Monday, January 25, 2021

नई सुबह

                  नई सुबह  







आज सुबह जब नींद खुली, 

सपनों की असली पोल खुली; 

मैं रीता सा आँगन में आया, 

पीछे बीत गए बरस की 

खट्टे-मीठे  यादों की, 

कुछ खोने,कुछ पाने की, 

कुछ गम की, 

कुछ सुखमय यादों की;  

सब अपना अधिकार ज़माने, 

मेरे पीछे सीना ताने, 

चले आ रहे!


मैंने आँगन में 

खिड़की से आती 

खिली धूप की इठलाती, इतराती, 

किरणों को देखा; 

प्रातःकाल की बेला में 

पीली सरसों के फूलों सी, 

बचपन की निश्छल बेबाक़ हँसी सी, 

अपने में ही मिलजुल कर 

खेल रही थीं, 

चहक रही थीं, 

उछल-कूद कर, 

सारा आँगन घेर रही थीं|  


मैंने अपना सिर झटका; 

बीते बरस की 

यादों की गठरी को 

ज्युँ पटका; 

मैं भी नई सुबह की किरणों संग, 

चिड़ियों संग, 

उनके बच्चों संग, 

फूलों संग हो लिया,

और; 

सूरज की किरणों संग 

पिछला सारा गम धो लिया-2| 

                रवि शंकर उपाध्याय 

         मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|   


Saturday, January 23, 2021

हथिनी

                  हथिनी 



  




वन से जन की ओर चली; 

मन में भोजन की आस लिए; 

उसने फल में विस्फोटक भर, 

तुमको खाने को दिया; 

तुमने उस पर विश्वास किया!


वह नीच और नराधम है, 

पापी और निकृष्टतम है, 

दया हीन और जानवर है, 

जिसने ऐसा काम किया; 

तुमने उस पर विश्वास किया!


तुम सीधी-साधी मन की निश्छल, 

उस नीच के मन में क्या विष था ?

तुम उसके मन को पढ़ न सकी, 

उसने विश्वास घात किया! 

तुमने उस पर विश्वास किया!


तुमने फल को खा तो लिया, 

लेकिन मुँह में ही विस्फोट हुआ; 

मुँह,जीभ सभी घायल होकर, 

खून से सब लथ-पथ होकर, 

पीड़ा अपरम्पार हुई; 

असहनीय पीड़ा में बिध, 

तुम सोच रही थी लगातार; 

क्यों ?

तुमने उस पर विश्वास किया!


तुम व्यथित ह्रदय पीड़ा में बिध,

क्षत-विक्षत सूँढ़ और जीभ लिए, 

चहुँ ओर फिरी तुम राहत में; 

लेकिन तुमको वह नहीं मिली, 

गुस्सा आया होगा उस पर, 

जिसने तुमसे यह घात किया 

मन किया जरूर ही होगा कि; 

 दें पैरों से उसको चीर-फाड़; 

सर पर रख पैर भयानक अपना 

कुचलें उसको; 

जिसने यह असह्य दर्द दिया; 

फिर शांत किया होगा मन को,

विश्वास उठा होगा नर से; 

मन विह्वल,तन की वेदना लिए, 

तुम चली गई फिर नदी बीच; 

सब छोड़ जहान की सभी रीति; 

मन में विषाद की लहर लिए, 

जल समाधि का संकल्प लिए, 

तुम तीन दिनों तक खड़ी रही, 

पानी में निश्चल पड़ी रही, 

क्या-क्या विचार आये होंगे? 

क्या-क्या सोचा होगा दिल में? 

उन तीन दिनों की पल-पल बीती, 

असहनीय पीड़ा उठती, 

दर्द भरी कराहती रातों में; 

कि,क्यों?

तुमने उस पर विश्वास किया!


अन्न,जल सब त्याग दिया; 

संलेखना के पथ पर चल, 

इस जग से हो विच्छिन्न मना; 

प्रण मन में ले भीषण बड़ा, 

अब यह जग नहीं रहा वैसा; 

अब इस जग में मुझे नहीं रहना; 

घंटों प्रयत्न सब करते रहे

कि,

तुम बाहर आओ तो भला, 

लेकिन तुमने अनसूनी कर दी 

उनके सारे आह्वान ; 

तुम टूट चुकी थी पूरी ही, 

मानव पर से विश्वास उठा! 

