बाढ़
गिरते-पड़ते किसी तरह से,
घर-आँगन में खुशियाँ आतीं,
उन खुशियों पर ग्रहण लगाने;
आ जाती है बाढ़ |
खेतों में लहरायें फसलें,
उनको देख के सपनें बुनते,
उन सपनों को जीते जी;
खा जाती है बाढ़|
सब कुछ तहस-नहस हो जाता,
घर-गृहस्थी पूरी चौपट,
आँगन की तुलसी मईया को;
कुम्हलाती है बाढ़|
कोठारी में सारा राशन,
पूरे साल का पक्का साधन,
फूल-फूल कर बह जाता है;
जब आती है बाढ़ |
फसलें सब बरबाद हो गईं,
झटके खूटा मवेशी भी,
ह्रदय बिदारक दृश्य दिखाती;
यह निर्मोही बाढ़|
अपना घर अब उसे छोड़ना,
क्या रख ले ?और क्या छोड़े ?
द्वन्द्व भयंकर मचा दिलों में;
सब करवाती बाढ़ |
छोटी सी पोटली बाँधे,
बच्चे को गोदी में साधे,
ऊँचे स्थानों पर रुकने को;
विवश कराती बाढ़ |
भूख से बच्चे तड़प रहे हैं,
रो-रो कर हलकान हो रहे,
कोई भीअब युक्ति न सूझे!
कैसे दिन दिखलाती बाढ़!
ऊँचे स्थानों या शिविरों में,
बैठे-बैठे बाट जोहते,
भिखारी सी हालत हो गई;
ये भी करवाती बाढ़|
सरकारी अनुदानों पर,
बन्दर बाँट मची है भारी,
नीचे दुखियों तक शायद पहुँचे!
क्यों आती है बाढ़ ?
लाशों पर रोटी सेंकें,
दुखियों की आहें लेते,
ह्रदय नहीं विदीर्ण हो रहा!
ये क्या करवाती बाढ़!
अच्छी सी योजना बने,
वह अमली जामा पहने,
जन-जन की भागीदारी हो;
तब जाएगी बाढ़ |
जिससे जीवन पटरी पकड़े,
खानाबदोश का जीवन छूटे,
हर घर में तुलसी पनपे;
डर न लगाये बाढ़| -2
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |

सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोल दी आपने व्यंग व्यंग में ही,, अति सुन्दर कविता,,, 👌
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद अविनाश ।
ReplyDeleteआपने गरीब भाइयों की सारी व्यथा कह दी
ReplyDeleteबहुत बढ़िया सर
बहुत बहुत धन्यवाद ।
ReplyDeleteइस त्योहार जैसी आपदा का आदी नेता और जनमानस दोनों हो चुके है। निर्जीव हो चुकी व्यवस्थाओं का सजीव चित्रण।🙏
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
DeleteBeautiful poem which brings out the devastating truth👍🏻
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद।
DeleteSarkari tantra ki puri pol kholti ye sundar kavita.Mai Balrampur ki barh me barh pidito ki vyatha live dekh raha.Thanks again sir for creating this type of poem on Barh.Pranam.
ReplyDeleteThaanks
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