Saturday, July 25, 2020

रात

                                        रात 









जगमग-जगमग तारों के संग,
खूब सारी सौगातें लेकर, 
चंदा की बारात सजाये; 
रात सुहानी आई| 

अम्बर में वितान सजा है, 
सारा अम्बर चम-चम चमके, 
आगे-आगे नाँच दिखाती; 
रात सुहानी आई| 

धरती पर है अलग नजारा, 
जुगनू के टिम-टिम से देखो, 
पूरी धरती इठलायी; 
रात सुहानी आई| 

बच्चे उनके पीछे लग गये, 
आगे-आगे जुगनू भागे, 
पीछे बच्चों की टोली भागी; 
रात सुहानी आई| 

कभी दूर तक निकल जा रहे, 
कभी पास में जैसे लगते, 
दिल हरसाये चमक सुहानी; 
रात सुहानी आई| 

आसमान में तारे सारे, 
अपनी मस्ती में घूम रहे हैं, 
अम्बर की शोभा मनभावनी; 
रात सुहानी आई| 

कभी-कभी बादल में छुप कर, 
चाँद कभी बादल से झाँके, 
खेल रहा है आँख मिचौली; 
रात सुहानी आई| 

जग सारा आराम कर रहा, 
थक कर दिनभर के कामों से, 
तारों संग पहरा देती; 
रात सुहानी आई| 

चिड़ियाँ अपने कुनबे संग, 
शांत चित्त आराम कर रहीं, 
सारे दिन की क्लान्ति मिटाती; 
रात सुहानी आई| 

पेड़ों की अपनी थकान है, 
योगी जैसे ध्यान लगायें, 
नीरवता अब बोल रही है; 
रात सुहानी आई| 

सन्नाटा पसरा है जग में, 
दुनिया भर में शान्ति छाई, 
दूर कहीं कल-कल नदियों की; 
रात सुहानी आई| 

बीच-बीच में सन्नाटे के, 
झींगुर अपनी तान लगाये, 
दूर तलक आवाजें फैली; 
रात सुहानी आई| 

नींद की गोद में हर कोई है, 
सपनें सुन्दर देख रहे सब, 
सपनों की बारात सजाती; 
रात सुहानी आई| 

अब सपनों के पार चलें हम, 
चिर निद्रा में आज चलें हम, 
चौखट पर करती अगवानी; 
रात सुहानी आई| 

सब कुछ पीछे छूट रहा है, 
माया का भ्रम टूट रहा है, 
मोक्ष मार्ग की राह दिखाती; 
रात सुहानी आई| 

                          रविशंकर उपाध्याय

मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित| 
  

Saturday, July 18, 2020

शाम

                             शाम



दिनभर जग को ऊष्मा देते, 
चँहु ओर प्रकाश फैलाते, 
चलते-चलते थक जाते रवि,
अस्ताचल में लाली हो जब;
तब होती है शाम|  
 
रथ के पहिये रुकने लगते, 
शिथिल हो चले सारे घोड़े,
तेज खो रहे सूर्य देव जब, 
डूब रहे हों पश्चिम में जब; 
तब होती है शाम|  

अम्बर सारा लाल हो रहा, 
आसमान का लाल खो रहा, 
डूबते सूरज की छवि सुन्दर, 
तन मन को शीतल करता जब; 
तब होती है शाम|  
 
दिनभर नभ में मस्ती करते, 
अपने कुनबे संग उड़-उड़ के;
 घोसलों की तलाश मे पंछी,  
झुण्ड बना कर चल पड़ते जब; 
तब होती है शाम|  
 
गाँवों में चहुँ ओर ध्वनित हो, 
घंटी गायों ,भैसों की, 
टुन-टुन,टुन-टुन सरगम बाजे, 
साज मिलाये आसमान जब; 
तब होती है शाम|  
 
खुर से गायों के धूल उड़े, 
उड़-उड़ कर नाकों में पहुँचे, 
दूबों के रस से भिनी सुगंध, 
क्लान्ति मिटाये चेहरे की जब; 
तब होती है शाम|  
 
रात बहुरिया चूनर ओढ़े, 
शरमायी सी घूँघट टारे, 
खुद का चेहरा देख लजाये, 
खड़ी ओट से राह तके जब; 
तब होती है शाम|  
 
चाँद बेचारा चाँदनी लेकर, 
कब सारे अम्बर में छाये? 
टिम-टिम तारों की बारात सजाये, 
यही सोचते शांत खड़ा जब;
तब होती है शाम|  
 
