हथिनी
वन से जन की ओर चली;
मन में भोजन की आस लिए;
उसने फल में विस्फोटक भर,
तुमको खाने को दिया;
तुमने उस पर विश्वास किया!
वह नीच और नराधम है,
पापी और निकृष्टतम है,
दया हीन और जानवर है,
जिसने ऐसा काम किया;
तुमने उस पर विश्वास किया!
तुम सीधी-साधी मन की निश्छल,
उस नीच के मन में क्या विष था ?
तुम उसके मन को पढ़ न सकी,
उसने विश्वास घात किया!
तुमने उस पर विश्वास किया!
तुमने फल को खा तो लिया,
लेकिन मुँह में ही विस्फोट हुआ;
मुँह,जीभ सभी घायल होकर,
खून से सब लथ-पथ होकर,
पीड़ा अपरम्पार हुई;
असहनीय पीड़ा में बिध,
तुम सोच रही थी लगातार;
क्यों ?
तुमने उस पर विश्वास किया!
तुम व्यथित ह्रदय पीड़ा में बिध,
क्षत-विक्षत सूँढ़ और जीभ लिए,
चहुँ ओर फिरी तुम राहत में;
लेकिन तुमको वह नहीं मिली,
गुस्सा आया होगा उस पर,
जिसने तुमसे यह घात किया
मन किया जरूर ही होगा कि;
दें पैरों से उसको चीर-फाड़;
सर पर रख पैर भयानक अपना
कुचलें उसको;
जिसने यह असह्य दर्द दिया;
फिर शांत किया होगा मन को,
विश्वास उठा होगा नर से;
मन विह्वल,तन की वेदना लिए,
तुम चली गई फिर नदी बीच;
सब छोड़ जहान की सभी रीति;
मन में विषाद की लहर लिए,
जल समाधि का संकल्प लिए,
तुम तीन दिनों तक खड़ी रही,
पानी में निश्चल पड़ी रही,
क्या-क्या विचार आये होंगे?
क्या-क्या सोचा होगा दिल में?
उन तीन दिनों की पल-पल बीती,
असहनीय पीड़ा उठती,
दर्द भरी कराहती रातों में;
कि,क्यों?
तुमने उस पर विश्वास किया!
अन्न,जल सब त्याग दिया;
संलेखना के पथ पर चल,
इस जग से हो विच्छिन्न मना;
प्रण मन में ले भीषण बड़ा,
अब यह जग नहीं रहा वैसा;
अब इस जग में मुझे नहीं रहना;
घंटों प्रयत्न सब करते रहे,
कि,
तुम बाहर आओ तो भला,
लेकिन तुमने अनसूनी कर दी
उनके सारे आह्वान ;
तुम टूट चुकी थी पूरी ही,
मानव पर से विश्वास उठा!
तुम गर्भवती थी जान रही,
फिर भी पानी से नहीं हटी,
अब बच्चे को भी इस जग में
लाने की ख़्वाहिश नहीं रही;
माँ की ममता हार गई,
बस पानी में खड़ी-खड़ी,
दिन-रात यही बस सोच रही,
उसने ऐसा क्यों कर किया?
तुमने उस पर विश्वास किया!
तीन दिनों तक हठयोग किये,
पानी में ही खड़े-खड़े;
यक्ष प्रश्न सा छोड़ यहाँ;
धीरे से पानी में बैठ गई;
इह लोक छोड़ पर लोक गयी;
हम सबको प्रश्नों के बौछारों से
लड़ने को मजबूर किये|
अब तो हमको मंथन करना,
कि,
हमको कैसा संसार मिला?
हमने इसका क्या हाल किया?
जग से जीवों का विश्वास उठ रहा,
हमने अपने स्वार्थ-सिद्धि हित
जीवों का उपयोग किया;
जब तक काम के वे रहते,
तब तक हम उनसे जुड़ते!
कब तक ऐसा ही चलेगा?
एक दिन ऐसा भी आएगा!
जब सिर्फ हमीं हम बचे रहेंगे;
जग में सिर्फ नर मुंड दिखेंगे;
लड़ते- झगड़ते झुण्ड दिखेंगे;
जग पूरा वीरान दिखेगा!
ऐसा हो इससे पहले;
अपने सारे स्वार्थ छोड़,
हर जीव-जन्तु को इस जग में
उनका अपना स्थान मिले;
ऐसा कुछ करना होगा,
तभी बचेगी धरती अपनी,
धरती के सब रहवासी;
मिलजुल कर इस धरती को
पहले जैसा करना होगा;
जिससे हम भी आबाद रहें,
और जंगल भी आबाद रहे,
सबकी अपनी सीमा हो,
सब अपनी जद में रहें;
तभी सही माने में
उस हथिनी को न्याय मिलेगा-2|
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |