Saturday, September 19, 2020

वृद्ध

                          वृद्ध




गली,मोहल्ला,शहर,गाँव में, 

हर कोई साँसत में है; 

सबकोअपनी जान बचानी, 

हर कोई आफत में पड़ा हैं,

ऐसे में क्या सबसे ज्यादा 

चिंता उनकी है सबको 

हर घर में जो वृद्ध,बड़े हैं?


 किसी तरह जीवन चलता था, 

संयम और नियम पलता था, 

योग और प्राणायाम थे करते, 

रोगों से वे थे बचते, 

लेकिन इस गंदे वायरस ने, 

सबकी ही है कमर तोड़ दी, 

सब हैं प्रभावित इससे लेकिन, 

वृद्ध जनों की कब्र खोद दी; 

एक बार यदि इसने जकड़ा, 

आक्टोपस सा इसने पकड़ा, 

बहुत ही मुश्किल जान बचाना, 

लाख समस्या बढ़ जाती है, 

कुर्सी पर ही पड़े-पड़े, 

हर घर में जो वृद्ध,बड़े हैं|  


पहले भी जीवन में उनके, 

समस्याओं की कमी नहीं थी, 

बेटा उनका बेटा न था!

बहू भी उनकी बहू नहीं थी! 

किसी तरह घर में रहते थे, 

 फिर भी जीवन बीत रहा था, 

एकाएक भूचाल आ गया, 

हर तरफ ही अफरातफरी, 

छोटे पौधे या कि टहनियाँ, 

एक-एक कर उजड़ रहे हैं, 

मजबूत तने बचे रह गए, 

बूढ़े पेड़ों पर आफत ज्यादा, 

सब जड़ से ही उखड़ रहे हैं, 

कोई उनकी तरफ न देखे! 

सबको उनकी अब क्या जरुरत? 

सबको छोटे पौधों का या कि, 

अपनी-अपनी ही पड़ी है, 

हर कोई संकट में घिरे हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


अस्पताल में भीड़ बड़ी है, 

रोगी ज्यादा बिस्तर कम हैं!

ऐसे में अस्पताल के आगे 

भारी मुश्किल आन पड़ी है; 

किसको पहले बिस्तर पर लें? 

बहुत  सोच कर अस्पताल ने, 

उनको ही बिस्तर पर लिया है, 

जिनकी ज्यादा उम्र पड़ी है; 

अलग-थलग फिर वृद्ध पड़े हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


अपनी पूरी कोशिश करते,

दिन भर संयम से ही रहते, 

बार-बार हैं हाथ को धोते, 

सबसे दूरी बना के रखते, 

पहले भी तो दूरी ही थी! 

अब तो एकदम दूर ही रहते, 

फिर भी खाँसी उभर ही आती, 

लाख बचाने  पर भी उनके, 

गले से खाँसी निकल ही आती;

आस पास सब चौकन्ने हो, 

आशंकित व् भय विह्वल हो, 

बड़े ध्यान से उन्हें देखते, 

वे  खुद भय से सिमट ही जाते, 

अंधकार मय भविष्य देखकर, 

आँखों ही आँखों में जगते, 

अब क्या बिपदा उनपर आनी? 

सोच में पड़ कर जाग रहे हैं, 

बिस्तर में ही पड़े हुए हैं, 

हर घर में ही वृद्ध,बड़े हैं|  


मरते दम इस कठिन घड़ी में, 

कोई साथ न देगा उनका, 

मुक्ति धाम तक भी उनके, 

कोई साथ नहीं जायेगा; 

सारे अपनी जान बचाने की, 

युक्ति रोज ही खोज रहे हैं,

भाग रहे हैं,दौड़ रहे हैं

लेकिन कोई युक्ति न मिलती, 

ऐसे में कोई उनकी क्यों सोचे? 

हर घर में जो वृद्ध बड़े हैं|  


लेकिन हमको नहीं चाहिए, 

जीवन में यह बात भूलनी, 

हम भी एक दिन बूढ़े होंगें, 

ऐसे ही हम ताकतवर, 

जीवनभर नहीं रहेंगे; 

 हम सब भी वृद्ध बनेंगे, 

ये जीवन में कभी न भूले, 

जो कुछ हैं हम आज यहाँ, 

सब कुछ इनके कारण हैं; 

हमें कृतघ्न नहीं बनना है, 

पितृ-ऋण हमको ही भरना है, 

जैसे हमको इन्होंने पाला, 

जीवन भर देखा-भाला; 

अब हम सबकी बारी है,

इनकी पूरी सेवा करनी, 

देखभाल इनकी अब करनी, 

 हम इनके प्रति कृतज्ञ बनें, 

हम सब अपना धर्म निभायें, 

हम संवेदन शील तथा,

पितृ भक्त इंसान कहायें -2 |  

              

                 रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 


  

 

 

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