वृद्धाश्रम से पिता
वृद्धाश्रम से पिता
अभी अभी गया है बेटा
बाप से मिल कर ,
वृद्धाश्रम से !
आँखें फिर से गड़ाये रखेगा
इन्तजार में !
जाने कब फिर आएगा वह
बाप से मिलने ,
समय निकाल कर,
बीबी-बच्चों से बचकर |
क्योंकि ,
उन्हें कभी समझ नहीं आता
बूढ़े के लिए बेटे का प्यार !
बाप ने जो किया,
उसकी जिम्मेदारी थी;
फिर इसमें नया क्या किया ?
पैदा किया था,
तो पालना ही था ;
अच्छी शिक्षा , सारी सुख -सुविधा
देना ही था ;
भले ही खुद हमेशा
परेशानियों में जिया ;
इसमें नया क्या किया ?
ऊँगली पकड़ चलना सिखाया ,
बेटे को अच्छा मिले ,
के लिए ;
वह अपने सपने लिए ;
ताउम्र तरसता रहा
जीने के लिए !
बेटे का सप्ताह से महीने ,
और बरस में
आते रहने का क्रम
कभी भी टूट सकता है |
क्योंकि ,
बाप- बेटे को जोड़ता यह भ्रम
कभी भी टूट सकता है || -2
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय
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