तुम गर्भवती थी जान रही, 

फिर भी पानी से नहीं  हटी, 

अब बच्चे को भी इस जग में 

लाने की ख़्वाहिश नहीं रही;

माँ की ममता हार गई, 

बस पानी में खड़ी-खड़ी, 

दिन-रात यही बस सोच रही, 

उसने ऐसा क्यों कर किया?

तुमने उस पर विश्वास किया!


तीन दिनों तक हठयोग किये, 

पानी में ही खड़े-खड़े; 

यक्ष प्रश्न सा छोड़ यहाँ; 

धीरे से पानी में बैठ गई; 

इह लोक छोड़ पर लोक गयी; 

हम सबको प्रश्नों के बौछारों से 

लड़ने को मजबूर किये| 

 

अब तो हमको मंथन करना, 

कि,

हमको कैसा संसार मिला? 

हमने इसका क्या हाल किया?   

जग से जीवों का विश्वास उठ रहा, 

हमने अपने स्वार्थ-सिद्धि हित 

जीवों का उपयोग किया; 

जब तक काम के वे रहते, 

तब तक हम उनसे जुड़ते!

कब तक ऐसा ही चलेगा?

एक दिन ऐसा भी आएगा! 

जब सिर्फ हमीं हम बचे रहेंगे; 

जग में सिर्फ नर मुंड दिखेंगे; 

लड़ते- झगड़ते झुण्ड दिखेंगे; 

जग पूरा वीरान दिखेगा!


ऐसा हो इससे पहले;

अपने सारे स्वार्थ छोड़, 

हर जीव-जन्तु को इस जग में 

उनका अपना स्थान मिले; 

ऐसा कुछ करना होगा,

तभी बचेगी धरती अपनी, 

धरती के सब रहवासी; 

मिलजुल कर इस धरती को 

पहले जैसा करना होगा; 

जिससे हम भी आबाद रहें, 

और जंगल भी आबाद रहे, 

सबकी अपनी सीमा हो, 

सब अपनी जद में रहें; 

तभी सही माने में 

उस हथिनी को न्याय मिलेगा-2| 

                  रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

 

   



 

 


Thursday, January 21, 2021

जीवन

                  जीवन  







अतीत के किसी कृत्य पर 

पश्चाताप से तड़पता,झुलसता; 

मरुभूमि में दूर तक दिखते 

बालू के ढूहों पर, 

छटपटाने को विवश, 

असहाय सा पड़ा, 

सांत्वना के एक बूँद को तरसता 

जीवन!

या फिर,

भविष्य की मृगमरीचिका में 

ताने-बाने बुनता,गुनता,धुनता, 

कहीं खोया रहता, 

जीवन!

अतीत के चलचित्रों; 

भविष्य के दिवास्वप्नों 

में कहीं उलझा!

असहाय सा फँसा; 

इन ताने-बानों को 

सुलझाने के प्रयास में 

और बुरी तरह उलझा; 

इनसे बच कर,  

 वर्तमान में आने को 

संकल्पबद्ध,कटिबद्ध,प्रयासरत 

जीवन-2| 

            रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 


Saturday, January 16, 2021

लिंचिंग

               लिंचिंग






विदीर्ण-चीर्ण हो रही,                                                     

सुबक-सुबक कर रो रही; 

मानवता लहूलुहान हो;

आज सड़क पर पड़ी! 


यह कैसा समय आ गया, 

दे कुत्सित यंत्रणा!

मिलकर सभी मारते; 

जबतक नहीं वह मरी!


यह कौन सी है सभ्यता?

कहाँ के ग्रन्थ में लिखा?

कि करके सभी हदें पार; 

करके मूल्य तार-तार 

दानवों से जूझते!

मन में ले कुत्सित विचार!


न कोई पूँछता किसी से, 

कि माजरा असल में क्या?

