Tuesday, December 16, 2025

                                  चिड़िया  


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                               चिड़िया 

अपने को सयानी समझ 

चिड़िया उड़ चली !

अपनों से दूर ,

बाप के स्नेह ,

माँ के प्यार, 

भाई -बहनों के आपसी 

नोंक -झोंक  को छोड़,

अपना घर बसाने !

उसे नहीं पता 

कि ,

जमाना कितना ज़ालिम  है !

खुले-अधखुले पंख, 

नैसर्गिक लावण्य ,

निश्छल मन 

कभी भी तोड़ सकता है | 

अपने स्वार्थ, कपट

और कुटिल चालों से 

उसे अपनों से दूर कर ,

सामाजिक बहिष्कार का दंश दे ,

कहीं का नहीं रखेगा !

और ,

स्वर्ग जैसे घोंसले  को उजाड़ ,

उसके पंख उखाड़ ,

माँ ,बाप और अपनों की 

नज़रों से गिरा !

उसे उसकी ही नज़रों से

 गिरा देगा | 

और ,

नदी के बहते जल सा 

उसके सारे  सपने बहा देगा || -2 

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |     


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