दिनभर जग को ऊष्मा देते,
चँहु ओर प्रकाश फैलाते,
चलते-चलते थक जाते रवि,
अस्ताचल में लाली हो जब;
तब होती है शाम|
रथ के पहिये रुकने लगते,
शिथिल हो चले सारे घोड़े,
तेज खो रहे सूर्य देव जब,
डूब रहे हों पश्चिम में जब;
तब होती है शाम|
अम्बर सारा लाल हो रहा,
आसमान का लाल खो रहा,
डूबते सूरज की छवि सुन्दर,
तन मन को शीतल करता जब;
तब होती है शाम|
दिनभर नभ में मस्ती करते,
अपने कुनबे संग उड़-उड़ के;
घोसलों की तलाश मे पंछी,
झुण्ड बना कर चल पड़ते जब;
तब होती है शाम|
गाँवों में चहुँ ओर ध्वनित हो,
घंटी गायों ,भैसों की,
टुन-टुन,टुन-टुन सरगम बाजे,
साज मिलाये आसमान जब;
तब होती है शाम|
खुर से गायों के धूल उड़े,
उड़-उड़ कर नाकों में पहुँचे,
दूबों के रस से भिनी सुगंध,
क्लान्ति मिटाये चेहरे की जब;
तब होती है शाम|
रात बहुरिया चूनर ओढ़े,
शरमायी सी घूँघट टारे,
खुद का चेहरा देख लजाये,
खड़ी ओट से राह तके जब;
तब होती है शाम|
चाँद बेचारा चाँदनी लेकर,
कब सारे अम्बर में छाये?
टिम-टिम तारों की बारात सजाये,
यही सोचते शांत खड़ा जब;
तब होती है शाम|
दिन भर प्रिय की आस लगाये,
बार-बार चौखट पर आये,
इंतजार में विह्वल प्रेयसी,
दिल की बात जुबाँ पे लाये जब;
तब होती है शाम|
यौवन के प्रबल ज्वार की,
अंत घड़ी नजदीक दिखे जब,
सर के बालों के श्वेत केश,
वृद्दि कर रहे हों अपनी जब;
तब होती है शाम|
मन के चंचल पन पर
अंकुश की बारी आये जब,
बीते अपने उफान के दिन,
कैवल्यता मन में छाये जब;
तब होती है शाम|
स्थिरता मैदानी नदियों सी,
शांत चित्त व स्थिर मन हो,
अनुभव संसार समेटे दिल में,
निर्विकार सा जीवन हो जब;
तब होती है शाम|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

Sham k itne sare vividh roop ek Kavita me. Bahut badhiya🙏
ReplyDeleteThanks Archana.
Deleteबहुत खूसूरत वर्णन h शाम की।
ReplyDeleteThanks Richa.
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