जगमग-जगमग तारों के संग,
खूब सारी सौगातें लेकर,
चंदा की बारात सजाये;
रात सुहानी आई|
अम्बर में वितान सजा है,
सारा अम्बर चम-चम चमके,
आगे-आगे नाँच दिखाती;
रात सुहानी आई|
धरती पर है अलग नजारा,
जुगनू के टिम-टिम से देखो,
पूरी धरती इठलायी;
रात सुहानी आई|
बच्चे उनके पीछे लग गये,
आगे-आगे जुगनू भागे,
पीछे बच्चों की टोली भागी;
रात सुहानी आई|
कभी दूर तक निकल जा रहे,
कभी पास में जैसे लगते,
दिल हरसाये चमक सुहानी;
रात सुहानी आई|
आसमान में तारे सारे,
अपनी मस्ती में घूम रहे हैं,
अम्बर की शोभा मनभावनी;
रात सुहानी आई|
कभी-कभी बादल में छुप कर,
चाँद कभी बादल से झाँके,
खेल रहा है आँख मिचौली;
रात सुहानी आई|
जग सारा आराम कर रहा,
थक कर दिनभर के कामों से,
तारों संग पहरा देती;
रात सुहानी आई|
चिड़ियाँ अपने कुनबे संग,
शांत चित्त आराम कर रहीं,
सारे दिन की क्लान्ति मिटाती;
रात सुहानी आई|
पेड़ों की अपनी थकान है,
योगी जैसे ध्यान लगायें,
नीरवता अब बोल रही है;
रात सुहानी आई|
सन्नाटा पसरा है जग में,
दुनिया भर में शान्ति छाई,
दूर कहीं कल-कल नदियों की;
रात सुहानी आई|
बीच-बीच में सन्नाटे के,
झींगुर अपनी तान लगाये,
दूर तलक आवाजें फैली;
रात सुहानी आई|
नींद की गोद में हर कोई है,
सपनें सुन्दर देख रहे सब,
सपनों की बारात सजाती;
रात सुहानी आई|
अब सपनों के पार चलें हम,
चिर निद्रा में आज चलें हम,
चौखट पर करती अगवानी;
रात सुहानी आई|
सब कुछ पीछे छूट रहा है,
माया का भ्रम टूट रहा है,
मोक्ष मार्ग की राह दिखाती;
रात सुहानी आई|
रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|



