चिड़िया
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चिड़िया
अपने को सयानी समझ
चिड़िया उड़ चली !
अपनों से दूर ,
बाप के स्नेह ,
माँ के प्यार,
भाई -बहनों के आपसी
नोंक -झोंक को छोड़,
अपना घर बसाने !
उसे नहीं पता
कि ,
जमाना कितना ज़ालिम है !
खुले-अधखुले पंख,
नैसर्गिक लावण्य ,
निश्छल मन
कभी भी तोड़ सकता है |
अपने स्वार्थ, कपट
और कुटिल चालों से
उसे अपनों से दूर कर ,
सामाजिक बहिष्कार का दंश दे ,
कहीं का नहीं रखेगा !
और ,
स्वर्ग जैसे घोंसले को उजाड़ ,
उसके पंख उखाड़ ,
माँ ,बाप और अपनों की
नज़रों से गिरा !
उसे उसकी ही नज़रों से
गिरा देगा |
और ,
नदी के बहते जल सा
उसके सारे सपने बहा देगा || -2
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |

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