प्रकृति में हलचल कोई,
मौसम में परिवर्तन कोई,
हर परिवर्तन के संकेतक हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
जाड़ों में सब पत्ते खो कर,
एकाकी में शांत भाव से,
बिना किसी जुम्बिश के रहते;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
गर्मी में कर सुन्दर श्रृंगार,
फूल,फलों व पत्तों से लद कर,
खड़े हुए हैं मुस्तैदी से;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
जैसे ही कोई बेचैनी,
मौसम में कोई सरगर्मी,
जोर-जोर से हिलते पत्ते;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
जैसे वे संकेत कर रहे,
उमस से निजात मिलेगी,
खुश हो कर वे हमें बताते;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
वर्षा रानी आयेगी,
खूब पानी बरसायेगी,
झूम-झूमकर हमें बताते;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
नाच रहे हैं ,झूम रहे हैं,
मतवालों से घूम रहे हैं,
जैसे सबके सुख में शामिल;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
तूफानों के आने पर,
हलके से झुक जाते हैं,फिर
पहले जैसे हो जाते हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
अकड़ो मत दुनिया में तुम,
यदि अकड़े तो टूट गये;
विनम्रता सबसे अच्छी है;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
गर्मी ,वर्षा या हो जाड़ा,
सबको सम भाव से जीना,
सुख-दुःख केवल मन के भ्रम हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
फल से लद कर झुक जाते हैं,
सुख में कभी घमण्ड न करना,
सारे जग को सिखलाते हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
शांत भाव से योगी जैसे,
धुनी रमाये लगते वैसे,
निर्विकार से खड़े हुए हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
जितने दिन का जीवन उनका,
फल,फूल,लकड़ी,तिनका,
बस देना ही जाना है;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
नहीं कोई सपने इनके,
नहीं कोई महत्वाकांक्षा,
जी भर जीये,चले गये;
पेड़ों की अपनी भाषा है|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रकृति का बेहद सजीव चित्रण 👏👍
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद ।
ReplyDeleteअलौकिक,,,, ध्यान ही नहीं गया कभी इस ओर,,
ReplyDeleteवास्तव में वृक्ष परिवर्तन के बारे में बोहोत कुछ कहते है,,
धन्यवाद अपने कविता द्वारा विषय पर अवगत कराने हेतु,,
बहुत बहुत धन्यवाद ।
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ReplyDeleteBahot hi sahajta se pedo ki bhasha ko samjha diya aapne... bahot badhiya....
ReplyDeleteThank you Ankit.
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