गौरैया
बचपन की स्मृतियों में आती,
खपरैलों के मुंडेर पर गाती ,
आँगन में भींगे जूठे चावल,
भींगे फूले रोटी के टुकड़े खाती;
दिन भर पूरे घर को अपनी
चीं-चीं की आवाज सुनाती;
हम छोटे बच्चों की हमजोली;
फुदक-फुदक कर आँगन के
गड्ढों में फैले पानी में नाच दिखती;
कहाँ खो गयी वो चिड़ियों की रानी!
तुम खोयी तो गाँव खो गया;
गाँव की अपनी साख खो गयी;
आन-मान और शान खो गयी,
चौपालों की चहल-पहल,
दवरी और मचान खो गया;
वृद्ध जनों का मान खो गया,
अपने पन का भान खो गया,
नाई,मोची,बढ़ई,दर्जी;
धरिकारों की रोजी-रोटी,
केवट और मल्लाहों के
घर में रोटी देने वाली,
उनकी छोटी नाव खो गयी;
देर रात तक जाड़ों में
सुख-दुःख कहते बैठे रहते;
बच्चे,बूढ़े और सभी के
दुःख,गम,ठंडक हरती,
तपनी की सोंधी आग खो गयी|
वो मेरी प्यारी गौरैया!
अपने कुनबे संग,
तुम फिर आ जाती;
त्योहारों के कोरे कागज पर,
रंग भर जाती;
भूल चुके मीठे रिश्तों में
मधुरस भर जाती;
उदारवाद के जहर से जल कर
नष्ट हो चुकी गाँव की अपनी,
खुद पर निर्भरता फिर से पा जाते;
और गाँव हमारे अपने प्यारे,
सुखमय,हरियालीमय,
सुखद कलेवर में आ जाते -2 |
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |
रवि शंकर उपाध्याय
ह्रदय को छू लेने वाली रचना बचपन की याद आ गई।अप्रतिम रचना सर
ReplyDeleteधन्यवाद।
ReplyDeleteSuper se bhi upar....sir
ReplyDeleteThanks .
ReplyDeleteBahut khoob ...wakai purane dino ki yaad
ReplyDeleteधन्यवाद।
ReplyDeleteJo beet gaya hai wo ab daur na aayega
ReplyDeleteTruly. Thanks.
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