बहन
माँ जैसी ख्याल है रखती,
उम्र से अपने बड़ी है लगती,
बचपन में ही बड़ी हो गयी,
भाई को दिन भर देखे,
अपने हिस्से का दे दे,
अपना ध्यान कभी न रखती,
हम सबकी प्यारी बहना|
माँ के सुख-दुःख को समझे,
सबसे पहले पढ़ लेती है,
माँ के मन के भावों को;
दिन भर माँ का हाथ बटाये,
उनके जिम्मे का काम घटाये,
घर में माँ को राहत देती;
हम सबकी प्यारी बहना|
भाई दिन भर मस्ती करता,
फिर भी सबका प्यारा बेटा,
वह जब भी मस्ती करती,
माँ की घुट्टी ,पिता की डांट,
हर दम उसका पीछा करते,
फिर से,
कछुई सी अपने खोल में जा,
खो देती अपना बचपन;
हम सबकी प्यारी बहना|
माँ-बाप की चिन्ता बढ़ती,
उसकी बढ़ती उम्र के साथ,
रोज-रोज ही सोच रहे हैं,
कैसे उतरेगा यह भार?
भार नहीं वह कभी रही है,
और न आगे ही रहेगी,
पढ़-लिख कर वह सिद्ध करेगी,
अपने पैरों पर खड़ी रहेगी;
हम सबकी प्यारी बहना|
जिस दिन उसकी डोली जायेगी,
माँ बाप का आँगन खो कर,
प्रिय के घर आ जायेगी,
लेकिन नैहर का नेह न छूटे,
पल-पल सबको याद करेगी;
हम सबकी प्यारी बहना|
जीवन भर वह सिद्ध करेगी,
माँ-बापू का ख्याल रखेगी,
दूजे घर वह भले गयी,
लेकिन उसका प्यारा घर,
माँ-बापू का न्यारा घर,
उसके दिल से कभी न भूले,
आँगन में अपनों का साथ,
बात-बात पर नैहर जाने की,
क्या ? कैसे तरकीब बने ?
जिससे अपने नैहर पहुँचे,
सब लोगों से जल्दी मिल ले,
सखी-सहेली,घर-आँगन,
सब उसकी हैं बाट जोहते,
दिल ही दिल में सोच रही है;
हम सबकी प्यारी बहना|
कब तक नेह की डोर रहेगी?
अपने पन की छोह रहेगी!
उम्र हो रही माँ-बापू की,
उनके आगे अब क्या होगा?
क्या भाई अब बुलवाएगा?
भाभी की बातों में पड़कर,
क्या वह सब कुछ भूल जायेगा?
कभी-कभी रातों में जगते,
पूरी रात निकल जाती है,
सोच-सोच कर थक जाती है,
फिर माँ की यादों में खोकर,
पता नहीं कब सो जाती है;
हम सबकी प्यारी बहना|
कभी न कुछ नैहर से चाह,
धन-दौलत या रुपये-पैसे,
सब कुछ उसने न्योछावर कर दी,
प्यार और दुलार में जैसे;
बस मीठे दो बोल चाहिए,
अपने पन की ठौर चाहिए,
दिल में कुछ सम्मान चाहिए,
दिल से कभी न भूले उसको,
आखों में वह भान चाहिए,
कुछ भी हो घर में हो अच्छा,
शादी ब्याह या कि राखी,
उसको भी सब याद करें,
फिर से वह अपने घर आये,
चाचा-चाची,दादा-दादी,
सखी-सहेली सबसे मिल कर,
दिन-दिन भर उनसे बतियाये,
बचपन की यादों को मथ कर,
उसमें से माखन उतराये,
माखन के स्वाद में खोकर,
अपना सबकुछ भूल ही जाये,
यादों की बारात लिए,
गली-मोहल्ले में हो आये,
बीते बचपन की गलियों में,
फिर से वह सखियों संग जाये,
खो जाये वह उन गलियों में,
फिर से आने को कहना;
हम सबकी प्यारी बहना|
उम्र हो रही अब उसकी,
आना-जाना नहीं है संभव,
ताक रही है आस लगाए,
कोई तो नैहर से आये,
फिर से वह एक बार पहुँच कर,
जी ले अपना प्यारा बचपन,
जीवन भर वह दूर रही पर,
भूल न पायी अपना नैहर,
उसकी गलियां या बचपन;
हम सबकी प्यारी बहना|
अंत समय में भी उसको,
साँस उखड़ जाते-जाते,
स्मृतियों में चली गयी है;
माँ-बापू,चाचा-चाची,
सखी-सहेली,भाई-बहना,
सब उसको अब याद आ रहे,
आँगन में बैठे सब हैं,
सब उसको याद कर रहे,
वह भी उनको देख रही है,
जीवन भर वह रही कहीं भी,
उसकी आत्मा यहीं रही है,
यही सोचते यादों में,
सासों की डोर छूट रही है,
चली गयी इहलोक से वह,
पहने यादों का गहना;
हम सबकी प्यारी बहना-2|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|