Saturday, July 11, 2020

सुबह

                        सुबह


आलस्य छोड़ अब तुम जागो, 
सारा जग चैतन्य हुआ, 
तम की कारा विदीर्ण हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
तारे थक कर बेहाल हुए, 
चंदा की लाली भी देखो 
कान्ति हीन ,श्री हीन हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
चिड़ियों की फौज सतर्क हुई, 
उड़ चली गगन की गोदी में; 
मुर्गे की बाँग शुरू हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
जग के अंधकार का ह्रदय भेद, 
सूरज की किरणें प्रकट हुईं, 
नभ के तम की हार हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
फूलों की कलियाँ मुस्कायीं, 
जैसे होठों पर हँसी खिली; 
उनकी सुगंध चहुँ ओर गई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
किरणों की सुंदरता के 
क्या कहने ?
स्वर्णिम कमान चहुँ ओर खींची; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
संयम नियम वालों की, 
जल्दी उठने वालों की, 
दिन चर्या अब शुरू हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
सारा जग देखो जाग गया, 
सपनों की दुनिया त्याग गया, 
अब कर्तव्यों की बारी आयी; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
सब अपने-अपने कामों में रत, 
दुनिया के व्यवसायों में रत, 
अब जागो देखो रात गई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
तन-मन से कामों में लग जाओ, 
खुद ही अपना भविष्य लिखो, 
जीत कर्म की सदा हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
इस पल को जियो, 
जो अभी मिला है, 
जो बीत गयी सो बात गई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
                             रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|  

6 comments:

  1. आजकल की जिंदगी में जहां लोग देर से सोना और देर से जगना को अपना चुके है वहां सुबह जागने के लिए यह एक प्रेरणादाई कविता हो सकती है👍

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  3. Nice one... This has motivated me to wake up early to embrace it...

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  4. सुबह जल्दी उठ कर जीवन का सवेरा लाने की प्रेरणा h इसमें।आज की पीढ़ी को सुबह समझने की बढ़िया कोशिश।

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