Tuesday, December 23, 2025

                                         बच्चे 





                                  बच्चे 

मुक्त पवन से,

कल-कल बहती 

नदियों के स्वर से;

कलरव करती 

चिड़ियों के दल से;

खिल उठते चेहरे उनके 

रवि किरणों के खिलने से | 

मन से निश्छल, 

निर्विकार गंगा के जल से; 

कल की चिंता से परे बहुत; 

अपने में मगन ;

चहकते दिन भर, 

फूलों से 

खिले-खिले हरदम

करते अपने मन की दिनभर;

बच्चे प्रतिरूप 

परम ईश्वर के |

  

आज खो गया 

निश्छल मन,

अनुशासन ,अपनापन ;

मूल्य और चहकपन !

वैमनस्य और अभिमान;

दीख पड़ते हैं पॉँव 

पूत के पालने से ही!


उनको उनका बचपन 

आज उन्हें लौटाना है,

उनको यदि 

अच्छा इंसान बनाना है, 

तो;

खुद को पहले 

इंसान बनाना है || -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय | 

 


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