Saturday, June 27, 2020

नींद

                               नींद



विश्वव्यापी महामारी, 
दुनियाभर की बेरोजगारी, 
पूरी दुनिया परेशान है; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
दुःख से सब बेहाल हो रहे, 
तड़प-तड़प कर रोज मर रहे, 
देख दशा दुनिया की अपने; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
चूसना खून गरीबों का, 
निजी अस्पताल में जारी; 
सरकारी अस्पताल अव्यवस्थित; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
बच्चे घर में सब अपने हैं, 
विद्यालय सब बंद पड़े हैं, 
शिक्षा से मरहूम नौनिहाल; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
कल कारखानों में ताले लटके, 
मजदूर सड़कों पर भटके, 
उत्पादन सब ठप्प पड़ा है; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
गरीबों की न कोई सुनता, 
खुद के गम से परेशान सब;
परोपकार की भावना मृतप्राय; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
सरकारें सब हार चुकी हैं,
सारे जतन हुयेअसफल हैं; 
रोज हजारों मरीज बढ़ रहे;
नींद नहीं है उसको आती|  
 
गाँवों पर दबाव बढ़ रहा, 
सब परदेशी गाँवों में हैं, 
कैसे सबका काम चलेगा?  
नींद नहीं है उसको आती|  
 
खेतों की अपनी क्षमता है, 
कैसे इतना अन्न उगाये? 
कैसे सबका पेट भरेगा?
नींद नहीं है उसको आती|  
 
दुनिया में हा-हाकार मचा है, 
रोग,गरीबी और भुखमरी, 
भ्रष्टाचार हर तरफ मचा है; 
नींद नहीं है उसको आती|  
 
कैसे इस चक्रव्यूह से निकले? 
कैसे इस संकट से उबरे? 
यही सोचते जाग रहा है; 
नींद नही है उसको आती|  
 
हम उबरे थे,हम उबरेंगे;
अपना पिछला इतिहास बताता; 
मानव की जिजीविषा प्रबल है; 
हर संकट से हम निकलेंगे|  

इसी प्रबल विश्वास को लेकर, 
सपनों की गोदी में जाता, 
खुशहाल जगत के सपनें लेकर; 
मीठी नींद में वह सो जाता-2|    

                             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 

Wednesday, June 24, 2020

सावन

                               सावन


आग उगलती गरम हवाएँ, 
तन मन को भीतर तक झुलसाये, 
जीवन ब्याकुल गर्मी से था, 
सब लोगों को राहत पहुँचाने, 
मन भावन सावन के दिन आये|     

चिड़ियाँ चहक रहीं पेड़ों पर, 
अपना-अपना झुण्ड बनाये, 
नाच रही हैं कूद रही हैं,
तरह-तरह के खेल दिखायें; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

आसमान में अपनों के संग, 
दूर क्षितिज तक नाप रही हैं; 
चलते लू से मिली है राहत, 
चिड़ियों के अच्छे दिन आये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

धरती जल मय लगती हैअब,
रोम-रोम उसके पुलके हैं; 
चटकी थी गर्मी से जो, 
उन फाँकों में पानी भरआये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

पवन हिलोरे ले ले नाचे, 
ठंडी-ठंडी लहर सी लागे,
झूम उठे मन हर प्राणी का, 
अंदर की गर्मी मिट जाये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

सूख गए थे ताल-पोखरे, 
सब में अब पानी भर आये; 
जल ही जल दिखता हैअब तो, 
दिन भर उसमें मेढक टर्राये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

झूले पड़ गए पेड़ों पर,
कजरी,चैता सब मिल गायें; 
झूल रही हैं बहू बेटियाँ, 
पेंगे आसमान तक जायें; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

गीतों की मिठास मिल सबसे, 
प्रकृति में मिठास फैलाये; 
सारा जग ही झूम रहा है,
इन  गीतों से ताल मिलाये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

छोटे-छोटे कोपल निकले, 
पूरी धरती पर छा जायें; 
 उन पर पानी की बूँदें ज्यों, 
 मोती की लड़ियाँ बिखरायें; 
मन भावन सावन के दिन आये| 
    
गाँवों में खुशियाँ ही खुशियाँ, 
कृषक जा रहे खेतों में, 
अच्छी फसल के सपनें लेकर, 
दिल ही दिल में वह हरसाये;
मन भावन सावन के दिन आये|     

बाग,बगीचे,गाँव,शहर में, 
सबके अपने-अपने सुख हैं; 
 रहता सबको इंतजार है,  
बीते दुःख और खुशियों के दिन आये; 
मन भावन सावन के दिन आये|     

