मेरा मन
मेरा मन
परिस्थितियों के भंवर से
निकालने को
अपने सपने को ,
छटपटाता मेरा मन |
अपने ही व्यूह में फँस जाने का
सारे अरमानों को
उनसे सुलझाने को
अकुलाता मेरा मन|
मैं चला था ,
राह एक सीधी पकड़कर !
पर उसी राह पर
लडख़ड़ाते कदमों को
सम्हाल न पाने की विवशता से
झुझलाता मेरा मन |
मैं को मैं की मुकाम
न दे पाने की तड़प ,
अपने दायित्यों को
न निभा पाने की तड़प ,
और अपने कन्धों पर
बढ़ते बोझ को
न उठा पाने की तड़प !
मुझे मेरे ही नज़रों में
गिरा देने से पहले ,
अपने मुकाम को
पा लेने को ठाने मेरा मन ||-2
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय।
A poem which touches the intricacies of one's mind that they want to hide. Really thoughtful ...
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