Sunday, August 30, 2020

बाढ़

                    बाढ़










गिरते-पड़ते किसी तरह से, 

घर-आँगन में खुशियाँ आतीं, 

उन खुशियों पर ग्रहण लगाने; 

आ जाती है बाढ़ | 


खेतों में लहरायें फसलें, 

उनको देख के सपनें बुनते,

उन सपनों को जीते जी; 

खा जाती है बाढ़|  


सब कुछ तहस-नहस हो जाता, 

घर-गृहस्थी पूरी चौपट, 

आँगन की तुलसी मईया को; 

कुम्हलाती है बाढ़| 


कोठारी में सारा राशन, 

पूरे साल का पक्का साधन, 

फूल-फूल कर बह जाता है; 

जब आती है बाढ़ | 


फसलें सब बरबाद हो गईं, 

झटके खूटा मवेशी भी, 

ह्रदय बिदारक दृश्य दिखाती; 

यह निर्मोही बाढ़| 


अपना घर अब उसे छोड़ना, 

क्या रख ले ?और क्या छोड़े ?

द्वन्द्व भयंकर मचा दिलों में; 

सब करवाती बाढ़ | 


छोटी सी पोटली बाँधे, 

बच्चे को गोदी में साधे, 

ऊँचे स्थानों पर रुकने को; 

विवश कराती बाढ़ | 


भूख से बच्चे तड़प रहे हैं, 

रो-रो कर हलकान हो रहे, 

कोई भीअब युक्ति न सूझे!  

कैसे  दिन दिखलाती बाढ़!


ऊँचे स्थानों या शिविरों में,

बैठे-बैठे बाट जोहते, 

भिखारी सी हालत हो गई; 

ये भी करवाती बाढ़|  


सरकारी अनुदानों पर, 

बन्दर बाँट मची है भारी, 

नीचे दुखियों तक शायद पहुँचे!

क्यों आती है बाढ़ ?


लाशों पर रोटी सेंकें, 

दुखियों की आहें लेते, 

ह्रदय नहीं विदीर्ण हो रहा! 

ये क्या करवाती बाढ़! 


अच्छी सी योजना बने, 

वह अमली जामा पहने, 

जन-जन की भागीदारी हो; 

तब जाएगी बाढ़ | 


जिससे जीवन पटरी पकड़े, 

खानाबदोश का जीवन छूटे, 

हर घर में तुलसी पनपे; 

डर न लगाये बाढ़| -2 

                     रवि शंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

 


  

  

Sunday, August 23, 2020

हवा

                       हवा












 जग में हाहाकार मचा है,

 हर प्राणी हलकान यहाँ है,

 सबको सुख-शांति पहुँचाने; 

   हवा तुम जल्दी आना |  


मग में तेरे उपवन होंगे, 

फूलों की सुंदरता से, 

सारे जग को हरसाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


हरश्रृंगार ,चमेली,बेला, 

इन फूलों से खुशबू लेना, 

जग को मह-मह महकाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


खुद का कर श्रृंगार इन्हीं से, 

हरियाली का वसन लपेटे, 

बल खाती  सी मद माती सी; 

हवा तुम जल्दी आना |  


देख तुम्हारे रूप राशि को, 

पीपल के पत्तों सा हिलता, 

मन का कोमल भाव सलोना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


तेरे आने की आहट लें, 

संकेतों से तुम बतलाना, 

पत्ते,डाली खूब हिलाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


नदियाँ,ताल,पोखरे तक, 

लहरा-लहरा कर हमें बतायें, 

उनकी भाषा में समझाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


दिल के भाव उमंगों में भर, 

मन ही मन मुस्कायें, 

ऐसी कोई बूटी लाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


भावों में संवेदना बचे, 

रूखे रिश्तों के घाव भरे, 

ऐसी कोई सूरत लाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


जग सूना है,प्राण हीन है, 

सारे प्राणी भाव हीन हैं, 

इनको प्राण-वायु दे जाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


विपदाओं से परेशान सब,

पड़ जायें बिस्तर पर जब, 

तुम इनको चँवर डुलाना; 

हवा तुम जल्दी आना |  


देर न करना हे सुन्दरी !

जग प्रसन्न हो जाये सारा, 

ऐसी खुशहाली फैलाना; 

हवा तुम जल्दी आना -2 | 

                      रविशंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित |   

  

Monday, August 17, 2020

समय

                                 समय

बह रहे लय बद्ध धारा 

 में ही रहता आ रहा है, 

अनवरत मद मस्त होकर, 

कब से बहता जा रहा है|  


अनवरत प्रवाह में,

गति से गति मिलाकर; 

अनंत से अनंत को; 

कब से बहता जा रहा है|  


मंजिल है इस समय रथ की, 

शायद ही कोई अभी तक;

बह रहा है, बह रहा है, 

कब से बहता जा रहा है | 


कब चला था?

क्यों चला था?

किस जगह से वह चला था? 

कौन सी मंजिल है पाना? 

कब से बहता जा रहा है|  



कितना कुछ देखा है इसने, 

अपने इस अनजान पथ पर; 

कितने बन के मिट गये!  

कब से बहता जा रहा है|  


सभ्यतायें अनगिनत,

बन के मटियामेट हो गयीं; 

कितनी संस्कृतियाँ बहाता;

 कब से बहता जा रहा है|  


बूँद हैं सागर में हम,

कोई अपनी क्या बिसात! 

उसकी गति से गति मिला लो;

 कब से बहता जा रहा है|  


                       रवि शंकर उपाध्याय 

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित | 

Saturday, August 1, 2020

बहन

बहन

                                 












माँ जैसी ख्याल है रखती, 
उम्र से अपने बड़ी है लगती, 
बचपन में ही बड़ी हो गयी, 
भाई को दिन भर देखे, 
अपने हिस्से का दे दे,
अपना ध्यान कभी न रखती, 
हम सबकी प्यारी बहना|  

माँ के सुख-दुःख को समझे, 
सबसे पहले पढ़ लेती है, 
माँ के मन के भावों को; 
दिन भर माँ का हाथ बटाये, 
उनके जिम्मे का काम घटाये, 
घर में माँ को राहत देती;
हम सबकी प्यारी बहना|  

भाई दिन भर मस्ती करता, 
फिर भी सबका प्यारा बेटा, 
वह जब भी मस्ती करती, 
माँ की घुट्टी ,पिता की डांट,
हर दम उसका पीछा करते, 
फिर से, 
कछुई सी अपने खोल में जा, 
खो देती अपना बचपन; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

माँ-बाप की चिन्ता बढ़ती, 
उसकी बढ़ती उम्र के साथ, 
रोज-रोज ही सोच रहे हैं, 
कैसे उतरेगा यह भार?
भार नहीं वह कभी रही है, 
और न आगे ही रहेगी, 
पढ़-लिख कर वह सिद्ध करेगी, 
अपने पैरों पर खड़ी रहेगी;
हम सबकी प्यारी बहना|  

जिस दिन उसकी डोली जायेगी, 
माँ बाप का आँगन खो कर,
 प्रिय के घर आ जायेगी,
लेकिन नैहर का नेह न छूटे, 
पल-पल सबको याद करेगी; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

जीवन भर वह सिद्ध करेगी, 
माँ-बापू का ख्याल रखेगी, 
दूजे घर वह भले गयी, 
लेकिन उसका प्यारा घर, 
माँ-बापू का न्यारा घर, 
उसके दिल से कभी न भूले, 
आँगन में अपनों का साथ,  
बात-बात पर नैहर जाने की, 
क्या ? कैसे तरकीब बने ?
जिससे अपने नैहर पहुँचे, 
सब लोगों से जल्दी मिल ले, 
सखी-सहेली,घर-आँगन, 
सब उसकी हैं बाट जोहते, 
दिल ही दिल में सोच रही है; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

कब तक नेह की डोर रहेगी? 
अपने पन की छोह रहेगी! 
उम्र हो रही माँ-बापू की, 
उनके आगे अब क्या होगा? 
क्या भाई अब बुलवाएगा? 
भाभी की बातों में पड़कर, 
क्या वह सब कुछ भूल जायेगा?
कभी-कभी रातों में जगते, 
पूरी रात निकल जाती है, 
सोच-सोच कर थक जाती है, 
फिर माँ की यादों में खोकर, 
पता नहीं कब सो जाती है; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

कभी न कुछ नैहर से चाह, 
धन-दौलत या रुपये-पैसे,  
सब कुछ उसने न्योछावर कर दी, 
प्यार और दुलार में जैसे; 
बस मीठे दो बोल चाहिए, 
अपने पन की ठौर चाहिए, 
दिल में कुछ सम्मान चाहिए,
दिल से कभी न भूले उसको, 
आखों में वह भान चाहिए, 
कुछ भी हो घर में हो अच्छा, 
शादी ब्याह या कि राखी, 
उसको भी सब याद करें, 
फिर से वह अपने घर आये, 
चाचा-चाची,दादा-दादी, 
सखी-सहेली सबसे मिल कर, 
दिन-दिन भर उनसे बतियाये, 
बचपन की यादों को मथ कर, 
उसमें से माखन उतराये, 
माखन के स्वाद में खोकर, 
अपना सबकुछ भूल ही जाये, 
यादों की बारात लिए, 
गली-मोहल्ले में हो आये, 
बीते बचपन की गलियों में, 
फिर से वह सखियों संग जाये, 
खो जाये वह उन गलियों में, 
फिर से आने को कहना; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

उम्र हो रही अब उसकी, 
आना-जाना नहीं है संभव, 
ताक रही है आस लगाए, 
कोई तो नैहर से आये, 
फिर से वह एक बार पहुँच कर, 
जी ले अपना प्यारा बचपन, 
जीवन भर वह दूर रही पर, 
भूल न पायी अपना नैहर, 
उसकी गलियां या बचपन; 
हम सबकी प्यारी बहना|  

अंत समय में भी उसको, 
साँस उखड़ जाते-जाते,
स्मृतियों में चली गयी है; 
माँ-बापू,चाचा-चाची, 
सखी-सहेली,भाई-बहना, 
सब उसको अब याद आ रहे, 
आँगन में बैठे सब हैं, 
सब उसको याद कर रहे, 
वह भी उनको देख रही है,
जीवन भर वह रही कहीं भी, 
उसकी आत्मा यहीं रही है, 
यही सोचते यादों में, 
सासों की डोर छूट रही है, 
चली गयी इहलोक से वह, 
पहने यादों का गहना; 
हम सबकी प्यारी बहना-2|   

                 रविशंकर उपाध्याय 
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|