                         रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

    
 
 

Monday, June 22, 2020

काले बादल

                            काले बादल





काले बादल घिर-घिर आये, 
सारे आसमान में छाये, 
अच्छा बहुत किया तुमने; 
ऊब चुके थे गर्मी से हम, 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

काले-काले झुण्ड बना तुम, 
बिन मतलब नभ में मडराये; 
बनती-बिगड़ती सुन्दर छवियाँ
सब लोगों के मन हरसाये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  


कोई तुममें दानव देखे, 
कोई भीमकाय मानव, 
कोई अपने देश का नक्शा, 
कोई प्रीतम की छवि देख लजाये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

ठंडी-ठंडी पवन राशि, 
सभी दिशाओं में लहराये, 
ऐसे भाग रहे हैं जैसे, 
नठखटपन पर सब दौड़ाये;  
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

रिमझिम-रिमझिम बरस रही, 
बूंदों की संगीतमयी रागों में, 
स्वर इतने मिल रहे आज हैं, 
जैसे सबने मिल साज लगाये;
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

सोंधी-सोंधी गंध धरा की, 
मन के कोनों में छा जाये, 
चित चकोर बेसुध होकर, 
अपनी चकई की आस लगाये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

जल का ही विस्तार दिख रहा, 
नज़रों के विस्तार पटल तक; 
बीते दिन अब तीखी गर्मी के, 
वर्षा के मनभावन दिन आये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

बीजों से नव अंकुर फूटे, 
चीर धरा का अंतस्थल; 
 हरियाली हर तरफ दिख रही, 
मन मयूर अब नृत्य दिखाये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

प्रकृति हरीतिमा के वसन ओढ़, 
गज गामिनी सी बल खाये; 
झूम रही है आनंदमयी हो, 
चहुँ ओर खुशियाँ बिखराये; 
हम सबके चेहरे मुस्काये| 
 
तेरे आने से हे बादल, 
जैसे धरती का कण-कण मुस्काये; 
वैसे हम भी इस वायरस से 
जल्दी से छुटकारा पायें; 
हम सबके चेहरे मुस्काये|  

                             रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Saturday, June 20, 2020

पिता



                        पिता 

Happy Father's Day to all dads - The Sunday Guardian Live



तिनका-तिनका चुनता, 
सहेजता,सम्हालता,
अपनों के लिए घरौंदा बनाता,
चिलचिलाती धूप,वर्षा,
कड़कड़ाती ठण्ड सहता, 
बचता-बचाता अपनों के लिये कमाता, 
पसीने से तर-बतर,
हलकान सा हुआ जाता, 
अपनों के लिये हर दर्द सहता, 
पिता|

बड़े-बड़े दुःख के थपेड़े,
अकेले ही चुपचाप सह जाता,
अपनों की ख़ुशी में,
अंदर ही अंदर खुश हो लेता, 
भावनाओं के उठते उत्ताप हिलोरों को 
जब्त कर लेता; 
उनको बाहर न आने देता; 
पिता| 

बच्चों की उँगली थामे, 
उन्हें दुनिया की ठोकरों से बचाता, 
दुनियादारी सिखाता,
उनकी उँगली पकड़े हम बच्चे, 
अपने को दुनिया के सबसे 
भाग्यशाली और खुश नसीब मानते 
और हमारी इस ख़ुशी पर, 
मंद-मंद मुस्कराता; 
पिता|  

हमें हर दम ख़ुशी और आनंद का 
आभास कराता; 
दुःख की छाया भी हम पर न पड़े, 
के प्रयास में हरदम 
कर्मरत रहता; 
बाहर से आने पर 
हमारे लिए कुछ न कुछ लाता, 
हमें हतप्रत कर देता; 
पिता| 

ढलती उम्र में भी 
अपनों के लिए उनका प्यार, 
उनका सर्वस्व समर्पण,त्याग,
दिन ब दिन बढ़ता गया; 
हम उनकी छाँव में 
फलते-फूलते रहे, 
बिना इस एहसास के 
कि,
अब कमजोर हो रहे हैं 
पिता| 

फिर भी उनका होना, 
हमें सम्बल देता रहा; 
बूढ़े बरगद के नीचे की 
ठंडी हवा हमें रोमांचित 
कर जाती थी तब भी; 
लेकिन,
एक दिन ढह गया, 
वह बरगद का पेड़ 
या कि पिता| 

खाली-खाली सा लगता था, 
मन भारी-भारी सा लगता था,
उस जगह को देख कर 
जहाँ से उखड़ा था, 
वह बरगद का पेड़; 
या कि पिता| 