दिखा रहे मर्दांगिनी,

लठ्ठ-डण्डे से सभी|  


किंकर्तव्य हो गई है; 

बुद्धि सारी खो गई है; 

लगे हुए हैं मारने में;

जानवरों से सभी!


विकास की अंधी गली में, 

हम कहीं खो गए हैं, 

संस्कृति के मंत्र सारे; 

अपने पन के यत्न सारे;

वर्ण,जाति,धर्म आदि 

पुरखों के सत्कर्म सारे; 

पीछे कहीं छोड़ कर, 

अंधों जैसे हम चले हैं !


नहीं तो कैसे हो सका! 

कि सभी अपने कर्म भूल; 

चील,कौओं की तरह; 

एक पर भिड़े हुए, 

भूल सभी मूल्य अपने, 

सिर्फ उसको पीटते, 

लगातार जा रहे हैं! 


भारत माँ भी रो रही; 

खून के आँसू लिए, 

अपने को ही कोसती; 

देखते न बन रहा!

छत-विछत लाश को;

आँखों को भिगो रही;

 विक्षिप्त सी हो रही, 

अतीत में निहारती! 


क्या हि अपना देश था! 

संस्कृति व सभ्यता; 

सत्य,न्याय,मूल्य आदि; 

हम सभी की शान थी; 

देश की पहचान थी; 

संवेदना,सच्चरित्रता व 

सांत्वना की बाढ़ थी; 

सहनशीलता की इन्तहां, 

सभी जन में आम थी; 

परहित हि केवल धर्म था; 

परोपकार कर्म था; 

न आपस में कभी बैर था; 

सम्बृद्ध सा समाज था!


दिवास्वप्न हो गये, 

आज सारे मूल्य ही; 

देख दृश्य ये घृणित, 

वितृष्णा सी हो रही; 

आज के समाज से; 

घुट रही है जान जैसे,

साँस मुश्किल में पड़ी|  


क्या कोई न्याय होगा,

इस जघन्य अपराध का?

क्या कभी नदी बहेगी, 

गंगा जमुनी न्याय की? 

क्या कभी फिर देश अपना

न्याय धर्म आदि का, 

विश्व में सिरमौर होगा; 

है बड़ा ही कठिन प्रश्न, 

हम सभी के समक्ष, 

भविष्य के गर्त में 

कहीं पड़ा जवाब होगा! 


न्याय की अलख लिए 

हर तरफ ही भागना है; 

जिससे फिर से पा सकें; 

फिर वही समाज अपना 

जहाँ न विवाद कोई; 

वर्ण,जाति,धर्म का 

और ख़त्म हो सभी 

घृणित कुत्सित कर्म ही-2|   


रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 

 

   

 

Saturday, January 9, 2021

चाँद

               चाँद

मनमोहक,शीतल,शांत तथा 

गतिशील तथा अविरामी सदा; 

पथगामी तथा निष्कामी रहे, 

चलना चलना बस काम सदा|  


रात विभावरी बीत रही; 

मनभावनी सूरत नित नयी;

धर रूप अनेक प्रभावमयी; 

माथे पर टीका काम मयी|  


मन प्राण सभी न्योछावर है; 

मुख की शोभा मनभावन है; 

काम की शोभा लजाय रही; 

नित चाँद की शोभा निहारत है! 


प्रेयसी मुख देख लजाय रही; 

प्रिय से अपने को छुपाय रही; 

छुप जाओ कभी तुम अम्बर में; 

द्युति देखि तुम्हार लजाय रही! 


बढ़ जात कभी,घट जात कभी; 

जग सारा चकित भरमात सभी; 

तुम रूठ गये सोचत मन में; 

मन ही मन में मुस्काय सभी|  


नभ की सुन्दरता तुमसे है; 

नभ के मस्तक का तिलक तुम्हीं;  

तुम हो तो सदा नभ रोशन है; 

रात की शोभा तुम्हीं,तुम्हीं| 


चित को नित शांत करे शोभा; 

जो शोभा तुमसे फैलत है: 

एक टक हो के देख रही चकई; 

जैसे चकवे को बुलावत है| 

 

मनभावत है यह रूप सदा;

सब ही के दिल बहलावत है; 

