बरगद
बरगद
जड़ से उजड़ गया
बरगद का वह पेड़ ;
जिसने जीवन भर
थके-हारे राहगीरों ,
चिड़ियों ,उनके बच्चों ,
और ,
न जाने कितने लोगों को
आगे बढ़ने ,उड़ान भरने
और,
जीवन में सपने देखने को
प्रेरित किया |
धूप ,शीत और वर्षा
खुद सहता रहा
और ,
औरों को सहारा
देता रहा |
दूर देश से आया अजनबी हो
या,
पास का कोई राहगीर ;
कोई प्रवासी पक्षी हो
या ,
अपने शाख पर बनाये
घोसले में रहती चिड़िया
या ,
उसका बच्चा;
सबको अपनी शीतल छांव में
अपनेपन का एहसास
कराता रहा ;
और ,
जाने से पहले
इतने नन्हे-नन्हे बीज
जमीन को दे गया
कि,
आने वाला समय
उसकी परम्परा के नाम होगा
और,
किसी थके राहगीर ,चिड़िया
या,
कोई भी हो!
को अपने शीतल छाँव में लेकर
वही चिर-परिचित अपनेपन का
एहसास दिलाएगा
और,
बरगद के बूढ़े वृक्ष की आँखों में
तैरते सपनों को साकार बनायेगा || -2
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय |
No comments:
Post a Comment