Monday, December 15, 2025

                                                                       मेरा  मन 





     मेरा मन 


परिस्थितियों के भंवर से 

निकालने को 

अपने सपने को ,

छटपटाता मेरा मन | 

अपने ही व्यूह  में फँस जाने का 

सारे अरमानों को 

उनसे सुलझाने को 

अकुलाता मेरा मन| 

मैं चला था ,

राह एक सीधी पकड़कर !

पर उसी राह पर 

लडख़ड़ाते कदमों को 

सम्हाल न पाने की विवशता से 

झुझलाता  मेरा मन | 

मैं को मैं की मुकाम 

न दे पाने की तड़प ,

अपने दायित्यों को 

न निभा पाने की तड़प ,

और अपने कन्धों पर 

बढ़ते बोझ को 

न उठा पाने की तड़प !

मुझे मेरे ही नज़रों में 

गिरा देने से पहले ,

अपने मुकाम को 

पा  लेने को ठाने मेरा मन ||-2  

स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित -रवि शंकर उपाध्याय। 

1 comment:

  1. A poem which touches the intricacies of one's mind that they want to hide. Really thoughtful ...

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