क्रूर समय ने हमें 
जिंदगी के थपेड़ों में ऐसे 
ढकेल दिया कि, 
अब कभी कभी ही
 याद आती है उनकी; 
लेकिन, 
जब आती है, 
बड़ी सिद्दत से आती है, 
समय जैसे रुक जाता है; 
हम उन्हीं स्मृतियों में खो जाते हैं, 
जहाँ वे हमारी उँगली थामे, 
हमारी तोतली बातें सुन रहे हैं, 
और हम उनकी मुलायम,मोटी ,
उँगलियों को कस कर पकड़े; 
अपने को दुनिया का सबसे भाग्य शाली 
बच्चे समझते हुए, 
पग से पग मिलाने का प्रयास करते, 
कुछ कुछ दौड़ने से लगते, 
और कभी वे अपनी रफ़्तार 
कम कर देते और हम 
जीत जाते और हमारी जीत पर 
मंद-मंद मुस्कराते, 
पिता-2 | 
                       
                 रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Thursday, June 18, 2020

चीन को चेतावनी


                           
 चीन को चेतावनी





गेलवान में आगे बढ़ कर, 
तुमने जो दुःसाहस की है; 
उसका समुचित प्रतिउत्तर देकर, 
हमने तुमको दिखा दिया है; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

फ़क्र हमें है अपने वीरों पर, 
उनके अदम्य पराक्रम पर, 
उनकी शहादत व्यर्थ न होगी, 
जीवनभर तुम पछताओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

तुमने कायरता से मारा, 
हमने सीधे ललकारा है, 
शेरों से गलती से भिड़ गये, 
एक के बदले दस पाओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

ये आज का सम्बृद्ध तथा  
संसाधन से युक्त है भारत;
आँखे यदि दिखलायी तो, 
पूरे अंधे हो जाओगे;
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

बदल गया है देश हमारा, 
पूरी दुनिया में डंका है, 
दुम दबा के भागोगे; 
यदि फिर से आगे आओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

तुमको कोई शक है जैसे; 
तुम रण में जीत जाओगे, 
दिवास्वप्न मत देखो कोई, 
चारो खाने चित्त मिलोगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

पहले हम हमला न करेंगे, 
बाद में हम पीछे न हटेंगे, 
तुमने हमको ललकारा है, 
अब देखो तुम पछताओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

देश तुम्हारा टूट चुका है, 
अर्थव्यवस्था धसक गयी है,
खिसियान बिलरिया खम्भा नोचे, 
अपना मुँह तुम नुचवाओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

गीदड़ भभकी हमें न देना, 
हम घर में घुस कर मारेंगे, 
हर सीमा पर घिरे हुए हो, 
हमसे जीत नहीं पाओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

देश हमारा जाग गया है, 
तुमको तहस-नहस कर देंगे, 
हर मोर्चे पर तुम हारोगे, 
सड़कों पर खुद को पाओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

युद्ध नहीं हल होता कोई; 
लेकिन यदि तुमने छेड़ा, 
ऐसी दुर्गति कर देंगे ,कि खुद को 
दुनिया के नक़्शे से बाहर पाओगे; 
हर दम तुम मुँह की खाओगे|  

                         रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Tuesday, June 16, 2020

विपदा

                                विपदा







अर्थव्यवस्था धसक गई है, 
नौकरियों पर मार पड़ी है, 
लाखों लोग बेरोजगार हो रहे; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!
 
कम्पनियाँ आफत में हैं, 
कैसे वेतन दें  सबका, 
ऐसी संकट की घड़ी है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

एक-एक कर छाँट रहे हैं, 
कुछ भी नहीं सूझ रहा है, 
किंकर्तव्यविमूढ़ कर्मचारी!
कैसी विपदा आन पड़ी है!


घरऔर गाड़ी के बचे कर्ज, 
अब कैसे वह भरेगा ?
यही सोचते थक जाता है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

घर के खरचे कहाँ से लाये?
आटा,दाल कहाँ से पाये?
सारी बचत झर्र हो गई है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

और न कोई रास्ता सूझे, 
दिन भर बैठ पहेली बूझे, 
कैसे सबका पेट भरे?
कैसी विपदा आन पड़ी है!

लॉक डाउन घर में बीता, 
सारा पैसा इसमें रीता, 
कोई पूँजी नहीं बची है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

सारे व्यापार ठप्प पड़े हैं, 
हर जगह बेरोजगार बढ़े हैं, 
सबकी कमाई रुक ही गई है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

कब तक ऐसे ही सरकेगा? 
जीवन पटरी से उतर गया है, 
सारी व्यवस्था बिगड़ गई है;
कैसी विपदा आन पड़ी है!

