आलस्य छोड़ अब तुम जागो,
सारा जग चैतन्य हुआ,
तम की कारा विदीर्ण हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
तारे थक कर बेहाल हुए,
चंदा की लाली भी देखो
कान्ति हीन ,श्री हीन हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
चिड़ियों की फौज सतर्क हुई,
उड़ चली गगन की गोदी में;
मुर्गे की बाँग शुरू हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
जग के अंधकार का ह्रदय भेद,
सूरज की किरणें प्रकट हुईं,
नभ के तम की हार हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
फूलों की कलियाँ मुस्कायीं,
जैसे होठों पर हँसी खिली;
उनकी सुगंध चहुँ ओर गई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
किरणों की सुंदरता के
क्या कहने ?
स्वर्णिम कमान चहुँ ओर खींची;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
संयम नियम वालों की,
जल्दी उठने वालों की,
दिन चर्या अब शुरू हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
सारा जग देखो जाग गया,
सपनों की दुनिया त्याग गया,
अब कर्तव्यों की बारी आयी;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
सब अपने-अपने कामों में रत,
दुनिया के व्यवसायों में रत,
अब जागो देखो रात गई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
तन-मन से कामों में लग जाओ,
खुद ही अपना भविष्य लिखो,
जीत कर्म की सदा हुई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
इस पल को जियो,
जो अभी मिला है,
जो बीत गयी सो बात गई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|

आजकल की जिंदगी में जहां लोग देर से सोना और देर से जगना को अपना चुके है वहां सुबह जागने के लिए यह एक प्रेरणादाई कविता हो सकती है👍
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
ReplyDeleteNice one... This has motivated me to wake up early to embrace it...
ReplyDeleteThanks Ankit.
ReplyDeleteसुबह जल्दी उठ कर जीवन का सवेरा लाने की प्रेरणा h इसमें।आज की पीढ़ी को सुबह समझने की बढ़िया कोशिश।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
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