तारों की शोभा बढ़े तब ही, 

जब चाँद सदा उगि आवत है| 


रात कभी यदि नींद खुले; 

अँगना में उचकि के आवत है; 

देख छटा बिखरी अम्बर की; 

नयनों से जाम पियावत है|  


देखि रहे एकटक अम्बर को; 

भूलि गयो अपनी सुधि-बुधि; 

मोती के गोटा लगी चुनरी में; 

सगरौं नभ में लहरावत है|  


मन शीतल होत सदा सबही के;

जब चाँद सदा नभ आवत है; 

चाँद बिना नभ की शोभा नहि;

नभ को नभ चाँद बनावत है-2 | 


रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |    

 


Friday, January 8, 2021

यादें

                     यादें



  





दिनभर ध्यान बँटा रहता है, 

रातें लम्बी हो जाती हैं; 

पहर-पहर पर नींद खुल रही; 

यादें ताजी हो जाती हैं|

 

क्या भूलूँ ?क्या याद करूँ?

यादों के झूले पर झूलूँ;

पेगें मार रही यादें; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


सालों बीत गये वो दिन; 

जब वो पहली बार मिले;

जैसे कल की बात हो वह! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


पहली बार नजर भर देखा; 

नज़रें झुकीं हुई थीं उनकी; 

नज़रों के आगे वो मंज़र! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


झील सी उनकी आंखें थीं;

उनमें डूब गया था मैं; 

जब भी मैं उतराना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


काली-काली भौहें थीं; 

पलकों पर काजल की शोभा; 

जब भी मैं चाहूँ भूलूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


नज़रों की कमान से बिध कर, 

मैं बेसुध हो गया तभी था! 

जब भी मैं चाहूँ सुध हो; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


मुख की शोभा बिल्लोरी आँखें; 

उन आँखों से घायल मैं; 

जब भी चाहूँ घाव भरे! 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


आँखों का गुलाम बन कर, 

अपना जीवन काट रहा हूँ; 

जब जंज़ीर तोड़ना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


आँखों ने आँखों की भाषा जानी, 

मैं आँखों में डूब गया; 

जब भी मैं उतराना चाहूँ; 

यादें ताजी हो जाती हैं| 


यादों की बारात सजाये, 

मैं फिरता हूँ मारा-मारा; 

जब मैं होश में आना चाहूँ;  

 यादें ताजी हो जाती हैं| 

                 रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 

Saturday, January 2, 2021

मैं देखूँगा


               मैं देखूँगा 






मैं देखूँगा;

बहती नदियाँ,बहते झरने,

फूलों की सुगंध से वासित, 

मधुरिम फुलवारियाँ;

शांत चित्त,गंभीर मना, 

वृहद हृदय युत सागर की 

अगणित छवियाँ|  

मैं देखूँगा; 

वृहद वितान से फैले, 

आसमान की सब रंगरलियाँ; 

लाखों ग्रह और लाखों तारे, 

प्रति क्षण,प्रति पल टिम-टिम करते;

उनकी बदल रही मन भावन गतियाँ|  

मैं देखूँगा; 

हिम शिखरों को, 

उन पर झंकृत वृहद ललाट से, 

अनुपम नदियों के बहते जल को; 

उस पहाड़ की कमनीय छटा को, 

जिससे सुख पाती, 

नज़रों की पुलकावलियाँ|  

मैं देखूँगा; 

जंगल अपने, 

जो फैले हैं दूर क्षितिज तक; 

जंगल के रहवासी बन कर, 

चिड़ियों की आपस की भाषा; 

उनकी कलरव ध्वनियाँ; 

जंगल के राजा की गर्जन; 

जिससे गुंजायमान हो जाती 

सारे जंगल की गलियाँ| 

मैं देखूँगा; 

मानव को भी! 

और उनके कंक्रीट के जंगल!

उनकी लिप्सा!उनकी लालच! 

जिसने तहस-नहस कर डाला, 

नदियों,जंगलऔर पहाड़ को;

और उनकी नैसर्गिक छवियाँ-2 | 

                     रवि शंकर उपाध्याय 

        मौलिक एवंसर्वाधिकार सुरक्षित|