Saturday, March 19, 2022

गौरैया


                 गौरैया 







बचपन की स्मृतियों में आती, 

खपरैलों के मुंडेर पर गाती ,

आँगन में भींगे जूठे चावल, 

भींगे फूले रोटी के टुकड़े खाती; 

दिन भर पूरे घर को अपनी 

चीं-चीं की आवाज सुनाती; 

हम छोटे बच्चों की हमजोली; 

फुदक-फुदक कर आँगन के 

गड्ढों में फैले पानी में नाच दिखती; 

कहाँ खो गयी वो चिड़ियों की रानी! 


तुम खोयी तो गाँव खो गया; 

गाँव की अपनी साख खो गयी; 

आन-मान और शान खो गयी,

चौपालों की चहल-पहल, 

दवरी और मचान खो गया; 

वृद्ध जनों का मान खो गया, 

अपने पन का भान खो गया, 

नाई,मोची,बढ़ई,दर्जी; 

धरिकारों की रोजी-रोटी, 

केवट और मल्लाहों के

 घर में रोटी देने वाली, 

उनकी छोटी नाव खो गयी; 

देर रात तक जाड़ों में 

सुख-दुःख कहते बैठे रहते; 

बच्चे,बूढ़े और सभी के 

दुःख,गम,ठंडक हरती, 

तपनी की सोंधी आग खो गयी|  


वो मेरी प्यारी गौरैया! 

अपने कुनबे संग, 

तुम फिर आ जाती;

त्योहारों के कोरे कागज पर, 

रंग भर जाती; 

भूल चुके मीठे रिश्तों में 

मधुरस भर जाती; 

उदारवाद के जहर से जल कर 

नष्ट हो चुकी गाँव की अपनी, 

खुद पर निर्भरता फिर से पा जाते; 

और गाँव हमारे अपने प्यारे, 

सुखमय,हरियालीमय, 

सुखद कलेवर में आ जाते -2 | 


       मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

                              रवि शंकर उपाध्याय 




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