Monday, August 17, 2020

समय

                                 समय

बह रहे लय बद्ध धारा 

 में ही रहता आ रहा है, 

अनवरत मद मस्त होकर, 

कब से बहता जा रहा है|  


अनवरत प्रवाह में,

गति से गति मिलाकर; 

अनंत से अनंत को; 

कब से बहता जा रहा है|  


मंजिल है इस समय रथ की, 

शायद ही कोई अभी तक;

बह रहा है, बह रहा है, 

कब से बहता जा रहा है | 


कब चला था?

क्यों चला था?

किस जगह से वह चला था? 

कौन सी मंजिल है पाना? 

कब से बहता जा रहा है|  



कितना कुछ देखा है इसने, 

अपने इस अनजान पथ पर; 

कितने बन के मिट गये!  

कब से बहता जा रहा है|  


सभ्यतायें अनगिनत,

बन के मटियामेट हो गयीं; 

कितनी संस्कृतियाँ बहाता;

 कब से बहता जा रहा है|  


बूँद हैं सागर में हम,

कोई अपनी क्या बिसात! 

उसकी गति से गति मिला लो;

 कब से बहता जा रहा है|  


                       रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

5 comments:

  1. सभ्यताएं अनगिनत ,, बन के मटियामेट हो गई,,

    क्या खूब,,, क्या खूब ,,, 👌👌👌

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद अविनाश ।

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  3. Bahot hi badhiya... This is one of your best creation...

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