ;
मूल्य और चहकपन !
वैमनस्य और अभिमान;
दीख पड़ते हैं पॉँव
पूत के पालने से ही!
उनको उनका बचपन
आज उन्हें लौटाना है,
उनको यदि
अच्छा इंसान बनाना है,
तो;
खुद को पहले
इंसान बनाना है || -2
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |

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