बसन्त
सिहरन सी तन में उठे,
अंग-अंग महक उठे,
मन प्रफुल्लित,तन प्रफुल्लित,
जीवन बहका गया;
देखो बसन्त आ गया|
हवा बहकी-बहकी बहे,
फूलों की सुगंध लिए,
घर,आँगन,गली,कूचा,
उपवन महका गया;|
देखो बसन्त आ गया|
सरसों के फूल बिखरे,
अम्बर की छाँव में;
पीतवस्त्र धारण किये,
पतली कमर लिए,
नयन-बाण छोड़ रही,
जीवन रस घोल रही,
सारा जग भरमा गया;
देखो बसन्त आ गया|
अम्बर की शोभा अलग,
चहुँ ओर ख़ुशी छायी,
पेड़ों ने वस्त्र त्याग,
नए वसन ग्रहण किया;
देखो बसन्त आ गया|
मन-मयूर नाच रहा,
हर तरफ हरा-भरा,
फूलों से मकरंद उड़,
नथुनों में छा गया;
देखो बसन्त आ गया|
फसलों से खेत लसे;
हरे-भरे खेत लहके,
बाली पर भौंरों का झुण्ड,
मन को सहला गया;
देखो बसन्त आ गया|
आँगन की चहल-पहल,
रिश्तों में मिठास घोले;
चिड़ियों की कलरव ध्वनि,
चित को चहका गया;
देखो बसन्त आ गया|
नव युगल का प्रेम गीत,
गली,गली छा गया;
उनको न कोई होश रहा!
उनका दिन आ गया;
देखो बसन्त आ गया|-2
रवि शंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |


