Saturday, July 18, 2020

शाम

                             शाम



दिनभर जग को ऊष्मा देते, 
चँहु ओर प्रकाश फैलाते, 
चलते-चलते थक जाते रवि,
अस्ताचल में लाली हो जब;
तब होती है शाम|  
 
रथ के पहिये रुकने लगते, 
शिथिल हो चले सारे घोड़े,
तेज खो रहे सूर्य देव जब, 
डूब रहे हों पश्चिम में जब; 
तब होती है शाम|  

अम्बर सारा लाल हो रहा, 
आसमान का लाल खो रहा, 
डूबते सूरज की छवि सुन्दर, 
तन मन को शीतल करता जब; 
तब होती है शाम|  
 
दिनभर नभ में मस्ती करते, 
अपने कुनबे संग उड़-उड़ के;
 घोसलों की तलाश मे पंछी,  
झुण्ड बना कर चल पड़ते जब; 
तब होती है शाम|  
 
गाँवों में चहुँ ओर ध्वनित हो, 
घंटी गायों ,भैसों की, 
टुन-टुन,टुन-टुन सरगम बाजे, 
साज मिलाये आसमान जब; 
तब होती है शाम|  
 
खुर से गायों के धूल उड़े, 
उड़-उड़ कर नाकों में पहुँचे, 
दूबों के रस से भिनी सुगंध, 
क्लान्ति मिटाये चेहरे की जब; 
तब होती है शाम|  
 
रात बहुरिया चूनर ओढ़े, 
शरमायी सी घूँघट टारे, 
खुद का चेहरा देख लजाये, 
खड़ी ओट से राह तके जब; 
तब होती है शाम|  
 
चाँद बेचारा चाँदनी लेकर, 
कब सारे अम्बर में छाये? 
टिम-टिम तारों की बारात सजाये, 
यही सोचते शांत खड़ा जब;
तब होती है शाम|  
 
दिन भर प्रिय की आस लगाये, 
बार-बार चौखट पर आये, 
इंतजार में विह्वल प्रेयसी, 
दिल की बात जुबाँ पे लाये जब; 
तब होती है शाम|  
 
यौवन के प्रबल ज्वार की, 
अंत घड़ी नजदीक दिखे जब, 
सर के बालों के श्वेत केश, 
वृद्दि कर रहे हों अपनी जब; 
तब होती है शाम|  

मन के चंचल पन पर 
अंकुश की बारी आये जब, 
बीते अपने उफान के दिन, 
कैवल्यता मन में छाये जब; 
तब होती है शाम|  
 
स्थिरता मैदानी नदियों सी, 
शांत चित्त व स्थिर मन हो, 
अनुभव संसार समेटे दिल में, 
निर्विकार सा जीवन हो जब; 
तब होती है शाम|

                   रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|    
 
 
 

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