हर कोई परेशान यहाँ है,
दुःख से सब लाचार यहाँ हैं,
दोस्त-यार सब सांसत में हैं; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

किसके आगे हाथ पसारे, 
हर कोई दुःख से निढ़ाल है, 
कैसी ये संकट की घड़ी है; 
कैसी विपदा आन पड़ी है!

कोई तो रास्ता हो आगे, 
जिससे अपना दुःख ये भागे, 
हर कोई है ताक लगाये; 
विपदा के दिन जल्दी जाये | 

शायद भविष्य में कुछ अच्छा हो, 
हर कोई है आस लगाये, 
ऊपर वाले को याद कर रहे;
विपदा के दिन जल्दी जाये -2 | 
 
                      रविशंकर उपाध्याय 

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Sunday, June 14, 2020

सुशांत सिंह राजपूत को एक विनम्र श्रद्धांजलि |

 
                                  आत्महत्या 


ऐसा क्या गम था जीवन में?
जिस गम को लेकर सीने में, 
दिल ही दिल में घुटते-घुटते; 
तुम चिर निद्रा में चले गये | 


रुपया,पैसा,गाड़ी,बंगला,
रुतबा,सम्मान सभी तो था, 
तुम तो उगते सूरज थे ;
फिर क्यों ?
सब कुछ छोड़ गये |
 
पूरा देश तुम्हारा था, 
हुनर ही तुम्हारा न्यारा था, 
मन की अपनी पीड़ा को 
अपनों से कहते तो सही, 
फिर चुटकी में हल होता, 
खुद में ही गुनते-धुनते 
यह लोक छोड़ पर लोक गये|  

कब से अवसाद रहा होगा, 
मन में कुविचार रहा होगा, 
यह दुनिया जीने लायक व
रहने लायक नहीं रही; 
यह विचार मन में ले कर, 
बस यही विचार दिल में लेकर, 
एकाकी होते चले गये; 
फिर कदम उठाया वह तुमने, 
जो ले जाता है कहीं नहीं; 
मरने से पहले जीना था, 
तुम जीने से पहले मर ही गये|  


ऊँची उड़ान में जीवन के 
कितने अपने खो जाते हैं; 
कुछ छूट गए,कुछ छोड़ दिया, 
उनको पीछे छोड़ कहीं, 
तुम बहुत दूर तक निकल गये; 
पीछे मुड़ कर देखा होता; 
वे मिल जाते वहीं कहीं,
लेकिन तुमने जहमत न किया, 
अपनों से अपनी बात कहो; 
खुद ही खुद में तिल-तिल मरते 
तुम इस दुनिया से चले गये|  


मन में मरने के विचार, 
जग झूठा लगने का विचार, 
सबके जीवन में कभी न कभी 
आते हैं ऐसे कुविचार; 
ऐसे में कोई अपना हो, 
जिससे तुम बाँट सको हर गम; 
वह तुमको दिल से ढाँढस दे, 
ले आये तुमको फिर निकाल,
उस अंधकार मय जीवन से, 
घुट-घुट कर मरते सपनों से,
फिर प्रकाश की किरण उगे, 
जीवन के सुन्दर प्रांगण में, 
जीवन की बगिया महक उठे, 
सुन्दर-सुन्दर फूलों से, 
क्या तुमने सब अपने अपनों को 
ऊँची उड़ान की भेंट चढ़ा दी ?
जिससे तुमको कोई न मिला,
तुम छोड़ हमें सुर लोक गये -2 |  
                                     
                           रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
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Saturday, June 13, 2020

बालश्रम

                                             बालश्रम  







आँख गड़ाये,हाथ चलाते, 
मिल जायेंगे छोटे बच्चे, 
सस्ते श्रम के लालच में, 
इन मासूमों से काम कराते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

अपने घर की मजबूरी में, 
बचपन में मजदूर बन गये; 
मजबूरी का लाभ उठाते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

छोटे-छोटे कमरों में, 
लगातार हैं काम कराते, 
आँख गड़ाये बारह घंटे, 
इनका बचपन बीत रहा है; 
खेल-कूद सब सपना हो गया, 
एक जगह बैठे-बैठे, 
इनका बचपन रीत रहा है; 
श्रम कानूनों का मखौल उड़ाते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

उम्र में पढ़ने-लिखने के, 
इनका बस्ता इनसे छिन गया, 
बधुआ मजदूरों की जमात में, 
इनका जीवन शामिल हो गया, 
इनसे इनका बचपन छीनते; 
शर्म नहीं है उसको आती!

अमानवीय परिस्थितियों में, 
लगातार रहते-रहते, 
मन से,तन से,
कमजोर हो रहे;
फिर भी उसको तरस न आती; 
शर्म नहीं है उसको आती!

इनको अपना गाँव बुलाता, 
माँ-बाप का ठाँव बुलाता, 
यारों की टोली पुकारती, 
यादों की बारात बुलाती; 
दिन मस्ती में बीत रहे थे, 
माँ के प्यारे आँचल में; 
आर्थिक तंगी ऐसी आयी, 
छोड़ सभी घर-आँगन अपना, 
इस दल-दल में आकर फँस गया, 
पिछला सब कुछ सपना सा हो गया, 
यह यथार्थ ही अपना हो गया, 
मालिक दिनभर काम कराता, 
दिनभर गाली-डांट पिलाता, 
जरा सी गलती अगर हो गई, 
गाली,डण्डे,हाथ चलाता, 
ऐसे-ऐसे करते जुल्म; 
शर्म नहीं है उसको आती!

लगातार मजदूरी करते, 
जीवन उसका नरक हो गया, 
इस दल-दल में फँसा जा रहा, 
नख-शिख डूबा चला जा रहा, 
अंधकार मय दुनिया दिखती, 
सारे सपने भूल चूका है; 
कभी-कभी अवचेतन में, 
माँ आँचल में उसको लेकर, 
लोरी उसको कई सुनाती, 
थपकी दे कर उसे सुलाती, 
नींद से बोझिल आँखे लेकर, 
खड़े-खड़े ही ऊँघ रहा है; 
थप्पड़ से मालिक के उसके, 
सपना उसका टूट चुका है; 
इतना अत्याचार कर रहा; 
शर्म नहीं है उसको आती!

क्या इस जालिम दुनिया में 
कभी कोई ऐसा आयेगा?
बने हुये श्रम-कानूनों को
अमली जामा पहनायेगा,
उसके जैसे लाखों बच्चे 
अपना बचपन फिर पायेंगे 
उनको जी भर जी पायेंगे;
इसी आस में आस लगाये, 
काश! वे अच्छे दिन आ जायें, 
एक-एक दिन काट रहा है, 
अपने दोनों हाथ उठाये, 
ईश्वर से फ़रियाद लगाये, 
उनका रास्ता देख रहा है -2 |
                        
                 रविशंकर उपाध्याय

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Thursday, June 11, 2020

सपना

                         सपना






धन-धान्य  से देश भरा है, 
हर तरफ खुशहाली है, 
हर कोई खुश अपने में है; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

जाति-धर्म पर कोई न लड़ता, 
स्वार्थसिद्धि में कोई न पड़ता, 
सब मिल-जुल कर आपस में रहते; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

फसलों से सब खेत भरे हैं, 
उच्च कोटि के बीज पड़े हैं, 
खेतों में सोना उगता है; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

ऊँच-नीच की बात न कोई, 
बैर-भाव न रखता कोई, 
मेल-जोल की गंगा बहती; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

सही समय पर शिक्षा मिलती, 
एक-एक को शिक्षा मिलती,
अब न कोई अशिक्षित है; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

सबको ही रोजगार मिल रहा, 
उनकी शिक्षा के अनुसार, 
अब न कोई बेरोजगार यहाँ;
एक दिन मैंने सपना देखा|  

बच्चे कम अब परिवारों में, 
स्वस्थ और हैं मस्त घरों में, 
कोई न बचा कुपोषित है; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

होली और ईद मनाते, 
त्योहारों पर मिलने जाते, 
आपस में न कोई लड़ाई; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

सुख-दुःख में सब साथ में रहते, 
छोटे-बड़े का भाव न रखते, 
दुःख में अपनों के हाथ बटाते; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

दादा-दादी,ताऊ-चाची, 
सब मिल एक आँगन में रहते, 
परिवारों में तैरती खुशियाँ; 
एक दिन मैंने सपना देखा| 
 
गाँव में ही रोजगार मिल रहा, 
दिल्ली,मुंबई कोई न जाता, 
बड़े न अब एकाकी रहते, 
अवसादों में कभी न पड़ते, 
चेहरे पर रहती मुस्कान; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  

बच्चे हरदम ही रहते 
अपने दादा-दादी के साथ, 
उन्हें कहानी कई सुनाते 
दादा बड़े चाव के साथ, 
जिनमें झलके जीवन दर्पण, 
जीवन जीने का दर्शन, 
बच्चे खूब मजे से सुनते 
उनकी छोटी-छोटी बात; 
एक दिन मैंने सपना देखा|  
 
काश! ये सपना सच हो जाता, 
आने वाले समय काल में; 
विपदा के दिन जल्दी बीते, 
सूर्य उगे फिर से खुशियों का, 
चीर सभी गम के अँधियार;
एक दिन मैंने सपना देखा-2 |  
 
                       रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 




Monday, June 8, 2020

शहीद

                          शहीद 








तुम देशप्रेम के चरम बिंदु,
निज देश के हित सर्वस्व त्याग, 
तुम परम धाम को चले गये; 
हे परम वीर तुमको सलाम| 
  
तुम अंत समय तक भिड़े रहे, 
शत्रु पक्ष की कमर तोड़, 
इह लोक छोड़ सुरधाम गये; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

दुश्मन से देश की रक्षा का, 
दिल में लिये संकल्प तुम, 
सर में अपने कफन बाँध; 
हे परम वीर तुमको सलाम|   

अपनों की चिंता चित में न ला, 
हाथों में अपने हथियार लिये, 
तुम शत्रु पक्ष पर झपट पड़े; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

कर सेना उनकी तहस-नहस, 
शेरों जैसे आगे बढ़, 
मरते दम तक लड़ते ही रहे; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  


करके हमें निश्चिंत तुम, कि 
हम सुरक्षित घरों में हैं, 
तुम भिड़ रहे रणों में थे; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

तुम खून अपना बहा-बहा,
सीमाओं पर डटे रहे; 
नित नए संकट आते रहे, 
तुम हर समय सहते रहे,  
अंत में फिर त्याग सब, 
तुम परम धाम को चले गये; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

तुम मर मिटे इस देश पर, 
इस देश की आन पर, 
इस देश की पहचान पर; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

जब तक रही निज देह में, 
खून की एक बूँद भी, 
तुम भिड़े रहे रण क्षेत्र में;
हे परम वीर तुमको सलाम|  

शत्रु के छक्के छुड़ा, 
उनको पीछे ठेल कर, 
तुम चल दिये निज धाम को; 
हे परम वीर तुमको सलाम|  

तुम देश के सिर-मौर हो, 
तुम देश के गौरवमयी 
इतिहास के युवराज हो, 
तुम थे तो हम हैं आज खुश, 
तुम बना गये हमको ऋणी;  
कर-बद्ध हो निज सिर झुका, 
हम सब विनम्र भाव से, 
करते सदा तुमको प्रणाम;  
हे परम वीर तुमको सलाम-2 | 
                        
                     रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Sunday, June 7, 2020

पर्यावरण

                              पर्यावरण 
                                          







बाग हमारे उजड़ रहे सब, 
चरागाह सब ख़त्म हुये,
तालाबों को सुखा-सुखा, 
हमने सब उजाड़ किया,
कंक्रीटों के जंगल खातिर, 
खेतों को भी साफ किया; 
ये हमने क्या काम किया ?

बागों में हरियाली थी,
चिड़ियाँ भी रहवासी थी, 
तरह-तरह की चिड़ियों की, 
तरह -तरह की आवाजें थी; 
सारा बाग महक जाता था, 
तरह-तरह के फूल,फलों से; 
सबको अच्छे फल मिलते थे; 
जालन की लकड़ी मिलती थी; 
खटिया-मचिया के खातिर, 
अच्छी-अच्छी लकड़ी मिलती थी;  
रोज-रोज पेड़ों को काटा, 
कभी न पेड़ लगाये उतने, 
जितने पेड़ों को हमने काटा, 
यहीं संतुलन बिगड़ गया; 
ये हमने क्या काम किया? 


चरागाह थे बड़े-बड़े, 
दिन भर पशु चरते उसमें, 
हमनें बढ़ते परिवार के खातिर, 
जनसंख्या विस्फोट के खातिर, 
उनके लिए अन्न के खातिर, 
चरागाह सब नष्ट किये, 
खेतों में फिर बदल दिये, 
परिवारों के बढ़ने से, 
छोटे-छोटे खेत हो गये, 
बछवा-बछिया,पड़वा-पड़िया,
गाय-बैल और बकरी-बकरा, 
भैंसा-भैंस आदि सभी, 
धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे; 
ट्रैक्टर-थ्रेशर से काम हो रहा, 
केचुआ-केचुई ख़त्म हो रहे, 
कृषकों के ये मित्र कभी थे, 
जैविक खेती इनसे होती, 
यूरिया-पोटाश की कोई जरुरत 
अपने खेतों में कभी नहीं थी, 
अब इनके हम पराधीन हैं; 
ये हमने क्या काम किया? 


गावों में तालाब बड़े थे,
तरह-तरह के जीवन उसमें, 
खर-पतवार व जीव बड़े थे, 
कछुआ,मछली,मेढक,साँप, 
सबका आपस में था साथ; 
पर्यावरण सुरक्षित रहता; 
हमने सारे तालाब सुखा कर, 
अपने घर और खेत बना कर, 
जल के स्रोतों को सुखा दिया; 
ये हमने क्या काम किया? 


शहरों का विस्तार हो रहा,   
कस्बे भी अब पसर रहे हैं, 
नागिन जैसे जीभ निकाले ,
गाँव की ओर नजर गड़ाये, 
धीरे-धीरे रेंग रहे हैं; 
पर्यावरण की सारी व्यवस्था, 
सबकी आपस में निर्भरता, 
सबकी आपस में कड़ी बनी थी,
नीचे से ऊपर तक सारे, 
एक के ऊपर एक खड़े थे, 
शंकु जैसे सभी सधे थे; 
हमनें बीच की कड़ियाँ तोड़ी, 
सारी व्यवस्था धसक गयी, 
सारा संतुलन बिगड़ गया; 
ये हमने क्या काम किया? 


अब हमको ही है फिर से 
पर्यावरण को स्वच्छ बनाना, 
ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना, 
जल संरक्षण  के यन्त्र लगाना, 
जैविक खेती के उपयोग बढ़ाना, 
जब तक बहुत जरुरी न हो, 
प्रकृति को न नुकसान पहुँचाना; 
जीव-जंतु पर दया दिखाना; 
तब ही हम फिर से पायेंगे, 
पर्यावरण संतुलित पुराना -2 |

                                 रविशंकर उपाध्याय  
 
मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |                    

Friday, June 5, 2020

कोरोना काल में कुछ लोग

    

                            लोग



बड़े-बड़े भाषण देते, 
खुद उस पर अमल न करते, 
गली ,मोहल्ला या सड़कों पर, 
मिल जायेंगे हम सबको, 
ऐसे -ऐसे लोग !

सटकर ही बतियायेंगे, 
आपस में दूरी रखना,
यदि उनको बतलाओ तो;
मार-पीट पर उतर आयेंगे,
ऐसे -ऐसे लोग !

सब नियम-कानून जानते, 
साफ-सफाई हर दम रखना, 
हाथों को हरदम धोना, 
मल-मलकर  साबुन से धोना; 
फिर भी उस पर अमल न करते, 
चलते -फिरते वायरस वाहक, 
हमको,आपको,सब लोगों को; 
मिल जायेंगे सभी जगह; 
ऐसे -ऐसे लोग !

बिना काम के कभी न निकलें, 
दुकानों या बाजारों में, 
जब तक बहुत जरुरी न हो, 
घर के बाहर न निकलें; 
बिना काम के घूमने वाले, 
पान -सुपारी खानें वाले, 
बिन पूछे समझाने वाले, 
खुद कुछ भी अमल न करते; 
ऐसे -ऐसे लोग !

हलके में वायरस को लेते, 
सरकारों की सारी बातें, 
उनकी सभी हिदायतें, 
ताख पर रखकर चल देते हैं; 
ऐसे -ऐसे लोग !

दुनियाँ भर की सारी बातें, 
दुखते दिन और दुखती रातें, 
पूरी दुनियाँ दहल रही है, 
मौत भयानक टहल रही है, 
एक-एक को सूँघ रही है, 
सारे मीडिया या कि अखबार, 
सबमें बस एक ही समाचार, 
इतने मर गये ,इतने संक्रमित; 
भविष्य और भयावह होगा, 
सबको देते चेतावनी; 
सबको है रखना सावधानी, 
तभी हमारा जीवन होगा, 
हम सारे के सारे होंगे, 
नहीं तो दुनियाँ दहल जायेगी, 
इतनी सारी मौतें होंगी; 
इतना सब कुछ जान रहे हैं, 
फिर भी आँखे नहीं खोलते, 
कहीं भी देखो मिल जायेंगे; 
ऐसे -ऐसे लोग !

अब भी सब आँखे खोलें,  
केवल अपना ख्याल करें,  
समय -समय पर हाथ धुलें,  
बहुत जरुरी जब तक न हो, 
घर से बाहर न निकलें;  
आपस में दूरी रखें,  
सरकारों की राय सुनें,  
इस वायरस से बचने का, 
उनसे इसका उपाय सुनें,  
उनके पास विशेषज्ञ बड़े हैं, 
इस वायरस से लड़ने को, 
उनके पास चिकित्सक हैं; 
बहुत देर अब भी न हुई है, 
आओ हम सब मिल-जुल कर, 
अपने इस सन्युक्त प्रयास से, 
कोरोना को दूर भगायें, 
अपने देश और दुनियाँ को, 
पहले जैसा खुशहाल बनायें, 
जिससे फिर से आपस में मिल-जुल, 
सारे ही त्यौहार मनायें -2 |  


                    रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Wednesday, June 3, 2020

कोरोना काल में बच्चे

  
                               बच्चे 

  
                                        








दोस्तों संग पढ़ने जायेगा,
धक्का-मुक्की खूब करेगा,
मस्ती उनके संग करेगा;
फिर से वह दिन कब आयेगा | 

दुनियाँ भर की सारी बातें,
चीन की सारी करतूतें,
खाली घंटे में करेगा;
फिर से वह दिन कब आयेगा | 

बड़ी-बड़ी डींगे हाँकेगा,
दोस्तों को भयभीत करेगा,
सुपरमैन की ताकत उसमें;
फिर से वह दिन कब आयेगा | 

मध्यकाल में साथ बैठ कर,
माँ के दिए पराठे लाकर,
मिल-जुलकर सब चट कर जायेंगे;
फिर से वह दिन कब आयेगा | 

खाली कालांश में मैदान चलें,
ऐसी वह मनुहार करेगा;
जब शिक्षक जी मान जायेंगे,
आँखों ही आँखों में खुश हो,
उनके संग मैदान जायेगा; 
फिर से वह दिन कब आयेगा | 

मन लगा कर कक्षा में,
सारे पाठ याद करेगा,
जल्दी से छुट्टी हो जाये,
जल्दी से वह बैग उठाये,
सबसे पहले घर को भागे ,
फिर से वह दिन कब आयेगा |

बस्ता फेंक कहीं भी घर में,
जल्दी से कुछ खा लेगा;
दोस्तों संग मैदान पहुँचकर ,
बहुत देर तक खेलेगा; 
फिर से वह दिन कब आयेगा |

थक-हार कर घर आयेगा; 
अपनी माँ से डाँट खायेगा; 
फिर वह पढ़ने बैठेगा; 
अपना सारा गृहकार्य ख़त्मकर; 
बेफ़िक्री में सो जायेगा;
फिर से वह दिन कब आयेगा |


दोस्तों  की जन्मदिन पार्टी में, 
सजधज कर वह जायेगा; 
दोस्तों संग डांस करेगा, 
ढेरों फोटो खींचवायेगा; 
बात-बात पर हल्ला होगा; 
फिर से वह दिन कब आयेगा |


छुट्टी के दिन सुबह से ही, 
बल्ला,विकेट और गेंद ले, 
मैदान में डट जायेगा; 
प्रतिद्वंदी को धूल चटाकर, 
अगले मैच की रणनीति बनाता, 
देरी से वह घर आयेगा; 
फिर से वह दिन कब आयेगा |


नयी फ़िल्म के लगते ही, 
पापा-मम्मी से जिद करके, 
फ़िल्म देखने वह जायेगा; 
फिर से वह दिन कब आयेगा |


खिड़की पर बैठे-बैठे,
इंतजार करते-करते, 
गर्मी बीत रही है पूरी; 
घर से कभी न बाहर आना,
गली,मोहल्ला कहीं न जाना,
घर में बैठे बोर हो रहा; 
नानी के घर कब जायेगा ?
फिर से वह दिन कब आयेगा |

कब तक ऐसे ही रहना?
सोच-सोच कर दिल बैठे,
टी.वी.देख रहा है दिनभर, 
किताबें सब चाट चुका है; 
बातें सबकी ख़त्म हो चुकी,
फिर से वह दिन कब आयेगा |


हम सारे नियम मानेंगे, 
दूरी आपस में रखेंगे, 
समय-समय पर हाथ धुलेंगे, 
योग व प्राणायाम करेंगे, 
बाहर का कुछ न खायेंगे, 
लेते ऐसे संकल्प दिलों में; 
सारे बच्चे सोच रहे हैं, 
फिर से वह दिन कब आयेगा-2 |

                                रविशंकर उपाध्याय 

मौलिक कृति एवं 
सर्वाधिकार सुरक्षित |