नया साल
बीत रहा था साल,
बहुत ही धीरे-धीरे;
जैसे कोई साँप सरकता;
फन काढ़े धीरे-धीरे|
थोड़े से दिन और बचे हैं;
उन कठिन दिनों के;
जैसे थोड़ी सी पूँछ
बची हो विषधर की |
पूूरा साल बहुत कठिन था!
खूब छकाया इसने जन जीवन को;
पस्त हो गए दुनिया के सारे महिधर;
बना गया जीवन सबका ही दुष्कर|
हर कोई हलकान हो गए;
मारे-मारे सभी फिर रहे;
किंकर्त्तवविमूढ़ सभी थे;
हर कोई परेशान हो गए|
अदृश्य शक्ति से डर कर सारे;
भाग रहे थे मारे-मारे;
जग में हा-हा कार मचा था;
डर कर दुबक गए थे सारे|
सबकी नौकरियाँ छूट रही थीं;
सपनों की डोरी टूट रही थी;
असहाय सा जग था सारा;
सबकी मंजिल छूट रही थी|
हर तरफ अफरातफरी थी;
कोई राह न सूझ रही थी;
विपदा की इस कठिन घड़ी में;
सबकी राहें छूट रही थीं|
नए साल में कुछ ऐसा हो:
जो सबको ही राह दिखाये;
बीते गम इस ग़मगीन साल के;
हम सबके चेहरे मुस्कायें |
इस विपदा से निजात मिले;
ऐसी कोई राह दिखाए!
जिससे अपने पिछले गम भागे;
चहुँ ओर खुशियाँ लहराये|
नये साल में नई ऊँचाई;
हर कोई बस पा ही जाएँ;
बच्चे,बूढ़े हर्षित हों सब;
घर आँगन में खुशियाँ आये|
फिर से देश प्रगति पथ पर;
नित नए झण्डे लहराये:
खेतों,खलिहानों में खुशहाली हो;
अन्न आदि से घर भर जाये|
शिक्षा की गति धीमी है जो;
वह फिर से पटरी पर आये;
विश्व गुरु हम थे जो कल;
फिर से वह स्थान बनायें|
नया साल खुशियों का घर हो;
खुशियों का पैगाम दिलाये;
हर चेहरा खुश हो दुनिया का;
ऐसा कुछ ये साल ले आये | -2
रवि शंकर उपाध्याय
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