दिन भर प्रिय की आस लगाये, 
बार-बार चौखट पर आये, 
इंतजार में विह्वल प्रेयसी, 
दिल की बात जुबाँ पे लाये जब; 
तब होती है शाम|  
 
यौवन के प्रबल ज्वार की, 
अंत घड़ी नजदीक दिखे जब, 
सर के बालों के श्वेत केश, 
वृद्दि कर रहे हों अपनी जब; 
तब होती है शाम|  

मन के चंचल पन पर 
अंकुश की बारी आये जब, 
बीते अपने उफान के दिन, 
कैवल्यता मन में छाये जब; 
तब होती है शाम|  
 
स्थिरता मैदानी नदियों सी, 
शांत चित्त व स्थिर मन हो, 
अनुभव संसार समेटे दिल में, 
निर्विकार सा जीवन हो जब; 
तब होती है शाम|

                   रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|    
 
 
 

Saturday, July 11, 2020

सुबह

                        सुबह


आलस्य छोड़ अब तुम जागो, 
सारा जग चैतन्य हुआ, 
तम की कारा विदीर्ण हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
तारे थक कर बेहाल हुए, 
चंदा की लाली भी देखो 
कान्ति हीन ,श्री हीन हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
चिड़ियों की फौज सतर्क हुई, 
उड़ चली गगन की गोदी में; 
मुर्गे की बाँग शुरू हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
जग के अंधकार का ह्रदय भेद, 
सूरज की किरणें प्रकट हुईं, 
नभ के तम की हार हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
फूलों की कलियाँ मुस्कायीं, 
जैसे होठों पर हँसी खिली; 
उनकी सुगंध चहुँ ओर गई;
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
किरणों की सुंदरता के 
क्या कहने ?
स्वर्णिम कमान चहुँ ओर खींची; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
संयम नियम वालों की, 
जल्दी उठने वालों की, 
दिन चर्या अब शुरू हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
सारा जग देखो जाग गया, 
सपनों की दुनिया त्याग गया, 
अब कर्तव्यों की बारी आयी; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
सब अपने-अपने कामों में रत, 
दुनिया के व्यवसायों में रत, 
अब जागो देखो रात गई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
तन-मन से कामों में लग जाओ, 
खुद ही अपना भविष्य लिखो, 
जीत कर्म की सदा हुई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
इस पल को जियो, 
जो अभी मिला है, 
जो बीत गयी सो बात गई; 
अब उठो कि देखो सुबह हुई|   
 
                             रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित|  

Sunday, July 5, 2020

पेड़

                                                    पेड़ 



प्रकृति में हलचल कोई, 
मौसम में परिवर्तन कोई, 
हर परिवर्तन के संकेतक हैं; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

जाड़ों में सब पत्ते खो कर, 
एकाकी में शांत भाव से, 
बिना किसी जुम्बिश के रहते; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

गर्मी में कर सुन्दर श्रृंगार, 
फूल,फलों व पत्तों से लद कर,
खड़े हुए हैं मुस्तैदी से; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

जैसे ही कोई बेचैनी, 
मौसम में कोई सरगर्मी, 
जोर-जोर से हिलते पत्ते;
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

जैसे वे संकेत कर रहे, 
उमस से निजात मिलेगी, 
खुश हो कर वे हमें बताते; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

वर्षा रानी आयेगी,
खूब पानी बरसायेगी, 
झूम-झूमकर हमें बताते; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

नाच रहे हैं ,झूम रहे हैं, 
मतवालों से घूम रहे हैं, 
जैसे सबके सुख में शामिल; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

तूफानों के आने पर, 
हलके से झुक जाते हैं,फिर 
पहले जैसे हो जाते हैं; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

अकड़ो मत दुनिया में तुम,
यदि अकड़े तो टूट गये; 
विनम्रता सबसे अच्छी है; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

गर्मी ,वर्षा या हो जाड़ा,
सबको सम भाव से जीना, 
सुख-दुःख केवल मन के भ्रम हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

फल से लद कर झुक जाते हैं, 
सुख में कभी घमण्ड न करना, 
सारे जग को सिखलाते हैं; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

शांत भाव से योगी जैसे, 
धुनी रमाये लगते वैसे, 
निर्विकार से खड़े हुए हैं;
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

जितने दिन का जीवन उनका, 
फल,फूल,लकड़ी,तिनका,
बस देना ही जाना है; 
पेड़ों की अपनी भाषा है| 

नहीं कोई सपने इनके, 
नहीं कोई महत्वाकांक्षा, 
जी भर जीये,चले गये; 
 पेड़ों की अपनी भाषा है| 

                               रविशंकर उपाध्याय
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित