
विश्वव्यापी महामारी,
दुनियाभर की बेरोजगारी,
पूरी दुनिया परेशान है;
नींद नहीं है उसको आती|
दुःख से सब बेहाल हो रहे,
तड़प-तड़प कर रोज मर रहे,
देख दशा दुनिया की अपने;
नींद नहीं है उसको आती|
चूसना खून गरीबों का,
निजी अस्पताल में जारी;
सरकारी अस्पताल अव्यवस्थित;
नींद नहीं है उसको आती|
बच्चे घर में सब अपने हैं,
विद्यालय सब बंद पड़े हैं,
शिक्षा से मरहूम नौनिहाल;
नींद नहीं है उसको आती|
कल कारखानों में ताले लटके,
मजदूर सड़कों पर भटके,
उत्पादन सब ठप्प पड़ा है;
नींद नहीं है उसको आती|
गरीबों की न कोई सुनता,
खुद के गम से परेशान सब;
परोपकार की भावना मृतप्राय;
नींद नहीं है उसको आती|
सरकारें सब हार चुकी हैं,
सारे जतन हुयेअसफल हैं;
रोज हजारों मरीज बढ़ रहे;
नींद नहीं है उसको आती|
गाँवों पर दबाव बढ़ रहा,
सब परदेशी गाँवों में हैं,
कैसे सबका काम चलेगा?
नींद नहीं है उसको आती|
खेतों की अपनी क्षमता है,
कैसे इतना अन्न उगाये?
कैसे सबका पेट भरेगा?
नींद नहीं है उसको आती|
दुनिया में हा-हाकार मचा है,
रोग,गरीबी और भुखमरी,
भ्रष्टाचार हर तरफ मचा है;
नींद नहीं है उसको आती|
कैसे इस चक्रव्यूह से निकले?
कैसे इस संकट से उबरे?
यही सोचते जाग रहा है;
नींद नही है उसको आती|
हम उबरे थे,हम उबरेंगे;
अपना पिछला इतिहास बताता;
मानव की जिजीविषा प्रबल है;
हर संकट से हम निकलेंगे|
इसी प्रबल विश्वास को लेकर,
सपनों की गोदी में जाता,
खुशहाल जगत के सपनें लेकर;
मीठी नींद में वह सो जाता-2|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|


